Shriram Valmiki Samwad / श्रीराम वाल्मीकि संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Shriram Valmiki Samwad
श्रीराम वाल्मीकि संवाद

Shriram Valmiki Samwad, श्रीराम वाल्मीकि संवाद :- श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रम में ले आये। मङ्गल-मूर्ति को नेत्रों से देखकर वाल्मीकिजी के मन में बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देनेवाले मधुर वचन बोले। हे मुनिनाथ ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेली पर रखे हुए बेर के समान है। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकार से रानी कैकेयीजी ने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तार से सुनायी।


मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ।।

देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रम में ले आये।

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए ।।
सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ।।

अर्थात् :- श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजी ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजी ने फलों को खाया। तब मुनि ने उनको [ विश्राम करने के लिये ] सुन्दर स्थान बतला दिये।

बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी ।।
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई ।।

अर्थात् :- [ मुनि श्रीरामजी के पास बैठे हैं और उनकी ] मङ्गल-मूर्ति को नेत्रों से देखकर वाल्मीकिजी के मन में बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देनेवाले मधुर वचन बोले। —

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनीनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ।।
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ।।

अर्थात् :- हे मुनिनाथ ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेली पर रखे हुए बेर के समान है। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकार से रानी कैकेयीजी ने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तार से सुनायी।

दो० — तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ।। 125 ।।

अर्थात् :- [ और कहा – ] हे प्रभो ! पिताजी की आज्ञा [ का पालन ], माता का हित और भरत जैसे [ स्नेही एवं धर्मात्मा ] भाई का राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्यों का प्रभाव है।

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे ।।
अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई ।।

अर्थात् :- हे मुनिराज ! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये ( हमें सारे पुण्यों का फल मिल गया )। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई मुनि उद्वेग को प्राप्त न हो। –

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं ।।
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ।।

अर्थात् :- क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही ( अपने दुष्ट कर्मों से ही ) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मङ्गलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ।।
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला ।।

अर्थात् :- ऐसा हृदय में समझकर – वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मणजी और सीताजी सहित जाऊँ। और वहाँ सुन्दर पत्तों और घास की कुटी बनाकर, हे दयालु ! कुछ समय निवास करूँ।

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ।।
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी की सहज सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले – धन्य ! धन्य ! हे रघुकुल के ध्वजास्वरूप ! आप ऐसा क्यों न कहेंगे ? आप सदैव वेद की मर्यादा का पालन ( रक्षण ) करते हैं।

छं० — श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी ।
सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की ।।
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी ।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ।।

अर्थात् :- हे राम ! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [ आपकी स्वरुप भूता ] माया हैं, जो कृपा के भण्डार आपकी रुख पाकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पों के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिरपर धारण करने वाले हैं, वही चराचर के स्वामी शेषजी लक्ष्मणजी हैं। देवताओं के कार्य के लिये आप राजा का शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने के लिये चले हैं।

सो० — राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ।। 126 ।।

अर्थात् :- हे राम ! आपका स्वरुप वाणी के अगोचर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरन्तर उसका ‘ नेति-नेति ‘ कहकर वर्णन करते हैं।

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे ।।
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा ।।

अर्थात् :- हे राम ! जगत् दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शङ्करजी को भी नाचनेवाले हैं। जब वे भी आपके मर्म को नहीं जानते, तब और कौन आपको जानने वाले हैं ?

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ।।
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन ।।

अर्थात् :- वही आपको जानता है जिसको आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरुप बन जाता है। हे रघुनन्दन ! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चन्दन ! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ।।
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा ।।

अर्थात् :- आपकी देह चिदानन्दमय है ( यह प्रकृतिजन्य पञ्चमहाभूतों की बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेहविशिष्ट मायिक नहीं है ) और [ उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि ] सब विकारों से रहित है ; इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतों के कार्य के लिये [ दिव्य ] नर-शरीर धारण किया है और प्राकृत ( प्रकृति के तत्त्वों से निर्मित देहवाले, साधारण ) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं।

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ।।
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ।।

अर्थात् :- हे राम ! आपके चरित्रों को देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोह को प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य ( उचित ) ही है ; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये ( इस समय आप मनुष्य रूप में हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है )।

दो० — पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ।। 127 ।।

अर्थात् :- आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहने के लिये स्थान दिखाऊँ।

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ।।
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी ।।

अर्थात् :- मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [ रहस्य खुल जाने के डर से ] सकुचाकर मन में मुसकराये। वाल्मीकिजी फिर हँसकर अमृत-रस में डुबोई हुई मीठी वाणी बोले। —

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता ।।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ।।

अर्थात् :- हे रामजी ! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी समेत निवास करिये। जिनके कान समुद्र की भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियों से। —

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ।।

अर्थात् :- निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पुरे ( तृप्त ) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघ के लिये सदा ललायित रहते हैं।;

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ।।
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ।।

अर्थात् :- तथा जो भारी-भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [ रूपी मेघ ] के एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरुप के किसी एक अङ्ग की जरा-सी झाँकी के सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत् के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौन्दर्य का तिरस्कार करते हैं ), हे रघुनाथजी ! उन लोगों के हृदयरूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित निवास कीजिये।

दो० — जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु ।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ।। 128 ।।

अर्थात् :- आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बानी हुई आपके गुणसमूह रूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी ! आप उसके हृदय में बसिये !

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