Sri Bharat Shatrughn Ka Aagman / श्री भरत शत्रुघ्न का आगमन

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Sri Bharat Shatrughn Ka Aagman Aur Shok
श्री भरत शत्रुघ्न का आगमन और शोक

Sri Bharat Shatrughn Ka Aagman Aur Shok, श्री भरत शत्रुघ्न का आगमन और शोक :- श्रीरामजी के वियोग रूपी बूरे रोग से सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ ऐसे दुःखी हो रहे हैं कि ] देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों। बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि लगी है ! पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिये चाँदनी रूपी कैकेयी [ बड़ी ] हर्षित हुई। भरतजी ने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुल की कुशल-क्षेम पूछी। [ भरतजी ने कहा – ] कहो, पिताजी कहाँ है ? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं ? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं ?


चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके ।।

हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई ।।

अर्थात् :- हवा के समान वेगवाले घोड़ों को हँकाते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलों को लाँघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मन में ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ।

एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई ।।
असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा ।।

अर्थात् :- एक-एक निमेष वर्ष के समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगर के निकट पहुँचे। नगर में प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह से काँव-काँव कर रहे हैं।

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ।।
श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषी भयावनु लागा ।।

अर्थात् :- गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है।

खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए ।।
नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी के वियोग रूपी बूरे रोग से सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ ऐसे दुःखी हो रहे हैं कि ] देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों।

दो० — पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं ।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं ।। 158 ।।

अर्थात् :- नगर के लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं ; गौंसे ( चुपके-से ) जोहार ( वन्दना ) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद छा रहा है।

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ।।
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ।।

अर्थात् :- बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि लगी है ! पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिये चाँदनी रूपी कैकेयी [ बड़ी ] हर्षित हुई।

सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ।।
भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ।।

अर्थात् :- वह आरती सजाकर आनन्द में भरकर उठ दौड़ी और दरवाजे पर ही मिलकर भरत-शत्रुघ्न को महल में ले आयी। भरत ने सारे परिवार को दुःखी देखा। मानो कमलों के वन को पाला मार गया हो।

कैकेई हरषित एहि भाँती। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ।।
सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें ।।

अर्थात् :- एक कैकेयी जी ही इस तरह से हर्षित दीखती है मानो भीलिनी जंगल में आग लगाकर आनन्द से भर रही हो। पुत्र को सोचवश और मनमारे ( बहुत उदास ) देखकर वह पूछने लगी – हमारे नैहर में कुशल तो है ?

सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई ।।
कहु तहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता ।।

अर्थात् :- भरतजी ने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुल की कुशल-क्षेम पूछी। [ भरतजी ने कहा – ] कहो, पिताजी कहाँ है ? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं ? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम-लक्ष्मण कहाँ हैं ?

दो० — सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन ।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ।। 159 ।।

अर्थात् :- पुत्र के स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रों में कपट का जल भरकर पापिनी कैकेयी जी भरत जी के कानों में और मन में शूल के समान चुभने वाले वचन बोली। —

तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी ।।
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ।।

अर्थात् :- हे तात ! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोक को पधार गये।

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा ।।
तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी ।।

अर्थात् :- भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश ( बेहाल ) हो गये। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो। वे ‘ तात ! तात ! हा तात ! ‘ पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े।

चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही ।।
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी ।।

अर्थात् :- [ और विलाप करने लगे कि ] हे तात ! मैं आपको [ स्वर्ग के लिये ] चलते समय देख भी न सका। [ हाय ! ] आप मुझे श्रीरामचन्द्रजी को सौंप भी नहीं गये ! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले – माता ! पिता के मरने का कारण तो बताओ।

सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई ।।
आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ।।

अर्थात् :- पुत्र का वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थान को पाछकर ( चाकू से चीरकर ) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से [ आखीर तक बड़े ] प्रसन्न होकर सुना दी।

दो० — भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु ।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ।। 160 ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी का वन जाना सुनकर भरतजी को पिता का मरण भूल गया और हृदय में इस सारे अनर्थ का कारण अपने को जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये ( अर्थात् उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये )।

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