Sri Sai Baba Vrat Katha / श्री साईं बाबा व्रत कथा और पूजा

Sri Sai Baba Vrat Katha Aur Puja Vidhi
श्री साईं बाबा व्रत कथा और पूजा विधि


Sri Sai Baba Vrat Katha Aur Puja Vidhi, श्री साईं बाबा व्रत कथा और पूजा विधि :- श्री साईंबाबा का गुरुवार को व्रत रखने से मनोइच्छा फल की प्राप्ति होती है। प्रत्येक भक्त समस्त चेतनाओं, इन्द्रियों-प्रकृतियों और मन को एकाग्र कर भी साईं के पूजन और सेवा में लगाकर अपनी शुभ मनोकामनाओं को पूर्ण कर सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। इस व्रत को जो भक्त पूर्ण करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।

श्री साईं बाबा व्रत पूजा विधि :-

श्री साईं बाबा का यह व्रत बहुत ही चमत्कारिक है। इस व्रत को करने से पूर्व हथेली के आकार का एक नया सफ़ेद वस्त्र लेकर उसे हल्दी पाउडर को पानी में घोलकर उसमें डुबाकर सुखा लें। गुरूवार को प्रातः अथवा सांय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात् पूर्व दिशा में स्वच्छ कपड़ा बिछाकर एक आसन पर श्री साईंबाबा की मूर्ति स्थापित करें। उनको चन्दन/कुमकुम का तिलक लगाएँ फूलों की माला चढ़ाएँ और उनके आगे दीप प्रज्वलित कर अगरबत्ती या धुप लगाकर सुगंध निवेदित करें। तत्पश्चात् श्री साईं बाबा के समक्ष बैठकर हल्दी लगे पीले वस्त्र में एक सिक्का रखकर जिस कार्य-सिद्धि के लिए व्रत रख रहे हैं, उस कार्य को निर्विघ्न पूरा करने के लिए साईंबाबा से सच्चे मन से प्रार्थना करते हुए उस सिक्के को उस कपड़े में लपेटकर गाँठ बाँध दें और श्रीसाईं बाबा के चरणों में रख दें। अपने मन में श्रद्धानुसार 5 , 7 , 9 , 11 अथवा 21 गुरुवार को मन्नत मानते हुए यह व्रत आरम्भ करना है, बाद में प्रत्येक गुरुवार को विधिपूर्वक केवल व्रत-कथा का ही पाठ करना है।

गुरुवार को व्रत आरम्भ करते समय इस पुस्तक के मुखपृष्ठ पर दिए गए श्री साईंबाबा के स्वरुप को प्रणाम् करें तथा पुस्तक पर कुछ पुष्प श्री साईं को अर्पित करते हुए श्री साईं अष्टोत्तरशत नामावली का सर्वप्रथम पाठ करें। इसके बाद श्री साईं का ध्यान करते हुए श्री साईंबाबा व्रत-कथा के छः अध्याय पढ़ें। कथा की समाप्ति पर श्री साईं की आरती करें और प्रसाद के रूप में घर पर बनाई खिचड़ी, मिठाई अथवा फल सभी को बाँटें और स्वयं भी ग्रहण करें।

यही श्री साईं व्रत की सम्पूर्ण विधि है। श्री साईं व्रत करने से आने वाले सभी विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं। जीवन में सरलता, सद्बुद्धि तथा पवित्रता आ जाती है। घर में गरीबी या निर्धनता सदैव के लिए दूर होती है। क्लेश-दुःख-दोष आदि दूर हो जाते हैं तथा शांति-आनंद एवं उल्लास का आगमन होता है। यदि श्री साईं व्रत सम्पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास तथा विधिपूर्वक-पूजन सहित किया जाये, तो आर्थिक-सामाजिक-मानसिक पीड़ाएँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं और मन में अपार शांति का अनुभव होता है।

श्री साईं व्रत का प्रसाद वितरण करते समय श्री साईं व्रत-कथा की 11, 21, 51, 101 जैसी आपकी सामर्थ्य हो, पुस्तकें भक्तजनों में बाँटना न भूलें। क्योंकि आपके द्वारा पुस्तक प्राप्त करने वाला यदि आपकी प्रेरणा से इस व्रत को रखेगा तो उतनी ही आपके भाग्योदय की पुण्य-वृद्धि तथा सुख-समृद्धि में बढ़ोत्तरी होगी।

