Chandra Krita Gajanan Stuti / चन्द्र कृता गजानन स्तुति

Sri Chandra Krita Gajanan Stuti
श्री चन्द्र कृता गजानन स्तुति


नमामि देवं द्विरदाननं तं यः सर्वविघ्नं हरते जनानाम् ।

धर्मार्थकामंस्तनुतेऽखिलानां तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय ।। 1 ।।

अर्थात् :- मैं उन गजानन देव को नमस्कार करता हूँ, जो लोगों के समस्त विघ्नों का अपहरण करते हैं। जो सबके लिये धर्म, अर्थ और काम का विस्तार करते हैं, उन विघ्नविनाशन गणेश को नमस्कार है।

कृपानिधे ब्रह्ममयाय देव विश्वात्मने विश्वविधानदक्ष ।
विश्वस्य बीजाय जगन्मयाय त्रैलोक्यसंहारकृते नमस्ते ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे कृपानिधे ! हे देव ! विश्व की रचना करने में कुशल ! आप विश्वरूप, ब्रह्ममय तथा विश्व के बीज हैं; जगत् आपका स्वरुप है। आप ही तीनों लोकों का संहार करने वाले हैं; आपको नमस्कार है।

त्रयीमयायाखिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय ।
नित्याय सत्याय च नित्यबुद्धे नित्यं निरीहाय नमोऽस्तु नित्यम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- तीनों वेद आपके ही स्वरुप — आपके ही तत्त्व के प्रतिपादक हैं, आप सम्पूर्ण बुद्धियों के दाता, बुद्धि के प्रकाशक और देवताओं के अधिपति हैं। हे नित्यबोध स्वरुप ! आप नित्य, सत्य और निरीह हैं; आपको सदा-सर्वदा नमस्कार है।

।। इस प्रकार श्रीगणेशपुराण में श्रीचन्द्रकृत गजाननस्तुति सम्पूर्ण हुई ।।

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