Ganesha Ashtottara Shatnam Stotram / गणेश अष्टोत्तर शतनाम

Sri Ganesha Ashtottara Shatnam Stotram
श्री गणेश अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्

यम उवाच
गणेश हेरम्ब गजाननेति
महोदर स्वानुभवप्रकाशिन् ।

वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथ
वदन्तमेव त्यजत प्रभीताः ।। 1 ।।

अर्थात् :- यमराज [ अपने दूतों से ] कहते हैं — हे दूतों ! जो लोग गणेश ! हेरम्ब ! गजानन ! महोदर ! स्वानुभवप्रकाशिन् ! वरिष्ठ ! सिद्धिप्रिय ! बुद्धिनाथ ! – इस प्रकार उच्चारण करते हों, उनसे अत्यन्त भयभीत रहकर तुम उन्हें दूर से ही त्याग देना।

अनेकविघ्नान्तक वक्रतुण्ड
स्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति ।

कवीश देवान्तकनाशकारिन्
वदन्तमेव त्यजत प्रभीताः ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो हे अनेक विघ्नान्तक ! वक्रतुण्ड ! स्वानन्दलोकवासिन् ! चतुर्भुज ! कवीश ! हे देवान्तकनाशकारिन् ! — इस प्रकार उच्चारण करते हों, उनसे अत्यन्त डरे रहकर उन्हें छोड़ देना ( उन्हें पकड़कर लाने की चेष्टा न करना )।

महेशसूनो गजदैत्यशत्रो
वरेण्यसूनो विकट त्रिनेत्र ।

परेश पृथ्वीधर एकदन्त
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 3 ।।

अर्थात् :- जो हे महेशानन्दन ! गजदैत्यशत्रो ! वरेण्यपुत्र ! विकट ! त्रिनेत्र ! परेश ! पृथ्वीधर ! एकदन्त ! – इस प्रकार उच्चारण करते हों, उनसे भयभीत रहकर उन्हें दूर से त्याग देना।

प्रमोद मोदेति नरान्तकारे
षडूर्मिहन्तर्गजकर्ण ढुण्ढे ।

द्वन्द्वाग्निसिन्धो स्थिरभावकारिन्
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे प्रमोद ! मोद ! नरान्तकारे ! षडूर्मिहन्तः ! गजकर्ण ! ढुण्ढे ! द्वद्वाग्नि-सिन्धो ! स्थिरभावकारिन् ! — ऐसा उच्चारण करने वाले व्यक्तियों को उनसे डरते हुए दूर से ही छोड़ देना।

विनायक ज्ञानविघातशत्रो
पराशरस्यात्मज विष्णुपुत्र ।

अनादिपूज्यखुग सर्वपूज्य
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 5 ।।

अर्थात् :- हे विनायक ! ज्ञानविघातशत्रो ! परशारात्मज ! विष्णुपुत्र ! अनादि-पूज्य ! आखुग ( मूषक वाहन ) ! सर्वपूज्य ! – इस प्रकार उच्चारण करने वालों को भयभीत होकर छोड़ देना।

वैरिञ्चय लम्बोदर धूम्रवर्ण
मयूरपालेति मयूरवाहिन् ।

सुरासुरैः सेवितपादपद्म
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 6 ।।

अर्थात् :- हे विरंचिनन्दन ! लम्बोदर ! धूम्रवर्ण ! मयूरपाल ! मयूरवाहन ! सुरासुरसेवितपादपद्म ! – ऐसा उच्चारण करने वाले व्यक्तियों को उनसे भय मानकर त्याग देना।

करिन् महाखु ध्वज शूर्पकर्ण
शिवाज सिंहस्थ अनन्तवाह ।

दयौघ विघ्नेश्वर शेषनाभे
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 7 ।।

अर्थात् :- हे करिन् ( गाजस्वरूप ) ! महाखुध्वज ! शूर्पकर्ण ! शिव ! अज ! सिंहवाहन ! अनन्तवाह ! दयासिन्धो ! विघ्नेश्वर ! शेषनाभे ! – ऐसा उच्चारण करने वाले व्यक्तियों के दूर से ही त्याग देना और उनसे अत्यन्त भयभीत रहना।

अणोराणीयो महतो महीयो
रवीज्य योगेशज ज्येष्ठराज ।

निधीश मन्त्रेश च शेषपुत्र
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 8 ।।

अर्थात् :- हे सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान् से भी अत्यन्त महान् ! रवीज्य ( रविपूज्य ) ! योगेशज ! ज्येष्ठराज ! निधीश ! मन्त्रेश ! हे शेषपुत्र ! – ऐसा उच्चारण करने वाले व्यक्तियों को त्याग देना और उनसे अत्यन्त भयभीत रहना।

वरप्रदातरदितेश्च सूनो
परात्परज्ञानद तारवक्त्र ।

गुहाग्रज ब्रह्मप पार्श्वपुत्र
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 9 ।।

अर्थात् :- हे वरप्रदाता ! अदितिनन्दन ! परात्परज्ञानद ! तारकवक्त्र ! गुहाग्रज ! ब्रह्मप ! पार्श्वपुत्र ! — ऐसा उच्चारण करने वालों को छोड़ देना और उनसे डरते रहना।

सिन्धोश्च शत्रो परशुप्रपाणे
शमीशपुष्पप्रिय विघ्नहारिन् ।

दूर्वाङ्कुरैरर्चित देवदेव
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 10 ।।

अर्थात् :- हे सिन्धुशत्रो ! परशुप्रपाणे ! शमीशपुष्पप्रिय ! विघ्नहारिन् ! दूर्वांकुरपूजित देतदेव ! – ऐसा कहने वालों को दूर से ही त्याग देना और उनसे डरते रहना।

धियः प्रदातश्च शमीप्रियेति
सुसिद्धिदातश्च सुशान्तिदातः ।

अमेयमायामितविक्रमेति
वदन्तमेवं त्यजत प्रभीताः ।। 11 ।।

अर्थात् :- हे बुद्धिप्रद ! शमीप्रिय ! सुसिद्धिदायक ! सुशान्तिप्रदायक ! अमेयमाय ! अमितविक्रम ! – ऐसा कहने वालों को दूर से ही त्याग देना और उनसे डरते रहना।

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