व्रत रखने के नियम :-

  • श्री साईं व्रत को सभी स्त्री-पुरुष यहाँ तक कि बच्चे भी रख सकते हैं।
  • व्रत को शुरू करते समय पहले ही गुरूवार को 5, 7, 9, 11 अथवा 21 गुरूवार व्रत रखने की मन्नत माननी चाहिए।
  • फलाहार करके यह व्रत किया जा सकता है। भोजन मीठा, नमकीन कैसा भी हो सकता है।
  • यह व्रत बहुत चमत्कारी है। माने गए प्रत्येक गुरुवार को विधिपूर्वक व्रत रखने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।
  • जिस कार्य-सिद्धि के लिए आप व्रत कर रहे हों, उसके लिए बाबा से मन-ही-मन पवित्र हृदय से प्रार्थना करें। श्री साईं आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे।
  • श्री साईं बाबा का यह व्रत सूतक, पातक, श्राद्ध सभी शुभ-अशुभ दिनों में भी रखा जा सकता है।
  • यदि गुरुवार को आप यात्रा पर या कहीं बाहर हों तो उस गुरुवार को छोड़कर उसके बाद के गुरुवार का व्रत करें।
  • यदि किसी कारणवश किसी गुरुवार व्रत न कर पाएँ तो उस गुरुवार को गिनती में न लेते हुए मन में किसी प्रकार की शंका न रखते हुए अगले गुरुवार से व्रत जारी रखें, मन्नत के अनुसार जितने गुरुवार व्रत रखने का आपने नियम रखा है, वह पूरे करने के उपरान्त व्रतोद्यापन करें।
  • एक बार मन्नत के अनुसार व्रत पूर्ण करने के बाद फिर मन्नत कर सकते हैं और फिर श्री साईं व्रत कर सकते हैं।
  • व्रत में एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि आपके मन में श्री साईं के प्रति अटूट श्रद्धा एवं समर्पण का भाव रहना चाहिए।

श्री साईं-व्रतोद्यापन :-

  • गुरुवार के व्रत पुरे होने पर उद्यापन करना चाहिए। इस दिन गरीब और लाचार लोगों को भोजन कराना चाहिए एवं पशु-पक्षियों को भोजन डालना चाहिए।
  • अपने स्नेहीजनों को भी इस व्रत का माहात्म्य समझाएँ। इसके लिए ज्ञान गंगा एण्ड को० पब्लिशर्ग, कैलाश नगर, दिल्ली, द्वारा प्रकाशित ” श्री साईंबाबा व्रत-कथा ” सामर्थ्य के अनुसार पुस्तकें भी श्रद्धालुओं को मुफ्त में बाँटें।   
  • जो पुस्तकें बाँटनी हैं, उनके आवरण पर श्री साईंबाबा के चित्र पर तिलक कर श्रद्धापूर्वक अपने स्नेही इष्ट-मित्रों को देवें।
  • विधिपूर्वक व्रत रखने एवं उद्यापन करने से आपकी सभी मनोकामनाएँ अवश्य पूर्ण होंगी, इसमें जरा भी संशय नहीं है।

