Mahaganapati Sahasranama Stotram / श्री महागणपति सहस्रनाम

श्री महागणपति सहस्रनाम स्तोत्रम्
Sri Mahaganapati Sahasranama Stotram


व्यास उवाच

कथं नाम्नां सहस्त्रं स्वं गणेश उपदिष्टवान् ।
शिवायैतन्ममाचक्ष्व लोकानुग्रहतत्पर ।। 1 ।।

अर्थात् :- व्यास जी ने पूछा – सम्पूर्ण लोकों के ऊपर अनुग्रह में तत्पर रहने वाले पितामह ! गणेशजी ने भगवान् शिव के प्रति अपने सहस्त्र नामों का उपदेश किस प्रकार किया, यह मुझे बताइये।

ब्रह्मोवाच
देव एवं पुरारातिः पुरत्रयजयोद्यमे ।
अनर्चनाद् गणेशस्य जातो विघ्नाकुलः किल ।। 2 ।।

अर्थात् :- ब्रह्माजी ने कहा – ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकाल में त्रिपुरारि महादेव जी ने जब त्रिपुरविजय के लिये उद्योग किया, उस समय पहले गणेशजी की अर्चना न करने के कारण वे विघ्नों से घिर गये।

मनसा स विनिर्धार्य ततस्तद्विघ्नकारणम् ।
महागणपतिं भक्त्या समभ्यर्च्य यथाविधि ।। 3 ।।

विघ्नप्रशमनोपायमपृच्छदपराजितः ।
संतुष्टः पूजया शम्भोर्महागणपतिः स्वयम् ।। 4 ।।

सर्वविघ्नैकहरणं सर्वकामफलप्रदम् ।
ततस्तस्मै स्वकं नाम्नां सहस्त्रमिदमब्रवीत् ।। 5 ।।

अर्थात् :- तदनन्तर विघ्न का क्या कारण है, यह मन-ही-मन निश्चय करके शिवजी ने भक्तिभाव से महागणपति की विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देव ने उनसे विघ्नशान्ति का उपाय पूछा। भगवान् शिव द्वारा की गयी उस पूजा से संतुष्ट होकर महागणपति ने स्वयं उनसे अपने इस सहस्त्र नाम का वर्णन किया। यह समस्त विघ्नों का एकमात्र हरण करने वाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलों को देने वाला है। —

विनियोग

अस्य श्रीमहागणपतिसहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपतिर्ऋषिः। अनुष्टप् छन्दः। महागणपतिर्देवता। गं बीजम्। हुं शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपादौ विनियोगः।

अर्थात् :- इस ‘ श्रीमहागणपतिसहस्त्रनामस्तोत्र-मन्त्र ‘ के ‘ महागणपति ‘ ऋषि हैं, ‘ अनुष्टप् ‘ छन्द है, ‘ महागणपति ‘ देवता हैं, ‘ गं ‘ बीज है, ‘ हुं ‘ शक्ति है एवं ‘ स्वाहा ‘ कीलक है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये जप आदि में इसका विनियोग होता है।

ऋष्यादिन्यास

ॐ महागणपतये ऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे। महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि। गं बीजाय नमः, गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः। स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ।

इन छः वाक्यों को पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभिका स्पर्श दाहिने हाथ से करे।

ध्यान
हस्तीन्द्राननमिन्दुचूडमरूणच्छायं त्रिनेत्रं रसा-
दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम् ।

बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पाल-
व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे ।।

अर्थात् :- जिनका गजराज के समान मुख है; जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है ; जिनकी अंगकान्ति अरुण है ; जो तीन नेत्रों से सुशोभित हैं ; जिन्हें हाथ में कमल धारण करने वाली अंकगत प्रिया ( सिद्धलक्ष्मी )- का परिष्वंग सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथों में क्रमशः बीजापूर ( बिजौरा नीबू या अनार ), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, कमल, पाश, उत्पल, धान की बाल तथा अपना ही टूटा दाँत धारण करते हैं एवं शुण्ड में रत्नमय कलश लिये हुए हैं, उन गणपति का मैं भजन ( ध्यान ) करता हूँ।

गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् ।
द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ।।

कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः ।
रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् ।
माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ।।

अर्थात् :- गणेशजी के गण्डस्थल से मद की धारा बह रही है। उसका आस्वादन करने के लिये भ्रमरों की भीड़ टूटी पड़ती है। उन भ्रमरों को वे अपने ताडपत्र के समान कानों द्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्ड के अग्रभाग में माणिक्य-निर्मित कलश ले रखा है, जिसके मुखभाग से रत्नों की वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा वे अपने धनार्थी साधक भक्तों को तृप्त कर रहे हैं। कपोलों पर झरते हुए मद से वे विह्वल हैं। उनके मस्तक पर मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणों से विभूषित हैं। ऐसे महागणपति का मैं ध्यान करता हूँ।

इस तरह ध्यान करके ‘ ॐ गणेश्वरः ‘ इत्यादि से आरम्भ होनेवाले ‘ श्रीमहागणपतिस्तोत्र ‘ का पाठ करना चाहिये —

ॐ गणेश्वरो गणक्रीडो गणनाथो गणाधिपः ।
एकदंष्ट्रो वक्रतुण्डो गजवक्त्रो महोदरः ।। 6 ।।

अर्थात् :- ॐ सच्चिदानन्द स्वरुप, 1. गणेश्वरः – आकाशादि प्रपंच के समूह को ‘ गण ‘ कहते हैं, वह गण उनका स्वरुप हैं, इसलिये जिन्हें ‘ गणेश्वर ‘ कहा गया, वे श्रीगणेश ; 2. गणक्रीडः – गणक्रीड-नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गण के भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करने के कारण ‘ गणक्रीड ‘ नाम से प्रसिद्ध ; 3. गणनाथः – गणों के नाथ एवं जिनका गणन – गुणों की गणना करना मंगलमय है, वे भगवान् गणपति ; 4. गणाधिपः – आदित्यादि गणदेवताओं के अधिपति ; 5. एकदंष्ट्र – भूमिका उद्धार अथवा जगत् का नाश करने के निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा ( दाढ़ ) है, वे भगवान् गणेश ; 6. वक्रतुण्डः – वक्र – टेढ़े, तुण्ड – शुण्ड-दण्ड से युक्त ; 7. गजवक्त्रः – गज अर्थात् हाथी के समान मुखवाले ; 8. महोदरः – अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड को अपने भीतर रखने के कारण महान् उदरवाले।

लम्बोदरो धूम्रवर्णो विकटो विघ्ननायकः ।
सुमुखो दुर्मुखो बुद्धो विघ्नराजो गजाननः ।। 7 ।।

अर्थात् :- 1. लम्बोदरः – ब्रह्माण्ड के आलम्बन रूप उदरवाले ; 10. धूम्रवर्णः – धूम्र के समान वर्णवाले ; अथवा वायु का बीज धूम्रवर्ण का है, तत्स्वरूप होने के कारण गणेशजी भी ‘ धूम्रवर्ण ‘ कहे गये हैं ; 11. विकटः – कट अर्थात् आवरण से रहित विभूस्वरूप ; 12. विघ्ननायकः – अभक्त समुदाय के प्रति विघ्नों का नयन करने वाले; या विघ्नों के अधिपति ; अथवा प्राणियों का विहनन एवं नयन करने वाले ; 13. सुमुखः – मुख का अर्थ है- आरम्भ; जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; अथवा सुन्दर मुखवाले; 14. दुर्मुखः – जिनके मुख का स्पर्श करना दुष्कर है ; अथवा अग्नि और सूर्य के रूप में जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; 15. बुद्धः – नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्ति के नाशक; अथवा बुद्धावतार स्वरुप; 16. विघ्नराजः – विघ्नों के साथ विराजमान ; अथवा विघ्नों के राजा ; किंवा जो विघ्न-भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश ; 17. गजाननः – गजों – हाथियों को अनुप्राणित – प्राणशक्ति से सम्पन्न करने वाले।

