Shri Sitaji Ka Swapn / श्री सीताजी का स्वप्न

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Shri Sitaji Ka Swapn, Shriramji Ko Kol-Kiraton Dwara Bharatji Ke Aagman Ki Suchna, Ramji Ko Shok, Lakshmanji Ka Krodh
श्रीसीताजी का स्वप्न, श्रीरामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी को शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध

Shri Sitaji Ka Swapn, Shriramji Ko Kol-Kiraton Dwara Bharatji Ke Aagman Ki Suchna. श्री सीताजी का स्वप्न, श्रीरामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी को शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध :- देवताओं का सम्मान ( पूजन ) और मुनियों की वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशा की ओर देखने लगे। आकाश में धूल छा रही है ; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभु के आश्रम को आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे की क्या कारण है ? वे चित्त में आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलों ने आकर सब समाचार कहे। सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोच के वश हो गये कि भरत के आने का क्या कारण है ? फिर एक ने आकर ऐसा कहा कि उनके साथ में बड़ी भारी चतुरङ्गिनी सेना भी है।     


सकल सनेह सिथिल रघुबर कें । गए कोस दुइ दिनकर ढरकें ।।

जलु थलु देखि बसे निसि बीतें । कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ।।

अर्थात् :- सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के मारे शिथिल होने के कारण सूर्यास्त होने तक ( दिनभर में ) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थल का सुपास देखकर रात को वहीं [ बिना खाये-पीये ही ] रह गये। रात बीतने पर श्रीरघुनाथजी के प्रेमी भरतजी ने आगे गमन किया।   

उहाँ रामु रजनी अवसेषा । जागे सीयँ सपन अस देखा ।।
सहित समाज भरत जनु आए । नाथ बियोग ताप तन ताए ।।

अर्थात् :- उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे। रात को सीताजी ने ऐसा स्वप्न देखा [ जिसे वे श्रीरामजी को सुनाने लगीं ] मानो समाजसहित भरतजी यहाँ आये हैं। प्रभु के वियोग की अग्नि से उनका शरीर संतप्त है।

सकल मलिन मन दीन दुखारी । देखीं सासु आन अनुहारी ।।
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन । भए सोचबस सोच बिमोचन ।।

अर्थात्त :- सभी लोग मन में उदास, दीन और दुःखी हैं। सासुओं को दूसरी ही सूरत में देखा। सीताजी का स्वप्न सुनकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्रों में जल भर आया और सबको सोच से छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं ( लीला से ) सोच के वश हो गये।

लखन सपन यह नीक न होई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ।।
अस कहि बंधु समेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ।।

अर्थात् :- [ और बोले – ] लक्ष्मण ! यह स्वप्न अच्छा नहीं है। कोई भीषण कुसमाचार ( बहुत ही बुरी खबर ) सुनावेगा। ऐसा कहकर उन्होंने भाईसहित स्नान किया और त्रिपुरारि महादेवजी का पूजन करके साधुओं का सम्मान किया।

छं० — सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए ।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ।।
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे ।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे ।।

अर्थात् :- देवताओं का सम्मान ( पूजन ) और मुनियों की वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशा की ओर देखने लगे। आकाश में धूल छा रही है ; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभु के आश्रम को आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे की क्या कारण है ? वे चित्त में आश्चर्ययुक्त हो गये। उसी समय कोल-भीलों ने आकर सब समाचार कहे।

सो० — सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर ।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल ।। 226 ।।

अर्थात् :- तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मङ्गल वचन सुनते ही श्रीरामजी के मन में बड़ा आनन्द हुआ। शरीर में पुलकावली छा गयी, और शरद् ऋतु के कमल के समान नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गये।

बहुरि सोचबस भे सियरवनू । कारन कवन भरत आगवनू ।।
एक आइ अस कहा बहोरी । सेन संग चतुरंग न थोरी ।।

अर्थात् :- सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोच के वश हो गये कि भरत के आने का क्या कारण है ? फिर एक ने आकर ऐसा कहा कि उनके साथ में बड़ी भारी चतुरङ्गिनी सेना भी है। 

सो सुनि रामहि भा अति सोचू । इत पितु बच इत बंधु सकोचू ।।
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं । प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं ।।

अर्थात् :- यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को अत्यन्त सोच हुआ। इधर तो पिता के वचन और इधर भाई भरतजी का संकोच ! भरतजी के स्वभाव को मन में समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्त को ठहराने के लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं। 