श्री साईं अष्टोत्तरशत नामावली :-

  1. ॐ श्री साईंनाथाय नमः। 2. ॐ श्री साईं लक्ष्मीनारायणाय नमः। 3. ॐ श्री साईं कृष्णरामशिवमारुत्यादि रुपास नमः।  4. ॐ श्री साईं शेषशायिने नमः।  5. ॐ श्री साईं गोदावरीतटशीलधीवासिने नमः। 6. ॐ श्री साईं भक्तहृदालयाय नमः।  7. ॐ श्री साईं सर्वहृन्निलयाय नमः।  8. ॐ श्री साईं भूतावासाय नमः।  9. ॐ श्री साईं भूतभविष्यद्भाववर्जिताय नमः।  10. ॐ श्री साईं कालातीताय नमः।  11. ॐ श्री साईं कालाय नमः।  12. ॐ श्री साईं कालकालाय नमः।  13. ॐ श्री साईं कालदर्पदमनाय नमः। 14. ॐ श्री साईं मृत्युन्जयाय नमः।  15. ॐ श्री साईं अमर्त्याय नमः।  16. ॐ श्री साईं मर्त्याभयप्रदाय नमः।  17. ॐ श्री साईं जीवधाराय नमः।  18. ॐ श्री साईं सर्वाधाराय नमः।  19. ॐ श्री साईं भक्तावनसमार्थाय नमः।  20. ॐ श्री साईं भक्तवानप्रतिज्ञाय नमः। 21. ॐ श्री साईं अन्नवस्त्रदाय नमः।  22. ॐ श्री साईं आरोग्यक्षेमदाय नमः। 23. ॐ श्री साईं धनमाङ्गल्यप्रदाय नमः। 24. ॐ श्री साईं ऋद्धिसिद्धिप्रदाय नमः। 25. ॐ श्री साईं पुत्रमित्रकलत्रबन्धुदाय नमः । 26. ॐ श्री साईं योगक्षेमवहाय नमः। 27. ॐ श्री साईं आपदबन्धवाय नमः। 28. ॐ श्री साईं मार्गबन्धवे नमः। 29. ॐ श्री साईं भुक्तिमुक्तिस्वर्गापवर्गदाय नमः।  30. ॐ श्री साईं प्रियाय नमः। 31. ॐ श्री साईं प्रीतिवर्धनाय नमः। 32. ॐ श्री साईं अन्तर्यामिने नमः। 33. ॐ श्री साईं सच्चिदात्मने नमः। 34. ॐ श्री साईं नित्यानन्दाय नमः। 35. ॐ श्री साईं परमसुखदाय नमः। 36. ॐ श्री साईं परमेश्वराय नमः। 37. ॐ श्री साईं परब्रह्मणे नमः। 38. ॐ श्री साईं परमात्मने नमः। 39. ॐ श्री साईं ज्ञानस्वरूपिणे नमः। 40. ॐ श्री साईं जगतः पित्रे नमः। 41. ॐ श्री साईं भक्तानां मातृपितामहाय नमः। 42. ॐ श्री साईं भक्ताभयप्रदाय नमः। 43. ॐ श्री साईं भक्तपराधीनाय नमः। 44. ॐ श्री साईं भक्तानुग्रहकराय नमः। 45. ॐ श्री साईं शरणागतवत्सलाय नमः। 46. ॐ श्री साईं भक्तिशक्तिप्रदाय नमः। 47. ॐ श्री साईं ज्ञानवैराग्यप्रदाय नमः। 48. ॐ श्री साईं प्रेमप्रदाय नमः। 49. ॐ श्री साईं संशयहृदयदौर्बल्यपापकर्मवासनाक्षयकराय नमः। 50. ॐ श्री साईं हृदयग्रन्थिभेदकाय नमः। 51. ॐ श्री साईं कर्मध्वंसिने नमः। 52. ॐ श्री साईं शुद्धसत्वस्थिताय नमः। 53. ॐ श्री साईं गुणातीतगुणात्मने नमः। 54. ॐ श्री साईं अनन्तकल्याणगुणाय नमः। 55. ॐ श्री साईं अमितपराक्रमाय नमः। 56. ॐ श्री साईं जयिने नमः। 57. ॐ श्री साईं दुर्धर्षाक्षोभ्याम नमः। 58. ॐ श्री साईं अपराजिताय नमः। 59. ॐ श्री साईं त्रिलोकेषु अविघातगतये नमः। 60. ॐ श्री साईं अशक्यरहिताय नमः। 61. ॐ श्री साईं सर्वशक्तिमूर्तये नमः। 62. ॐ श्री साईं सुरुपसुन्दराय नमः। 63. ॐ श्री साईं सुलोचनाय नमः। 64. ॐ श्री साईं बहुरूपविश्वमूर्तये नमः। 65. ॐ श्री साईं अरुपव्यक्ताय नमः। 66. ॐ श्री साईं अचिन्त्याय नमः। 67. ॐ श्री साईं सूक्ष्माय नमः। 68. ॐ श्री साईं सर्वान्तर्यामिने नमः। 69. ॐ श्री साईं मनोवागतीताय नमः। 70. ॐ श्री साईं प्रेममूर्तये नमः। 71. ॐ श्री साईं सुलभदुर्लभाय नमः। 72. ॐ श्री साईं असहायसहायाय नमः। 73. ॐ श्री साईं अनाथनाथदीनबन्धुवे नमः। 74. ॐ श्री साईं सर्वभारभृते नमः। 75. ॐ श्री साईं अकर्मानेककर्म-सुकर्मिणे नमः। 76. ॐ श्री साईं पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः। 77. ॐ श्री साईं तीर्थाय नमः। 78. ॐ श्री साईं वासुदेवाय नमः। 79. ॐ श्री साईं सतां गतये नमः। 80. ॐ श्री साईं सत्यपराणाय नमः। 81. ॐ श्री साईं लोकनाथाय नमः। 82. ॐ श्री साईं पावनानाघाय नमः। 83. ॐ श्री साईं अमृतांशवे नमः। 84. ॐ श्री साईं भास्करप्रभाय नमः। 85. ॐ श्री साईं ब्रह्मचर्यतपश्चर्यादिसुव्रताय नमः। 86. ॐ श्री साईं सत्यधर्मपरायणाय नमः। 87. ॐ श्री साईं सिद्धेश्वराय नमः। 88. ॐ श्री साईं सिद्धसङ्कल्पाय नमः। 89. ॐ श्री साईं योगेश्वराय नमः। 90. ॐ श्री साईं भगवते नमः। 91. ॐ श्री साईं भक्तवत्सलाय नमः। 92. ॐ श्री साईं सत्पुरुषाय नमः। 93. ॐ श्री साईं पुरुषोत्तमाय नमः। 94. ॐ श्री साईं सत्यतत्त्वबोधकाय नमः। 95. ॐ श्री साईं कामादिषङ्वैरिध्वंसिने नमः। 96. ॐ श्री साईं अभोदानन्दानुभवप्रदाय। 97. ॐ श्री साईं समसर्वमतसंमताय नमः। 98. ॐ श्री साईं श्रीदक्षिणामूर्तये नमः। 99. ॐ श्री साईं श्रीवेङ्कटेशरमणाय नमः। 100. ॐ श्री साईं अद्भुतानन्दचर्याय नमः । 101. ॐ श्री साईं प्रपन्नार्तिहराय नमः। 102. ॐ श्री साईं संसारसर्वदुःखक्षयकराय नमः। 103. ॐ श्री साईं सर्ववित्सर्वतोमुखाय नमः। 104. ॐ श्री साईं सर्वान्तर्बहिः स्थिताय नमः। 105. ॐ श्री साईं सर्वमङ्गलकराय नमः। 106. ॐ श्री साईं सर्वाभीष्टप्रदाय नमः। 107. ॐ श्री साईं समरससन्मार्गस्थापनाय नमः। 108. ॐ श्री साईं श्रीसमर्थसद्गुरुसाईंनाथाय नमः।