भीमः प्रमोद आमोदः सुरानन्दो मदोत्कटः ।
हेरम्बः शम्बरः शम्भुर्लम्बकर्णो महाबलः ।। 8 ।।

अर्थात् :- 18. भीमः – दुष्टों के लिये भयदायक होने से ‘ भीम ‘ नाम से प्रसिद्ध ; 19. प्रमोदः – अभीष्ट वस्तु के लाभ से होने वाले सुख का नाम है – ‘ प्रमोद ‘, तत्स्वरूप ; 20. आमोदः – प्रमोद से पहले अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के निश्चय से जो सुख होता है, उसे ‘ आमोद ‘ कहते हैं, ऐसे आमोद स्वरुप; 21. सुरानन्दः – देवताओं के लिये आनन्दप्रद ; 22. मदोत्कटः – गण्डस्थल से झरने वाले मद के कारण उत्कट; अथवा मद से आवरण का उत्क्रमण करने वाले; 23. हेरम्बः – ‘ हे ‘ का अर्थ है – शंकर तथा ‘ रम्ब ‘ का अर्थ है – शब्द। शैवागम के प्रवर्तक होने से ‘ हेरम्ब ‘ नामवाले ; अथवा उद्यम-शौर्य से युक्त होने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध ; 24. शम्बरः – ‘ शम् ‘ अर्थात् सुख है वर – श्रेष्ठ जिनमें, वे; 25. शम्भुः – जिनसे ‘ शम् ‘ अर्थात् कल्याण का उद्भव होता है, वे; 26. लम्बकर्णः – भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजी का आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं। इसलिये लम्बे – सुदूरतक सुनने वाले कान हैं जिनके, वे; 27. महाबलः – जिनके अनुग्रह से बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली।

नन्दनोऽलम्पटोऽभीरुर्मेघनादो गणञ्जयः ।
विनायको विरूपाक्षो धीरशूरो वरप्रदः ।। 9 ।।

अर्थात् :- 28. नन्दनः – समृद्धि के हेतुभूत; 29. अलम्पटः – पर्याप्त पट – वस्त्रों से समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; 30. अभीरुः – भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्री से रहित; 31. मेघनादः – मेघगर्जनो के समान नाद या सिंहनाद करने वाले; अथवा मेघों के नाशक; 32. गणञ्जयः – शत्रु-समूहों पर अनायास विजय पाने वाले; 33. विनायकः – ‘ वि ‘ अर्थात् पक्षिरूप जीव-समुदाय के नेता या नायक; 34. विरुपाक्षः – विरुप-विकट दीखने वाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रों से युक्त ; 35. धीरशूरः – धैर्य और शौर्य से सम्पन्न ; 36. वरप्रदः – अपने भक्तजनों को उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करने वाले।

महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः ।
रूद्रप्रियो गणाध्यक्ष उमापुत्रोऽघनाशनः ।। 10 ।।

अर्थात् :- 37. महागणपतिः – गुल्म आदि सेना-भेदों को ‘ गण ‘ कहते हैं; वे जिनकी अधीनता में महान् – बहु-संख्यक हैं, वे; अथवा महागणों के अधिपति; 38. बुद्धिप्रियः – निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; 39. क्षिप्रप्रसादनः – भक्तों द्वारा ध्यान किये जाने पर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होने वाले;  40. रुद्रप्रियः – ग्यारहों रुद्रों के प्रिय; 41. गणाध्यक्षः – छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदाय के पालक; 42. उमापुत्रः – पार्वती के पुत्र ( उमा का पुन्नामक नरक लोक से उद्धार करने वाले ); 43. अघनाशनः – लम्बोदर या महोदर होने पर भी स्वल्पमात्र नैवेद्य से तृप्त होने वाले ( अघन-स्वल्प है अशन- भोजन जिनका, वे ); अथवा अघके फलस्वरूप दुःखों का नाश करने वाले।

