Ganpati Ashtottara Shatnam Stotra / गणपति अष्टोत्तर शतनाम

Sri Ganpati Ashtottara Shatnam Stotram
श्री गणपति अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्


ध्यान

ओंकारसंनिभमीभाननमिन्दुभालं
मुक्ताग्रबिन्दुममलद्युतिमेकदन्तम् ।

लम्बोदरं कलचतुर्भुजमादिदेवं
ध्यायेन्महागणपतिं मतिसिद्धिकान्तम् ।।

अर्थात् :- ओंकार-सदृश, हाथी के-से मुखवाले तथा जिनके ललाट पर चन्द्रमा और बिन्दु तुल्य मुक्ता विराजमान है, जो बड़े तेजस्वी और एक दाँतवाले हैं, जिनका उदर विशाल है, जिनकी चार भुजाएँ हैं, उन बुद्धि और सिद्धि के स्वामी आदिदेव गणेशजी का हम ध्यान करते हैं।

ॐ गणेश्वरो गणक्रीडो महागणपतिस्तथा ।
विश्वकर्ता विश्वमुखो दुर्जयो धूर्जयो जयः ।। 1 ।।

अर्थात् :- ॐ 1. गणेश्वर = गणों के स्वामी, 2. गणक्रीड = गणों के साथ क्रीड़ा करने वाले, 3. महागणपति, 4. विश्वकर्ता = सबको उत्पन्न करने वाले, 5. विश्वमुख = सभी ओर मुखवाले, 6. दुर्जय = अजेय, 7. धूर्जय = जीतने को उत्सुक, 8. जय।

सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनश्रयः ।
योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः ।। 2 ।।

अर्थात् :- 9. सुरूप, 10. सर्वनेत्राधिवास = सबकी आँखों में बसने वाले, 11. वीरासनश्रय = वीरासन में विराजमान, 12. योगाधिप = योग के अधिष्ठाता, 13. तारकस्थ = तारक मन्त्र में निवास करने वाले, 14. पुरुष, 15. गजकर्णक = हाथी के कान वाले।

चित्राङ्गः श्यामदशनो भालचन्द्रश्चचतुर्भुजः ।
शम्भुतेजा यज्ञकायः सर्वात्मा सामबृंहितः ।। 3 ।।

अर्थात् :- 16. चित्रांग = दीप्तिमान् अंगों वाले, 17. श्यामदशन = श्याम आभा युक्त दाँतवाले, 18. भालचन्द्र = मस्तक पर चन्द्रकला धारण करने वाले, 19. चतुर्भुज = चार भुजाओं वाले, 20. शम्भुतेज = शम्भु के तेज से उत्पन्न, 21. यज्ञकाय = यज्ञ स्वरुप, 22. सर्वात्मा = सबके आत्म स्वरुप, 23. सामबृंहित = सामवेद में गाये गये।

कुलाचलांसो व्योमनाभिः कल्पद्रुमवनालयः ।
निम्ननाभिः स्थूलकुक्षिः पीनवक्षा बृहद्भुजः ।। 4 ।।

अर्थात् :- 24. कुलाचलांस = कुलपर्वतों के समान कन्धों वाले, 25. व्योमनाभि = आकाश की भाँति नाभि वाले, 26. कल्पद्रुमवनालय = कल्पवृक्ष के वन में रहने वाले, 27. निम्ननाभि = गहरी नाभि वाले, 28. स्थूलकुक्षि = मोटे पेटवाले, 29. पीनवक्षा = चौड़ी छाती वाले, 30. बृहद्भुज = लम्बी भुजाओं वाले।

पीनस्कन्धः कम्बुकण्ठो लम्बोष्ठो लम्बनासिकः ।
सर्वावयवसम्पूर्णः सर्वलक्षणलक्षितः ।। 5 ।।

अर्थात् :- 31. पीनस्कन्ध = चौड़े कन्धों वाले, 32. कम्बुकण्ठ = शंख के समान कण्ठवाले, 33. लम्बोष्ठ = बड़े-बड़े ओठ वाले, 34. लम्बनासिक = लम्बी नाक वाले, 35. सर्वावयवसम्पूर्ण = सभी अंगों से परिपूर्ण, 36. सर्वलक्षण-लक्षित = सभी शुभ लक्षणों से युक्त।

