Sri Bharat Shatrughn Aadi Ka Vangaman / श्री भरत शत्रुघ्न

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Ayodhyavasiyon Sahit Sri Bharat Shatrughn Aadi Ka Vangaman
अयोध्यावासियों सहित श्री भरत शत्रुघ्न आदि का वनगमन

Ayodhyavasiyon Sahit Sri Bharat Shatrughan Aadi Ka Vangaman, अयोध्यावासियों सहित श्री भरत शत्रुघ्न आदि का वनगमन :- मुनि वसिष्ठजी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेह की सराहना करते जाते हैं। नगर के सब लोग रथों को सजा-सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियों पर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं। विश्वासपात्र सेवकों को नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजी के चरणों को स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले।     


भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे । राम सनेह सुधाँ जनु पागे ।।

लोग बियोग बिषम बिष दागे । मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ।।

अर्थात् :- भरतजी के वचन सब को प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्रीरामवियोग रूपी भीषण विष से सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्र को सुनते ही जाग उठे। 

मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहँ बिकल भए भारी ।।
भरतहि कहहिं सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ।।

अर्थात् :- माता, मन्त्री, गुरु, नगर के स्त्री-पुरुष सभी स्नेह के कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजी को सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेम की साक्षात् मूर्ति ही है। 

तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ।।
जो पावँरु अपनी जड़ताई । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ।।

अर्थात् :- हे तात भरत ! आप ऐसा क्यों न कहें। श्रीरामजी को आप प्राणों के समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता कैकेयी की कुटिलता को लेकर आप पर सन्देह करेगा।  

सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ।।
अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ।।

अर्थात् :- वह दुष्ट करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्पों तक नरक के घर में निवास करेगा। साँप के पाप और अवगुण मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विष को हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रता को भस्म कर देती है। 

दो० — अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह ।
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ।। 184 ।।

अर्थात् :- हे भरतजी ! वन को अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं ; आपने बहुत ही अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्र में डूबते हुए सब लोगों को आपने [ बड़ा ] सहारा दे दिया है। 

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ।।
चलत प्रात लखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ।।

अर्थात् :- सबके मन में काम आनन्द नहीं हुआ ( अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ ) ! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी को प्राणप्रिय हो गये। 

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ।।
धन्य भरत जीवनु जग माहीं । सीलु सनेहु सराहत जाहीं ।।

अर्थात् :- मुनि वसिष्ठजी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेह की सराहना करते जाते हैं। 

कहहिं परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू ।।
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ।।

अर्थात् :- आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी। 

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ।।

अर्थात् :- कोई-कोई कहते हैं – रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?

दो० — जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ ।
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ।। 185 ।।

अर्थात् :- वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजी के चरणों के सम्मुख होने में हँसते हुए ( प्रसन्नता पूर्वक ) सहायता न करे। 

घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ।।
भरत जाइ घर कीन्ह बीचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ।।

अर्थात् :- घर-घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदय में [ बड़ा ] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि। 

संपति सब रघुपति कै आही । जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही ।।
तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ।।

अर्थात् :- सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी [ रक्षा की ] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों में शिरोमणि ( श्रेष्ठ ) है। 

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ।।
अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ।।

अर्थात् :- सेवक वही है जो स्वामी का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे। 

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ।।
करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ।।

अर्थात् :- भरतजी ने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया ; और जो जिस योग्य था, उसे उसी काम पर नियुक्त कर दिया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राम माता कौसल्याजी के पास गये। 

दो० — आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान ।
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ।। 186 ।।

अर्थात् :- स्नेह के सुजान ( प्रेम के तत्त्व को जानने वाले ) भरतजी ने सब माताओं को आर्त ( दुःखी )  जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन यान ( सुखपाल ) सजाने के लिये कहा।

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