कुमारगुरुरीशानपुत्रो मूषकवाहनः ।
सिद्धिप्रियः सिद्धिपतिः सिद्धः सिद्धिविनायकः ।। 11 ।।

अर्थात् :- 44. कुमारगुरुः – सनत्कुमार – स्वरुप होते हुए विद्या का उपदेश करने के कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेय से भी पहले उत्पन्न होने के कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; 45. ईशानपुत्रः – भगवान् शंकर के आत्मज; 46. मूषकवाहनः – मूषक ( चूहे )- को वाहन बनाने के कारण उक्त नाम से प्रसिद्ध; 47. सिद्धिप्रियः – अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; 48. सिद्धिपतिः – अणिमा आदि आठ सिद्धियों के पालक; 49. सिद्धः – गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; 50. सिद्धिविनायकः – भक्तों तक सिद्धि का नयन करने वाले ( भक्तों को सिद्धि प्राप्त कराने वाले )।

अविघ्नस्तुम्बुरूः सिंहवाहनो मोहिनीप्रियः ।
कटंकटो राजपुत्रः शालकः सम्मितोऽमितः ।। 12 ।।

अर्थात् :- 51. अविघ्न – अविभाव; अर्थात् पशुता का हनन ( हरण ) करने वाले; अथवा विघ्नों से रहित; 52. तुम्बुरूः – तुम्ब ( अलावू या लौकी )- के द्वारा जो रव करता है, वह ‘ तुम्बुरु ‘ है। तुम्बुरु नाम है – वीणा का। वीणा पर गणपति का यशोगान होने से वे ‘ तुम्बुरु ‘ नाम से प्रसिद्ध हैं; 53. सिंहवाहनः – मोर और मूषक की भाँति सिंह को भी वाहन बनाने वाले; अथवा सिंहवाहिनी देवी से अभिन्न होने के कारण सिंहवाहन; 54. मोहिनीप्रियः – मोहिनीपति शिव से अभिन्न; 55. कटंकटः – ‘ कट ‘ का अर्थ है – आवरण अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञान को भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये ‘ कटंकट ‘ नाम से प्रसिद्ध हैं; 56. राजपुत्रः – राजा वरेण्य के यहाँ पुत्रवत् आचरण करने वाले; अथवा राजा-चन्द्रमा को पुत्रवत् मानने वाले; 57. शालकः – ‘ श ‘ ‘ परोक्ष ‘ अर्थ में है और ‘ अलक ‘ शब्द ‘ केश ‘ या अंश का वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे ‘ शालक ‘ हैं ; अथवा शालित-शोभित होते हैं, इसलिये ‘ शालक ‘ हैं ; 58. सम्मितः – सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठ मात्र से मित; 59. अमितः – अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ – चारों प्रकार के प्रमाणों से मित न होने वाले।

कूष्माण्डसामसम्भूतिर्दुर्जयो धूर्जयो जयः ।
भूपतिर्भुवनपतिर्भूतानां पतिरव्ययः ।। 13 ।।

अर्थात् :- 60. कूष्माण्डसामसम्भूतिः – ‘ कूष्माण्डैर्जुहुयात् ‘ । – इस कूष्माण्ड – होमविधि में जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजी की विभूति हैं। अतएव वे उक्त नाम से प्रसिद्ध हैं ; 61. दुर्जयः – बलवान् दैत्य जिन्हें मन से भी जीत नहीं सकते, ऐसे ; 62. धूर्जयः – जगच्चक्र की धुरी को अनायास वहन करने वाले; 63. जयः – जयस्वरूप; अथवा जय-महाभारत आदि इतिहास-पुराण जिनके रूप हैं, वे ; 64. भूपतिः – पृथ्वी के पालक, अथवा भूपति-नाम से प्रसिद्ध अग्निभ्राता; 65. भुवनपतिः – समस्त भुवनों के स्वामी; अथवा उक्त नाम वाले अग्निभ्राता ; 66. भूतानाम्पतिः – समस्त भूतों के पालक अथवा भूतपति-नामक अग्निभ्राता ; 67. अव्ययः – अविनाशी।

