Maha Ganapati Stotram / श्री महा गणपति स्तोत्रम्

Sri Maha Ganapati Stotram
श्री महा गणपति स्तोत्रम्


योगं योगविदां विधूतविविधव्यासङ्गशुद्धाशय-

प्रादुर्भूतसुधारसप्रसृमरध्यानास्पदाध्यासिनाम् ।

आनन्दप्लवमानबोधमधुरामोदच्छटामेदुरं
तं भूमानमुपास्महे परिणतं दन्तावलास्यात्मना ।। 1 ।।

अर्थात् :- सांसारिक विषय वासनाओं से व्युपरत अमलात्मा योगियों के ध्यान एवं विशुद्ध अन्तःकरण में जो रसप्रवाह का संचार करते हैं, जो चिदानन्द-स्वरुप हैं एवं मधुरामोद घंटाओं से सदा युक्त रहते हैं, दन्त पंक्तियों से जिनके मुखमण्डल की अपूर्व शोभा हो रही है – इस प्रकार भूमास्वरुप परमात्मा श्रीगणेशजी की मैं सविधि शरण ग्रहण करता हूँ।

तारश्रीपरशक्तिकामवसुधारूपनुगं यं विदु-
स्तस्मै स्यात्प्रणतिर्गणाधिपतये यो रागिणाऽभ्यर्थ्यते ।

आमन्त्र्य प्रथमं वरेति वरदेत्यार्तेन सर्वं जनं
स्वामिन्मे वशमानयेति सततं स्वाहादिभिः पूजितः ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो प्रणव, श्रीं, ह्रीं, क्लीं, ग्लौं और गं इत्यादि सभी बीज स्वरुप हैं ; अनुरागशील विद्वान् जिनकी उपासना में सदा परायण रहते हैं ; जो वर हैं और वरद भी हैं, सभी विघ्नों के स्वामी हैं, वे स्वाहा आदि द्वारा पूजित गणपति सभी लोगों को मेरे वश में कर दें।

कल्लोलाञ्चलचुम्बिताम्बुदतताविक्षुद्रवाम्भोनिधौ
द्वीपे रत्नमये सुरद्रुमवनामोदैकमेदस्विनि ।

मूले कल्पतरोर्महामणिमये पीठेऽक्षराम्भोरुहे
षट्कोणाकलितत्रिकोणरचनासत्कीर्णकेऽमुं भजे ।। 3 ।।

अर्थात् :- इक्षुरस से पूर्ण समुद्र की जो तरंगे मेघों का चुम्बन करती हैं, उस समुद्र में एक सुन्दर रसमय द्वीप है, उस द्वीप में कल्प वृक्षों का एक मनोहर वन है, उस वन में पृथिवी के ऊपर षट्कोण के मध्य में त्रिकोण है, उस त्रिकोण के मध्य में एक सुन्दर मणिमय पीठ बना हुआ है, उस पीठ में वर्णमालाओं के द्वारा निर्मित एक सुन्दर कमल बना हुआ है, उस कमल पर विराजमान जो भगवान् गणपतिजी हैं उसका मैं भजन करता हूँ।

चक्रप्रासरसालकार्मुकगदासद्वीजपूरद्विज-
व्रीह्यग्रोत्पलपाशपङ्कजकरं शुण्डाग्रजाग्रद्घटम् ।

आश्लिष्टं प्रियया सरोजकरया रत्नस्फुरद्भूषया
माणिक्यप्रतिमं महागणपतिं विश्वेशमाशास्महे ।। 4 ।।

अर्थात् :- जो हाथों में चक्र, अंकुश, आम्रफल, धनुष, गदा, बीजपूर, दाँत, धान्यांकुर, नीलकमल, पाश और श्वेत कमल धारण किये हुए हैं ; जिन्होंने शुण्डाग्र भाग में धनपूर्ण कलश धारण कर रखा है ; दिव्य आभूषणों से आभूषित तथा हाथ में कमलपुष्प धारण करने वाली लक्ष्मीजी जिनमें सदा आश्लिष्ट रहती हैं, जो माणिक्य के समान सुन्दर हैं, उन महागणपति विश्वेश्वर की मैं उपासना करता हूँ।

दानाम्भःपरिमेदुरप्रसृमरव्यालम्बिरोलम्बभृ-
त्सिन्दूरारुणगण्डमण्डलयुगव्याजात्प्रशस्तिद्वयम् ।

त्रैलोक्येष्टविधानवर्णसुभगं यः पद्मरागोपमं
धत्ते सश्रियमातनोतु सततं देवो गणानां पतिः ।। 5 ।।

अर्थात् :- सिन्दूर-मिश्रित जिन के गण्डस्थलों से निकले मदजल प्रवाह में लोभी भ्रमर संलग्न हैं और भक्तों के कल्याण के लिये जिनके दोनों प्रशस्त गण्डभाग अरुण वर्ण को धारण किये हुए हैं और जिन्होंने तीनों लोकों के अभीष्ट विधान के लिये ही पद्मरागमणि की तरह रक्तवर्ण को धारण किया है, वे भगवान् गणेश मुझे समृद्धि सहित कल्याण प्रदान करें।

भ्राम्यन्मन्दरघूर्णनापरवशक्षीराब्धिवीचिच्छटा-
सच्छायाश्चलचामरव्यतिकरश्रीगर्वसर्वङ्कषाः ।