इक्षुचापधरः शूली कान्तिकन्दलिताश्रयः ।
अक्षमालाधरो ज्ञानमुद्रावान् विजयावहः ।। 6 ।।

अर्थात् :- 37. इक्षुचापधर = ईख के धनुष को धारण करने वाले, 38. शूली = शूल धारण करने वाले, 39. कान्तिकन्दलिताश्रय = शोभायमान गण्डस्थल से युक्त, 40. अक्षमालाधर = अक्षमाला धारण करने वाले, 41. ज्ञानमुद्रावान् = ज्ञानमुद्रा में स्थित, 42. विजयावह = विजयप्रदता।

कामिनीकामनाकाममालिनीकेलिलालितः ।
अमोघसिद्धिराधार आधाराधेयवर्जितः ।। 7 ।।

अर्थात् :- 43. कामिनीकामनाकाममालिनीकेलिलालित = कामनियों की कामना-रूपी कमलकला की क्रीडा से प्रसन्न होने वाले, 44. अमोघसिद्धि = अमोघ सिद्धि स्वरुप, 45. आधार = आधार स्वरुप, 46. आधाराधेयवर्जित = जिनका कोई आधार नहीं और जो किसी पर आश्रित नहीं।

इन्दीवरदलश्याम इन्दुमण्डलनिर्मलः ।
कर्मसाक्षी कर्मकर्ता कर्माकर्मफलप्रदः ।। 8 ।।

अर्थात् :- 47. इन्दीवरदलश्याम = नीलकमल पत्र के समान श्याम वर्णवाले, 48. इन्दुमण्डलनिर्मल = चन्द्रमण्डल के समान निर्मल, 49. कर्मसाक्षी = सभी कर्मों के साक्षी, 50. कर्मकर्ता = सभी कर्मों की मूलशक्ति, 51. कर्माकर्मफलप्रद = कर्म और अकर्म ( पाप )- का फल देने वाले।

कमण्डलुधरः कल्पः कपर्दी कटिसूत्रभृत् ।
कारुण्यदेहः कपिलो गुह्यागमनिरुपितः ।। 9 ।।

अर्थात् :- 52. कमण्डलुधर = कमण्डलु धारण करने वाले, 53. कल्प = नियम के स्वरुप, नियामक, 54. कपर्दी = केशसज्जायुक्त, 55. कटिसूत्रभृत् = कमर में मेखला धारण किये हुए, 56. कारुण्यदेह = करुणामूर्ति, 57. कपिल = रक्त आभायुक्त, 58. गुह्यागमनिरूपित = रहस्यमय तन्त्रों में वर्णित।

गुहाशयो गुहाब्धिस्थो घटकुम्भो घटोदरः ।
पूर्णानन्दः परानन्दो धनदो धरणीधरः ।। 10 ।।

अर्थात् :- 59. गुहाशय = ( भक्तों के ) हृदय में विराजमान, 60. गुहाब्धिस्थ = हृदय समुद्र में स्थित, 61. घटकुम्भ = घड़े के समान गण्डस्थल वाले, 62. घटोदर = घड़े के समान पेटवाले, 63. पूर्णानन्द = पूर्णानन्दस्वरूप, 64. परानन्द = आनन्द की पराकाष्ठा, 65. धनद = समृद्धि प्रदाता, 66. धरणीधर = पृथ्वी को धारण करने वाले।

बृहत्तमो ब्रह्मपरो ब्रह्मण्ये ब्रह्मवित्प्रियः ।
भव्यो भूतालयो भोगदाता चैव महामनाः ।। 11 ।।

अर्थात् :- बृहत्तम = सबसे बड़े, 68. ब्रह्मपर = परब्रह्म, 69. ब्रह्मण्य = ब्रह्मानुवर्ती, 70. ब्रह्मवित्प्रिय = ब्रह्मज्ञानियों के प्रिय, 71. भव्य = सुन्दर, 72. भूतालय = भूतसमुह के आश्रय, 73. भोगदाता = भोग प्रदान करने वाले, 74. महामना = जिनका हृदय विशाल है।

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