समाधान तब भा यह जाने । भरतु कहे महुँ साधु सयाने ।।
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू । कहत समय सम नीति बिचारू ।।

अर्थात् :- तब यह जानकर समाधान हो गया कई भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहने में ( आज्ञाकारी ) हैं। लक्ष्मणजी ने देखा कि प्रभु श्रीरामजी के हृदय में चिन्ता है तो वे समय के अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे। –

बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं । सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाईं ।।
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी । आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ।।

अर्थात् :- हे स्वामी ! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ ; सेवक समय पर ढिटाई करने से ढीट नहीं समझा जाता ( अर्थात् आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है ; इसीलिये यह मेरा कहना ढिटाई नहीं होगा )। हे स्वामी ! आप सर्वज्ञों में शिरोमणि हैं ( सब जानते ही हैं )। मैं सेवक तो अपनी समझ की बात कहता हूँ। 

दो० — नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान ।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान ।। 227 ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! आप परम सुहृद् ( बिना ही कारण परम हित करने वाले ), सरल हृदय तथा शील और स्नेह के भण्डार हैं, आपका सभी पर प्रेम और विश्वास है, और अपने हृदय में सबको अपने ही समान जानते हैं।

बिषई जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ।।
भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना ।।

अर्थात् :- परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरुप को प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु ( आप ) के चरणों में उनका प्रेम है, इस बात को सारा जगत् जानता है।

तेऊ आजु राम पदु पाई । चले धरम मरजाद मेटाई ।।
कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी । जानि राम बनबास एकाकी ।।

अर्थात् :- वे भरत भी आज श्रीरामजी ( आप ) का पद ( सिंहासन या अधिकार ) पाकर धर्म की मर्यादा को मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी ( आप ) वनवास में अकेले ( असहाय ) हैं।

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू । आए करै अकंटक राजू ।।
कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई । आए दल बटोरि दोउ भाई ।।

अर्थात् :- अपने मन में बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्य को निष्कण्टक करने के लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार की कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं।

जौं जियँ होति न कपट कुचाली । केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ।।
भरतहि दोसु देइ को जाएँ । जग बौराइ राज पदु पाएँ ।।

अर्थात् :- यदि इनके हृदय में कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियों की कतार [ ऐसे समय ] किसे सुहाती ? परन्तु भरत को ही व्यर्थ कौन दोष दे ? राजपद पा जानेपर सारा जगत् ही पागल ( मतवाला ) हो जाता है। 

दो० — ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान ।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ।। 228 ।।

अर्थात् :- चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणों की पालकी पर चढ़ा। और राजा वेन के समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनों से विमुख हो गया।

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू । केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ।।
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु रिन रंच न राखब काऊ ।।

अर्थात् :- सहस्त्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमद ने कलङ्क नहीं दिया ? भरत ने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋण को कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये।

एक कीन्हि नहिं भरत भलाई । निदरे रामु जानि असहाई ।।
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी । समर सरोष राम मुखु पेखी ।।

अर्थात् :- हाँ, भरत ने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी ( आप ) को असहाय जानकार उनका निरादर किया ! पर आज संग्राम में श्रीरामजी ( आप ) वह क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझ में विशेषरूप से आ जायगी ( अर्थात् इस निरादर का फल भी वे अच्छी तरह पा जायँगे )। 

एतना कहत नीति रस भूला । रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ।।
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी । बोले सत्य सहज बलु भाषी ।।

अर्थात् :- इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरस रूपी वृक्ष पुलकावली के बहाने से फूल उठा ( अर्थात् नीति की बात कहते-कहते उनके शरीर में वीर-रस छा गये )। वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की वन्दना करके, चरण-रज को सिर पर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले। – 

अनुचित नाथ न मानब मोरा । भरत हमहि उपचार न थोरा ।।
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें । नाथ साथ धनु हाथ हमारें ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने हमें कम नहीं प्रचारा है ( हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है )। आखिर कहाँ तक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है।

दो० — छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुज जनु जान ।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ।। 229 ।।

अर्थात् :- क्षत्रिय जाति, रघुकुल में जन्म और फिर मैं श्रीरामजी ( आप ) का अनुगामी ( सेवक ) हूँ, यह जगत् जानता है। [ फिर भला कैसे सहा जाय ? ] धूल के समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारने पर सिर ही चढ़ती है।

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