विश्वकर्ता विश्वमुखो विश्वरूपो निधिर्घणिः ।
कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः ।। 14 ।।

अर्थात् :- 68. विश्वकर्ता – संसार के स्त्रष्टा; 69. विश्वमुखः – जिनसे विश्व का मुख- आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुख में हैं ; या जो मुख की भाँति विश्व की वृत्ति के हेतु हैं, वे गणेश; 70. विश्वरूपः – सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा-प्रजापति के पुत्र देवपुरोहित विश्वरूप से अभिन्न; 71. निधिः – आकाश आदि सम्पूर्ण जगत्समूह जिनमें पूर्ण रूप से आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव निधि स्वरुप; 72. कविः – सृष्टिरूप काव्य के कर्ता; 74. कवीनामृषभः – कवियों में श्रेष्ठ; 75. ब्रह्मण्यः – ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्मा के प्रति सद्भाव रखने वाले; 76. ब्रह्मणस्पतिः – ब्रह्म अर्थात् वाणी के अधिपति।

ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिप्रियपतिप्रियः ।
हिरण्मयपुरान्तःस्थः सूर्यमण्डलमध्यगः ।। 15 ।।

अर्थात् :- 77. ज्येष्ठराजः – ‘ ज्येष्ठ ‘- संज्ञक साम में राजमान; 78. निधिपतिः – नव विधियों के परिपालक; 79. निधिप्रियपतिप्रियः – निधियों को प्रिय मानने वाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; 80. हिरण्मयपुरान्तःस्थः – हिरण्यपुर- दहराकाश के मध्य में विराजमान; ( चिन्मय ब्रह्म के निवास स्थान अन्तर्हृदय में विद्यमान ) ; 81. सूर्यमण्डलमध्यगः – सूर्यमण्डल के भीतर स्थित।

कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः पूषदन्तभित् ।
उमाङ्ककेलिकुतुकी मुक्तिदः कुलपालनः ।। 16 ।।

अर्थात् :- 82. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः – जिन्होंने अपने शुण्डदण्ड के आघात से समुद्र के जल को विध्वस्त ( निष्कासित ) कर दिया था, वे; 83. पूषदन्तभित् – वीरभद्र रूप से दक्ष-यज्ञ में पूषा के दाँत को तोड़ने वाले; 84. उमाङ्ककेलिकुतुकी – उमा के अंक में बैठकर बालोचित क्रीड़ा करने का कौतूहल रखने वाले; 85. मुक्तिदः – कारागार की बेड़ी से छुड़ाने वाले तथा मोक्षदाता; 86. कुलपालनः – वंश के तथा कौलतन्त्र के भी पालक।

किरीटी कुण्डली हारी वनमाली मनोमयः ।
वैमुख्यहतदैत्यश्रीः पादाहतिजितक्षितिः ।। 17 ।।

अर्थात् :- 87. किरीटी – मस्तक पर मुकुट धारण करने वाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; 88. कुण्डली – कानों में कुण्डल पहनने वाले; अथवा शेषनाग रूपधारी; 89. हारी – मुक्ता आदि मणियों की माला धारण करने वाले; अथवा अत्यन्त मनोहर; 90. वनमाली – कन्धे से लेकर पैरों तक लटकने वाली ‘ वनमाला ‘ धारण करने वाले ; 91. मनोमयः – अपने संकल्प द्वारा निर्मित एक शरीर धारण करने वाले; 92. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः – जिनके विमुख हो जाने के कारण दैत्यों की लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; 93. पादाहतिजितक्षितिः – अपने पैरों के आघात से पृथ्वी को नीचे झुका देनेवाले।

सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली दुर्निमिहृत् ।
दुःस्वप्नहृत् प्रसहनो गुणी नादप्रतिष्ठितः ।। 18 ।।

अर्थात् :- 94. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली – तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंज की मेखला से मण्डित; 95. दुर्निमित्तहृत् – देवमूर्तियों के फूटने, भूकम्प होने तथा महान् उल्कापात आदि के द्वारा सूचित जो दुर्निमित्त ( अपशकुन ) हैं, उनका हनन करने वाले; 96. दुःस्वप्नहृत् – बुरे स्वप्नों के दुष्प्रभाव को दूर करके उन्हें सुस्वप्न में परिणत कर देने वाले; 97. प्रसहनः – भक्तों के अपराध को सहन करने वाले भगवान्, 98. गुणी – अनेक सद्गुणों से सम्पन्न; 99. नादप्रतिष्ठितः – प्रणवनाद के वाच्यार्थ रूप से प्रतिष्ठित।

सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनाश्रयः ।
पीताम्बरः खण्डरदः खण्डेन्दुकृतशेखरः ।। 19 ।।

अर्थात् :- 100. सुरूपः – अधिक लावण्य से युक्त; अथवा उत्तम तत्त्व का निरूपण करने वाले; 101. सर्वनेत्राधिवासः – सबके नेत्रों में द्रष्टा पुरुष के रूप में निवास करने वाले; 102. वीरासनाश्रयः – बायें घुटने पर दायाँ पैर रखकर बैठना ‘ वीरासन ‘ कहलाता है, ऐसे वीरासन से बैठने वाले ; 103. पीताम्बरः -आकाश को पी जानेवाले ; अथवा पीतवस्त्र धारण करने वाले; 104. खण्डरदः – खण्डित दायाँ दाँत धारण करने वाले; 105. खण्डेन्दुकृतशेखरः – भालदेश में आधे चन्द्रमा को धारण करने वाले।

चित्राङ्कश्यामदशनो भालचन्द्रश्चतुर्भुजः ।
योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः ।। 20 ।।

अर्थात् :- 106. चित्राङ्कश्यामदशनः – जिनमें श्यामरंग की अधिकता है, ऐसे; चित्रों से अंकित या अलंकृत श्याम दन्तवाले; 107. भालचन्द्रः – भालदेश में चन्द्रमा को धारण करने वाले; अथवा अष्टमी के चन्द्रमा की भाँति ललाटवाले; 108. चतुर्भुजः – चार भुजवाले; 109. योगाधिपः – ‘ लिङ्गपुराण ‘ में वर्णित जो लकुलीशादि अट्ठाईस योगाचार्यवतार हैं, उनसे अभिन्न रूपवाले; अथवा योगेश्वर; 110. तारकस्थः – तारक अर्थात् प्रणव-मन्त्र के अभिधेय ; 111. पुरुषः – समस्त पुरों- शरीरों में शयन करने वाले साक्षी आत्मा; 112. गजकर्णकः – हाथी के समान विशाल कान वाले।

गणाधिराजो विजयस्थिरो गजपतिध्वजी ।
देवदेवः स्मरप्राणदीपको वायुकीलकः ।। 21 ।।

अर्थात् :- 113. गणाधिराजः – काव्य के पद्यों में जो मगण, यगण, रगण और सगण आदि गण आते हैं, उनसे राजमान- शोभायमान ; अथवा गणों के अधिपति; 114. विजयस्थिरः – भक्तों की विजय में स्थिररूप से प्रवृत्त; 115. गणपतिध्वजी – अपने ध्वज में गजराज का चिह्न धारण करने वाले; 116. देवदेवः – देवताओं के भी देवता – इन्द्र आदि देवताओं के उपास्य; 117. स्मरप्राणदीपकः – रुद्रद्वारा कामदेव के शरीर के दुग्ध कर दिये जाने पर भी उसके प्राणों को उज्जीवित करने वाले ; 118. वायुकीलकः – नवद्वार वाले शरीर में प्राणों का स्तम्भन करने वाले।