।। ॐ श्री साईं श्री साईं ।।

श्री साईं बाबा की कहानी :-

शिरडी में नीम-वृक्ष तले, प्रकट भए साईं ।।

किसी शासन, गद्दी, पीठ, आश्रम आदि को स्थापित करने में जिन्होंने कदापि रूचि नहीं दिखाई और न ही अपने उत्तराधिकारी नियुक्त करने चाहे — ऐसे महान संत  थे — ‘ शिरडी के श्री साईंबाबा। ‘

श्री साईंबाबा के जन्म और उनके माता-पिता के बारे में जानकारी अँधेरे के गर्त में छिपी है। श्री साईं बाबा के भक्तगण इस तथ्य पर दो भागों में बँटे हुए हैं कि बाबा हिन्दू थे या मुस्लमान। वे शिरडी में निम वृक्ष के तले तरुणावस्था में स्वयं भक्तों के कल्याणार्थ प्रकट हुए थे। उस समय भी वे पूर्ण ब्रह्मज्ञानी प्रतीत होते थे। यद्यपि वे देखने में तरुण प्रतीत होते थे, परन्तु उनके आचरण पूर्णज्ञ के सदृश थे। वे त्याग और वैराग्य की साक्षात् मूर्ति थे। श्री साईं बसेरा एक टूटी-फूटी मस्जिद थी, जिसे वे द्वारका माई के नाम से पुकारते थे।

