Sita Stuti / सीता स्तुति

Sita Stuti
सीता स्तुति

Sita Stuti, सीता स्तुति :- हे जानकी माता ! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ. उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरूपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है। यह तो आप जानती ही हैं कि करुणा-निधान रामजी का स्वभाव बड़ा सरल है, उन्हें अपना गुण, शत्रु द्वारा किया हुआ अनिष्ट, दास का अपराध और दिये हुए दान की बात कभी याद ही नहीं रहती। 

कबहुँ समय सुधि द्यायबी, मेरी मातु जानकी ।
जन कहाइ नाम लेत हौं,
किये पन चातक ज्यों, प्यास प्रेम-पानकी ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे जानकी माता ! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ. उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरूपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है।

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सरल कहाई प्रकृति आपु जानिए करुना-निधानकी ।
निजगुन, अरिकृत अनहितौ,
दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी ।। 2 ।।

अर्थात् :- यह तो आप जानती ही हैं कि करुणा-निधान रामजी का स्वभाव बड़ा सरल है, उन्हें अपना गुण, शत्रु द्वारा किया हुआ अनिष्ट, दास का अपराध और दिये हुए दान की बात कभी याद ही नहीं रहती।

बानि बिसारनसील है मानद अमानकी ।
तुलसीदास न बिसारिये, मन करम
बचन जाके, सपनेहुँ गति न आनकी ।। 3 ।।

अर्थात् :- उनकी आदत भूल जाने की है, जिसका कहीं मान नहीं होता, उसको वह मान दिया करते हैं; पर वह भी भूल जाते हैं। हे माता ! तुम उनसे कहना कि तुलसीदास को न भूलिये; क्योंकि उसे मन, वचन और कर्म से स्वप्न में भी किसी दूसरे का आश्रय नहीं है।

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