विपश्चिद्वरदो नादोन्नादभिन्नबलाहकः ।
वराहरदनो मृत्युञ्जयो व्याघ्राजिनाम्बरः ।। 22 ।।

अर्थात् :- विपश्चिद्वरदः – राजा विपश्चित् को वर देनेवाले; 120. नादोन्नादभिन्नबलाहकः – अपने मन्द या उच्च नाद ( घोष )- से मेघों को छिन्न-भिन्न कर देने वाले; 121. वराहरदनः – महावराह की दंष्ट्रा ( दाढ़ )- की शोभा को तिरस्कृत करने वाले एक दाँत से सुशोभित; 122. मृत्युञ्जयः – काल, मृत्यु अथवा प्रमाद पर विजय पाने वाले; 123. व्याघ्राजिनाम्बरः – वस्त्र के स्थान में व्याघ्रचर्म को धारण करने वाले।

इच्छाशक्तिधरो देवत्राता दैत्यविमर्दनः ।
शम्भुवक्त्रोद्भवः शम्भुकोपहा शम्भुहास्यभूः ।। 23 ।।

अर्थात् :- 124. इच्छाशक्तिधरः – जगत् की सृष्टि की इच्छा धारण करने वाले होने से इच्छाशक्तिधारी; 125. देवत्राता – दैत्यों के भय से देवताओं की रक्षा करने वाले; 126. दैत्यविमर्दनः – दैत्यों का संहार करने वाले; 127. शम्भुवक्त्रोद्भवः – शिव के मुख से प्रकट होने वाले; 128. शम्भुकोपहा – अपनी बाल-लीलाओं से भगवान् शिव के क्रोध को हर लेने वाले; 129. शम्भुहास्यभूः – नादान बालक की भाँति चेष्टा करके शिव को हँसा देने वाले।

शम्भुतेजाः शिवाशोकहारी गौरीसुखावहः ।
उमाङ्गमलजो गौरीतेजोभूः स्वर्धुनीभवः ।। 24 ।।

अर्थात् :- 130. शम्भुतेजाः – शिव के तेज से सम्पन्न; 131. शिवाशोकहारी – महिषासुर आदि के मर्दनकाल में शिवा ( पार्वती )- के बल एवं उत्साह को बढ़ाकर उनके शोक को हर लेने वाले; 132. गौरीसुखावहः – पार्वतीजी को सुख पहुँचाने वाले; 133. उमाङ्गमलजः – गिरिराजनन्दिनी उमा के अंगों में लगे हुए उबटन के मैल से प्रकट हुए शरीर में प्रवेश करके उसे सप्राण बनाने वाले; 134. गौरीतेजोभूः – गौरी के तेज से उत्पन्न; अथवा पार्वती के तेज की आधारभूमि; 135. स्वर्धुनीभवः – गंगाजी से उत्पन्न स्वामिकार्तिकेय से अभिन्न; अथवा गंगाजी की उत्पत्ति के हेतुभूत।

यज्ञकायो महानादो गिरिवर्ष्मा शुभाननः ।
सर्वात्मा सर्वदेवात्मा ब्रह्ममूर्धा ककुप्श्रुतिः ।। 25 ।।

अर्थात् :- 136. यज्ञकायः – अश्वमेधादि यज्ञस्वरुप; 137. महानादः – उच्चस्वर से गर्जना करने वाले; 138. गिरिवर्ष्मा – विराट् स्वरुप से पर्वतों को शरीर के अवयवरूप में धारण करने वाले; 139. शुभाननः – शुभदायक मुखवाले, अथवा मंगल-नाम वाले प्राण के जनक; 140. सर्वात्मा – सर्वस्वरूप; 141. सर्वदेवात्मा – सकल देवरूप; 142. ब्रह्ममूर्धा – ब्रह्म ही जिनका मस्तक है, वे; 143. ककुप्श्रुतिः – दिशाओं को कान के रूप में धारण करने वाले।