Sri Durgapad Uddhar Stotram / दुर्गापद उद्धार स्तोत्र

Sri Durgapad Uddhar Stotram
श्री दुर्गापद उद्धार स्तोत्रम्

Sri Durgapad Uddhar Stotram, श्री दुर्गापद उद्धार स्तोत्रम् :- अर्थात् :- हे देवि ! एकमात्र आप ही अनाथ, दीन, तृष्णा से व्यथित, भय से पीड़ित, डरे हुए तथा बन्धन में पड़े जीव को आश्रय देने वाली तथा एकमात्र आप ही उसका उद्धार करने वाली हैं। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये। हे देवि ! पाररहित, महादुस्तर तथा अत्यन्त भयावह विपत्ति-सागर में डूबते हुए प्राणियों की एकमात्र आप ही शरणस्थली हैं तथा उनके उद्धार की हेतु हैं। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये।

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे
नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे ।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ।। 1 ।।

अर्थात् :- शरणागतों की रक्षा करने वाली तथा भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हे शिवे ! आपको नमस्कार है। जगत् को व्याप्त करने वाली हे विश्वरूपे ! आपको नमस्कार है। हे जगत् के द्वारा वन्दित चरणकमलों वाली ! आपको नमस्कार है। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये।

नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे
नमस्ते महायोगिनी ज्ञानरूपे ।
नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे जगत् के द्वारा चिन्त्यमान स्वरूप वाली ! आपको नमस्कार है। हे महायोगिनी ! आपको नमस्कार है। हे ज्ञानरूपे ! आपको नमस्कार है। हे सदानन्दरूपे ! आपको नमस्कार है। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये।

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अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य
भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः ।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे देवि ! एकमात्र आप ही अनाथ, दीन, तृष्णा से व्यथित, भय से पीड़ित, डरे हुए तथा बन्धन में पड़े जीव को आश्रय देने वाली तथा एकमात्र आप ही उसका उद्धार करने वाली हैं। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये। 

अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये-
ऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे ।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे देवि ! वन में, भीषण संग्राम में, शत्रु के बीच में, अग्नि में, समुद्र में, निर्जन तथा विषम स्थान में और शासन के समक्ष एकमात्र आप ही रक्षा करने वाली हैं तथा संसार सागर से पार जाने के लिये नौका के समान हैं। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये।

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अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे
विपत्सागरे मज्जातं देहभाजम् ।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतु-
र्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे ।। 5 ।।

अर्थात् :- हे देवि ! पाररहित, महादुस्तर तथा अत्यन्त भयावह विपत्ति-सागर में डूबते हुए प्राणियों की एकमात्र आप ही शरणस्थली हैं तथा उनके उद्धार की हेतु हैं। जगत् का उद्धार करने वाली हे दुर्गे ! आपको नमस्कार है; आप मेरी रक्षा कीजिये।

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