Sri Devi Atharvashirsham / श्री देवी अथर्वशीर्षम्

Sri Devi Atharvashirsham
श्री देवी अथर्वशीर्षम्

Sri Devi Atharvashirsham, श्री देवी अथर्वशीर्षम्- इस अथर्वशीर्ष का जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों अथर्वशीर्ष को न जानकर जो प्रतिमास्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता। अष्टोत्तरशत ( 108 बार ) जप ( इत्यादि ) इसकी पुरश्चरणविधि है। जो इसका दस बार पाठ करता है, वह उसी क्षण पापों से मुक्त हो जाता है और महादेवी के प्रसाद से बड़े दुस्तर संकटों को पार कर जाता है।

ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति ।। 1 ।। 

तात्पर्य – ॐ सभी देवता देवी के समीप गये और नम्रता से पूछने लगे — हे महादेवि ! तुम कौन हो ?

साब्रवीत् — अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् । शून्यं चशून्यं च ।। 2 ।।

तात्पर्य – उसने कहा — मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप और असद्रूप जगत् उत्पन्न हुआ   है।

अहमानन्दानानन्दौ । अहं विज्ञानाविज्ञाने । अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये । अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि।अहमखिलं जगत् ।। 3 ।।

तात्पर्य – मैं आनन्द और अनानन्दरूपा हूँ । मैं विज्ञान और अविज्ञान रूपा हूँ। अवश्य जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पंचीकृत और अपंचीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य-जगत् मैं ही हूँ।

वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोधर्वं च तिर्यक्चाहम् ।। 4 ।। 

तात्पर्य – वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और अनजा ( प्रकृति और उससे भिन्न ) भी मैं, निचे-ऊपर, अगल-बगल भी मैं ही हूँ।

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि। अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि। अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ।। 5 ।।

तात्पर्य – मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ। मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूपों में फिरा करती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों का, इन्द्र एवं अग्नि का और दोनों अश्विनी कुमारों का भरण-पोषण करती हूँ।

  अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधामि। अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ।। 6 ।।

तात्पर्य – मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। त्रैलोक्य को आक्रान्त करने के लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ।

अर्गला स्तोत्रम्

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते। अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे। य एवं वेद। स दैवीं सम्पदमाप्नोति ।। 7 ।।

तात्पर्य – देवों को उत्तम हवि पहुँचाने वाले और सोमरस निकालने वाले यजमान के लिये हविर्द्रव्यों से युक्त धन धारण करती हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत् की ईश्वरी, उपासकों को धन देने वाली, ब्रह्म रूप और यज्ञार्हाें में ( यजन करने योग्य देवों में ) मुख्य हूँ। मैं आत्म स्वरुप को धारण करने वाली बुद्धिवृत्ति में है। जो इस प्रकार जानता है, वह दैवी सम्पत्ति लाभ करता है।

ते देवो अब्रुवन् — नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।। 8 ।।

तात्पर्य – तब उन देवों ने कहा — देवी को नमस्कार है। बड़े-बड़ों को अपने-अपने कर्तव्य में प्रवृत्त करने वाली कल्याणकर्त्री को सदा नमस्कार है। गुणसाम्यावस्थारूपिणी मंगलमयी देवी को नमस्कार है। नियमयुक्त होकर हम उन्हें प्रणाम करते हैं।

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्
दुर्गां देवीं शरणं प्रपद्यामहेऽसुरान्नाशयित्र्यै ते नमः ।। 9 ।।

तात्पर्य – उन अग्नि के-से वर्णवाली, ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमती, कर्म फल प्राप्ति के हेतु सेवन की जाने वाली दुर्गा देवी की हम शरण में हैं। असुरों का नाश करने वाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है।

 देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति ।
सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ।। 10 ।।

तात्पर्य – प्राण रूप देवों ने जिस प्रकाश मान वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसे अनेक प्रकार के प्राणी बोलते हैं। वह कामधेनु तुल्य आनन्ददायक और अन्न तथा बल देने वाली वाग्रुपिणी भगवती उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे समीप आये।

कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् ।
सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ।। 11 ।।

तात्पर्य – काल का भी नाश करने वाली, वेदों द्वारा स्तुत हुई विष्णु शक्ति, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति ), सरस्वती ( ब्रह्मशक्ति ), देवमाता अदिति और दक्षकन्या ( सती ), पापनाशिनी कल्याणकारिणी भगवती को हम प्रणाम करते हैं।

महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि
तन्नो देवी प्रचोदयात् ।। 12 ।।

तात्पर्य – हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्वशक्ति रूपिणी का ही ध्यान करते हैं। वह देवी हमें उस विषय में ( ज्ञान-ध्यान में ) प्रवृत्त करें ।

अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव ।
तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ।। 13 ।।

कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुषच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ।। 14 ।।

एषाऽऽत्मशक्तिः। एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति ।। 15 ।।
नमस्ते अस्तु भगवति मातरस्मान् पाहि सर्वतः ।। 16 ।।

हे दक्ष ! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और उनके मृत्युरहित कल्याणमय देव उत्पन्न हुए।
    काम ( क ), योनि ( ए ), कमला ( ई ), वज्रपाणि — इन्द्र ( ल ), गुहा ( ह्रीं ), ह, स — वर्ण, मातरिश्वा — वायु ( क ), अभ्र ( ह ), इन्द्र ( ल ), पुनः गुहा ( ह्रीं ), स, क, ल — वर्ण और माया ( ह्रीं ) — यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या है और वह ब्रह्मरूपिणी है।
    [ शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती-लक्ष्मी-गौरीरूपा, अशुद्ध-मिश्र-शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत-शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूप का निर्विकल्प ज्ञान देनेवाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी — यही इस मन्त्र का भावार्थ है। यह मन्त्र सब मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्र शास्त्र में पंचदशी आदि श्रीविद्या के नाम से प्रसिद्ध है। इसके छः प्रकार के अर्थ अर्थात् भावार्थ, वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लौकिकार्थ, रहस्यार्थ और तत्त्वार्थ ‘ नित्यषोडशिकार्णव ‘ ग्रन्थ में बताये गये हैं। इसी प्रकार ‘ वरिवस्यारहस्य ‘ आदि ग्रन्थों में इसके और भी अनेक अर्थ दिखाये गये हैं। श्रुति में भी ये मन्त्र इस प्रकार से अर्थात् क्वचित् स्वरूपोच्चार, क्वचित् लक्षणा और लक्षित लक्षणा से और कहीं वर्ण के पृथ पृथ अवयव दर्शाकर जान-बूझकर विशृंखल रूप से कहे गये हैं। इससे यह मालूम होगा कि ये मन्त्र कितने गोपनीय और महत्त्वपूर्ण हैं। ]
        ये परमात्मा की शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली हैं। ये ‘ श्रीमहाविद्या ‘ हैं। जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार कर जाता है।

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