Shukla Aur Krishna Marga Ka Vishay / शुक्ल और कृष्ण मार्ग

Shukla Aur Krishna Marga Ka Vishay
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय

Shukla Aur Krishna Marga Ka Vishay, शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय- हे भरतश्रेष्ठ ! अब मैं तुम्हें उन विभिन्न कालों को बताऊँगा, जिनमें इस संसार से प्रयाण करने के बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता। वैदिक मतानुसार इस संसार से प्रयाण करने के दो मार्ग हैं — एक प्रकाश का तथा दूसरा अंधकार का। जब मनुष्य प्रकाश के मार्ग से जाता है तो वह वापस नहीं आता, किन्तु अन्धकार के मार्ग से जाने वाला पुनः लौटकर आता है। 

श्लोक 23 से 28

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ।। 23 ।।

यत्र — जिस; काले — समय में; तु — तथा; अनावृत्तिम् — वापस न आना; आवृत्तिम् — वापसी; च — भी; एव — निश्चय ही; योगिनः — विभिन्न प्रकार के योगी; प्रयाताः — प्रयाण करने वाले; यान्ति — प्राप्त करते हैं; तम् — उस; कालम् — काल को; वक्ष्यामि — कहूँगा; भरत-ऋषभ — हे भरतों में श्रेष्ठ !

तात्पर्य — हे भरतश्रेष्ठ ! अब मैं तुम्हें उन विभिन्न कालों को बताऊँगा, जिनमें इस संसार से प्रयाण करने के बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता।

 अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ।। 24 ।।

अग्नि — अग्नि; ज्योतिः — प्रकाश; अहः — दिन; शुक्लः — शुक्लपक्ष; षट्-मासाः — छह महीने; उत्तर-अयणम् — जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर रहता है; तत्र — वहाँ; प्रयाताः — मरने वाले; गच्छन्ति — जाते हैं; ब्रह्म — ब्रह्म को; ब्रह्म-विदः — ब्रह्मज्ञानी; जनाः — लोग।

तात्पर्य — जो परब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, दिन के शुभक्षण में, शुक्लपक्ष में या जब सूर्य उत्तरायण में रहता है, उन छह मासों में इस संसार से शरीर त्याग करने पर उस परब्रह्म को प्राप्त करते हैं।

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ।। 25 ।।

धूमः — धुआँ; रात्रिः — रात; तथा — और; कृष्णः — कृष्णपक्ष; षट्-मासाः — छह मास की अवधि; दक्षिण-अयनम् — जब सूर्य क=दक्षिण दिशा में रहता है; तत्र — वहाँ; चान्द्र-मसम् — चन्द्रलोक को; ज्योतिः — प्रकाश; योगी — योगी; प्राप्य — प्राप्त करके; निवर्तते — वापस आता है। 

तात्पर्य — जो योगी धुएँ, रात्रि, कृष्णपक्ष में या सूर्य के दक्षिणायन में रहने के छह महीनों में दिवंगत होता है, वह चन्द्रलोक को जाता है, किन्तु वहाँ से पुनः ( पृथ्वी पर ) चला आता है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  3. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  4. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान

 शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ।। 26 ।।

शुक्ल — प्रकाश; कृष्णे — तथा अन्धकार; गती — जाने का मार्ग; हि — निश्चय ही; एते — ये दोनों; जगतः — भौतिक जगत् का; शाश्वते — वेदों के; मते — मत से; एकया — एक के द्वारा; याति — जाता हैं; अनावृतिम् — न लौटने के लिए; अन्यथा — अन्य के द्वारा; आवर्तते — आ जाता है; पुनः — फिर से। 

तात्पर्य — वैदिक मतानुसार इस संसार से प्रयाण करने के दो मार्ग हैं — एक प्रकाश का तथा दूसरा अंधकार का। जब मनुष्य प्रकाश के मार्ग से जाता है तो वह वापस नहीं आता, किन्तु अन्धकार के मार्ग से जाने वाला पुनः लौटकर आता है।

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।। 27 ।।

न — कभी नहीं; एते — इन दोनों; सृती — विभिन्न मार्गों को; पार्थ — हे पृथापुत्र; जानन् — जानते हुए भी; योगी — भगवद्भक्त; मुह्यति — मोहग्रस्त होता है; कश्चन — कोई; तस्मात् — अतः ; सर्वेषु कालेषु — सदैव; योग-युक्तः — कृष्णभावनामृत में तत्पर; भव — होवो; अर्जुन — हे अर्जुन !

तात्पर्य — हे अर्जुन ! यद्यपि भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त नहीं होते। अतः तुम भक्ति में सदैव स्थिर रहो।

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।। 28 ।।

वेदेषु — वेदाध्ययन में; यज्ञेषु — यज्ञ सम्पन्न करने में; तपःसु — विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ करने में; च — भी; एव — निश्चय ही; दानेषु — दान देने में; यत् — जो; पुण्य-फलम् — पुण्यकर्म का फल; प्रदिष्टम् — सूचित; अत्येति — लाँघ जाता है; तत् सर्वम् — वे सब; इदम् — यह; विदित्वा — जानकर; योगी — योगी; परम् — परम; स्थानम् — धाम को; उपैति — प्राप्त करता है; च — भी; आद्यम् — मूल, आदि। 

तात्पर्य — जो व्यक्ति भक्तिमार्ग स्वीकार करता है, वह वेदाध्ययन, तपस्या, दान, दार्शनिक तथा सकाम कर्म करने से प्राप्त होने वाले फलों से वंचित नहीं होता। वह मात्र भक्ति सम्पन्न करके इन समस्त फलों की प्राप्ति करती है और अन्त  में परम नित्यधाम को प्राप्त होता है।

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय ” भगवत्प्राप्ति  ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ। [/expander_maker]

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