Shriramji Ka Lakshmanji Ko Samjhana / श्रीरामजी का लक्ष्मण

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Shriramji Ka Lakshmanji Ko Samjhana Evam Bharatji Ki Mahima Ka Kahna
श्रीरामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना

Shriramji Ka Lakshmanji Ko Samjhana Evam Bharatji Ki Mahima Ka Kahna, श्रीरामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना :- देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी ने उनका आदर के साथ सम्मान किया [ और कहा – ] हे तात ! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्य का मद सबसे कठिन मद है। जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन ( सत्सङ्ग ) नहीं किया, वे राजा राजमदरूपी मदिरा का आचमन करते ही ( पीते ही ) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्षमण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है। 


जगु भय मगन गगन भइ बानी । लखन बाहुबलु बिपुल बखानी ।।

तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ को जाननिहारा ।।

अर्थात् :- सारा जगत् भय में डूब गया। तब लक्ष्मणजी के अपार बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई – हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है और कौन जान सकता है ?

अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ।।
सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ।।

अर्थात् :- परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दी में किसी काम को करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं।

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने । राम सीयँ सादर सनमाने ।।
कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तें कठिन राजमदु भाई ।।

अर्थात् :- देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी ने उनका आदर के साथ सम्मान किया [ और कहा – ] हे तात ! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्य का मद सबसे कठिन मद है।

जो अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ।।
सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ।।

अर्थात् :- जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन ( सत्सङ्ग ) नहीं किया, वे राजा राजमदरूपी मदिरा का आचमन करते ही ( पीते ही ) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्षमण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है। 

दो० — भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ।। 231 ।।

अर्थात् :- [ अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या है ] ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का पद पाकर भी भरत को राज्य का मद नहीं होने का ! क्या कभी काँजी की बूँदों से क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता ( फट सकता ) है ?

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ।।
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ।।

अर्थात् :- अन्धकार चाहे तरुण ( मध्याह्न के ) सूर्य को निगल जाय। आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाय। गौ के खुर-इतने जल में अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे स्वाभाविक क्षमा ( सहनशीलता ) को छोड़ दे।

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई ।।
लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ।।

अर्थात् :- मच्छर की फूँक से चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरत को राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण ! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में नहीं है। 

सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ।।
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ।।

अर्थात् :- हे तात ! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जल को मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च ( जगत् ) को रचता है। परन्तु भरत से सूर्यवंशीरूपी तालाब में हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोष का विभाग कर दिया ( दोनों को अलग-अलग कर दिया )। 

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ।।
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ।।

अर्थात् :- गुणरूपी दूध को ग्रहण कर और अवगुणरूपी जल को त्यागकर भरत ने अपने यश से जगत् में उजियाला कर दिया है। भरतजी के गुण, शील और स्वभाव को कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेम मग्न हो गये।

दो० — सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु ।
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ।। 232 ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी को वाणी सुनकर और भरतजी पर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [ और कहने लगे ] कि श्रीरामचन्द्रजी के समान कृपा के धाम प्रभु और कौन हैं ?

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