Somvar Vrat Katha / सोमवार व्रत कथा और पूजा विधि

सोमवार व्रत कथा और पूजा विधि
Somvar Vrat Katha Aur Puja Vidhi


Somvar Vrat Katha Aur Puja Vidhi, सोमवार व्रत कथा और पूजा विधि :- वैसे सामान्यतया यह व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण तथा कार्तिक में भी किया जाता है, परन्तु सावन में इसका अधिक महत्त्व है।

सोमवार पूजा विधि :-

इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि करने के उपरान्त पूजा करने के साथ व्रत का संकल्प लें। सोमवार के दिन व्रत रहकर भगवान् शंकर तथा पार्वती जी की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार दिन में एक बार भोजन करना चाहिए। यह व्रत करने से स्त्रियों को पति-पुत्रों का सुख प्राप्त होता है।

सोमवार व्रत कथा :-

प्राचीन कथा के अनुसार किसी नगर में साहूकार रहता था। जिसके घर में धन की कमी नहीं थी लेकिन उसे संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ था। जिस कारण वह बहुत परेशान रहता था। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से वह हर सोमवार व्रत भी रखता था। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से वह हर सोमवार व्रत रहकर बहुत ही श्रद्धा भाव से भगवान् शंकर की उपासना करता था। उसकी भक्ति भाव से माँ पार्वती प्रसन्न हो गई और भगवान् शंकर से उस साहूकारकी मनोरथ पूर्ण करने का आग्रह करने लगी। पार्वती जी की इच्छा अनुसार भगवान् शिव ने कहा कि ‘ हे पार्वती , इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो है उसे भोगना पड़ता है। ‘ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने के लिए कहा।

माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस बालक की उम्र केवल बारह वर्ष ही होगी। माता पार्वती और भगवान् शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था। जिसे सुनकर न तो कोई ख़ुशी थी और ना ही दुःख। वह पहले की तरह शिवजी की पूजा करता रहा।

कुछ समय के बाद साहूकार को पुत्र की प्राप्ति हुई। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाया और उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्त करने के लिए ले कर जाओ और मार्ग में यज्ञ करते हुए जाना। जहाँ भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देते हुए जाना। दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते हुए काशी की तरफ चल पड़े। रास्ते में एक नगर पड़ा जहाँ नगर के राजा की कन्या का विवाह था। लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होना था वह एक आँख से काना था। जिसकी जानकारी घर वालों को नहीं थी।

राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची। साहूकार के पुत्र को देखकर उसने सोचा कि क्यों न इस लड़के को ही दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दिया जाए। विवाह के बाद उस लड़के को धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊँगा। उसने लड़के को दूल्हे का वस्त्र पहनाकर राजकुमारी की चुन्नी पर लिख दिया कि ‘ तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जायेगा वह एक आँख से काना है। मैं तो कशी पढ़ने जा रहा हूँ।

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