दिक्कान्ताघनसारचन्दनरसासाराश्रयन्तां मनः
स्वच्छन्दप्रसरप्रलिप्तवियतो हेरम्बदन्तत्विषः ।। 6 ।।

अर्थात् :- योगनिद्राकाल में भगवान् गणेश की नासिका से निर्गत घूर्णाहट शब्द ने क्षीर समुद्र की लहरों से निकली हुई ध्वनि को तिरस्कृत कर दिया एवं स्वच्छन्द मन की गति के समान आकाश पर्यन्त बुद्धिभाव को प्राप्त होने वाले हेरम्बदन्त की कान्ति ने दिगन्तस्थित कामिनियों के सुन्दर-सुन्दर अंगों को तथा स्वर्ग को भी स्पर्श कर लिया।

मुक्ताजालकरम्बितप्रविकसन्माणिक्यपुञ्जच्छटा-
कान्ताः कम्बुकदम्बचुम्बितवनाभोगप्रवालोपमाः ।

ज्योत्स्नापूरतरङ्गमन्थरतरत्सन्ध्यावयवश्चिरं
हेरम्बस्य जयन्ति दन्तकिरणाकीर्णाः शरीरत्विषः ।। 7 ।।

अर्थात् :- वक्रतुण्ड में सुशोभित मुक्ताजल एवं मणियों के संसर्ग से समुत्पन्न एक अपूर्व गुलाबी छटा भगवान् श्रीगणेशजी की शरीर-कान्ति को गुलाबी बना रही है, शंख-समूह एवं जलप्रदेशीय प्रवालों की संयुक्त प्रभा भी भगवान् गणेश की शारीरिक गुलाबी कान्ति का संकेत कर रही है, उदीयमान चन्द्रमा तथा अस्ताचलगामी सूर्य- इन दोनों के सम्मिलन से समुत्पन्न सान्ध्य ज्योति भी भगवान् गणेश की शरीर कान्ति को गुलाबी बना रही है – इस प्रकार भगवान् गणेश की शरीरस्थ गुलाबी आभा को दन्तों की शुभ्रकान्ति अधिक प्रभावित कर विश्व का मंगल करे।

शुण्डाग्राकलितेन हेमकलशेनावर्जितेन क्षरन्-
नानारत्नचयेन साधकजनान्संभावयन्कोटिशः ।

दानामोदविनोदलुब्धमधुपप्रोत्सारणाविर्भव-
त्कर्णान्दोलनखेलनो विजयते देवो गणग्रामणीः ।। 8 ।।

अर्थात् :- जो भगवान् श्रीगणपतीजी शुण्डाग्र भाग के द्वारा धारण किये हुए सुवर्ण कुम्भ के द्वारा नाना प्रकार के रत्नों को उड़ेल करके भक्तजनों के मानों का रंजन करते हैं और दानवारि की सुगन्ध से विनोद परायण मधुलुब्ध भ्रमरों को जो कर्णान्दोलन क्रीड़ा के द्वारा निवारण करते हैं, उन गणसमूह के नायक विनायक देव की सदा विजय हो।

हेरम्बं प्रणमामि यस्य पुरतः शाण्डिल्यमूले श्रिया
बिभ्रत्याम्बुरुहे समं मधुरिपुस्ते शङ्खचक्रे वहन् ।

न्यग्रोधस्य तले सहाद्रिसुतया शंभुस्तथा दक्षिणे
बिभ्राणः परशुं त्रिशूलमितया देव्या धरण्या सह ।। 9 ।।

अर्थात् :- विल्ववृक्ष के मूल भाग में जिन श्रीगणेशजी के सम्मुख दोनों हाथों में दो कमलपुष्पों को धारण की हुई लक्ष्मीजी के साथ शंख-चक्रधारी भगवान् विष्णु विराजमान हैं और जिन विनायक देव की दक्षिण दिशा में गंगाजी को मस्तक पर लेकर हाथों में परशु तथा त्रिशूल धारणकर भगवती धरती उमादेवी के साथ बरगद के मूल में भगवान् शिव विराजमान हैं, उन हेरम्ब भगवान् को प्रणाम करता हूँ।

पश्चात्पिप्पलमाश्रितो रतिपतिर्देवस्य रत्योत्पले
बिभ्रत्या सममैक्षवं धनुरिपून्पौष्पान्वहन्पञ्च च ।

वामे चक्रगदाधरः स भगवान्क्रोडः प्रियङ्गोस्तले
हस्ताेद्यच्छुकशालिमञ्जरिकया देव्या धरण्या सह ।। 10 ।।

अर्थात् :- अश्वत्थमूल में जिन भगवान् हेरम्बदेव के पश्चिम भाग में कामदेव दोनों हाथों में कमल के दो पुष्पों को धारण करने वाली अपनी भार्या रति के साथ वाम हाथ में इक्षुनिर्मित धनुष एवं दक्षिण हाथ में पंचबाणों को धारण कर विराजमान हैं, जिन भगवान् गणपति के वामभाग में ऊपर की हुई दोनों हथेलियों में शुक पक्षी तथा शालि-मंजरी को धारण की हुई पृथिवी के साथ भगवान् वराह प्रियंगुलता के नीचे विराजमान हैं – उन हेरम्ब को मैं प्रणाम करता हूँ।

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