Sri Narsingh Vrat Katha / श्री नृसिंह व्रत कथा

Sri Narsingh Vrat Katha Aur Puja Vidhi
श्री नृसिंह व्रत कथा और पूजा विधि


Sri Narsingh Vrat Katha Aur Puja Vidhi, श्री नृसिंह व्रत कथा और पूजा विधि :- भगवान् श्रीनृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं। वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को नृसिंह भगवान् ने खम्भे को फाड़कर भक्त प्रह्लाद की रक्षार्थ अवतार लिया था। इसलिए इस दिन यह जयन्ती-समारोह मनाया जाता है। हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान् विष्णु ने अपने भक्त के कष्टों का नाश करने के लिए ‘नृसिंह रूप अवतार’ लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था।

श्री नृसिंह पूजा विधि महत्त्व :-

इस तिथि पर व्रत रहकर मध्याहन के समय वैदिक मन्त्रों के उच्चारण से स्नान करना चाहिए। भगवान् नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं। पूजा स्थान को गोबर से लीप कर तथा कलश में ताँबा इत्यादि डालकर उसमें अष्टदल-कमल बनाना चाहिए। फिर नृसिंह भगवान् की मूर्ति का पूजन करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार गोदान, तिल, स्वर्ण तथा वस्त्र आदि का दान देना चाहिए। विजय नगर के राजाओं का नृसिंह मूर्ति ही राजचिन्ह था। 

भगवान् नृसिंह का मन्त्र :-

नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे।
उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जितः ।।

श्री नृसिंह व्रत कथा :-

पुराणों के अनुसार प्राचीन समय में कश्यप नाम के एक राजा थे। उनकी प्राणबल्लभा का नाम महारानी दिति था। दिति से क्रमशः दो पुत्र हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु हुए, जिनमें दूसरे पुत्र हिरण्याक्ष को विष्णु भगवान् ने वाराह रूप धारण करके मार डाला। इसके परिणामस्वरूप हिरण्यकशिपु काफी कुपित हुआ तथा भाई का प्रतिशोध लेने के लिए कठिन तपस्या के द्वारा ब्रह्मा तथा शंकर को प्रसन्न किया। पितामह ब्रह्मा ने उसे ‘ अजेय ‘ होने का वरदान दिया। वरदान के अभिमान से वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा।

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