उनका यही सन्देश था — ” राम ( जो हिन्दुओं के भगवान हैं ) और रहीम ( जो मुसलानों के खुदा हैं ) एक ही हैं और उनमें किंचित् मात्र भी भेद नहीं है, फिर तुम उनके अनुयायी पृथक्-पृथक् क्यों रहकर आपस में झगड़ते हो ? अज्ञानीजनों, तुम एकसाथ मिल-जुल कर रहो। “

साईंबाबा अपने भक्तों को स्वप्न में प्रकट रूप में दर्शन देते थे। उनके पास अन्नपूर्णा सिद्धि थी। बाबा के जीवनकाल में उनके अद्भुत चमत्कारों की अनेक कथाएँ प्रचलित हुईं, अपने भक्तों पर उनकी कृपा सदा बनी रहती थी। श्री साईंबाबा के समाधिस्थ होने के पश्चात् भी उनकी लीलाएँ जारी हैं जिससे सिद्ध होता है कि बाबा अभी भी हमारे बीच विद्यमान हैं और पूर्व की भांति अपने भक्तों को सहायता पहुँचाया करते हैं, अतः प्रत्येक भक्त समस्त चेतनाओं, इन्द्रियों-प्रकृतियों और मन को एकाग्र कर भी साईं के पूजन और सेवा में लगाकर अपनी शुभ मनोकामनाओं को पूर्ण कर सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

हे श्री साईं ! हमें आशीष दो कि जो आपके इस व्रत को पूर्ण करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।

श्री साईं बाबा व्रत-कथा :-

अध्याय – 1 – श्री साईंबाबा की कृपा हुई

श्रीमती ललिता देवी व उनके पति अजय दिल्ली में आनन्द पूर्वक रहते थे। अचानक समय ने करवट बदली और अजय को व्यवसाय में घाटा हो गया। उनके अच्छे-भले चल रहे व्यवसाय पर ताले लग गए जिसकी वजह से वह लाचार होकर घर बैठ गए। खाली बैठे-बैठे उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना भी लाजिमी था। वह बात-बात पर अपनी पत्नी को झिड़कने लग गए  थे, जिनको कि पहले शायद उन्होंने स्वप्न में भी नहीं डाँटा था। पड़ोसी भी उनके स्वभाव में आए इस परिवर्तन से काफी दुःखी थे। ललिता देवी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति वाली महिला थी। वह जानती थी कि ईश्वर इस दुःख से छुटकारा अवश्य दिलाएँगे और कोई-न-कोई राह जरूर निकाल देंगे।

एक दिन ललिता देवी के घर के द्वार पर अद्भुत तेजस्वी चेहरे वाले वृद्ध साधु आए और उनसे उन्होंने भिक्षा में दाल-चावल की माँग की। ललिता देवी ने तुरन्त हाथ धोकर साधु महाराज को दाल-चावल दिये और उन्हें नमस्कार किया। उन साधु महाराज ने भी खुश होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और ललिता देवी के दुःखों को दूर करने हेतु उन्हें श्री साईंबाबा के गुरुवार को करने वाले व्रत की विधि समझाई। उन्होंने बताया कि मनौती मानकर 5, 7, 9, 11 अथवा 21 गुरुवार तक साईंबाबा का व्रत विधिपूर्वक करने, व्रतोद्यापन करने तथा गरीबों को भोजन कराने से उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इस व्रत को करते समय झूठ, छल प्रवंच आदि बुरी आदतों को त्याग करना उचित रहता है। व्रत पूर्ण होने पर यथाशक्ति 7, 11, 21, 51, 101 पुस्तकें दान करना न भूलें। श्री साईं के वचन हैं, श्रद्धा और सबूरी। इन्हें ध्यान में रखकर ही व्रत को आरम्भ करें।

उस साधु महाराज के वचन सुनकर ललिता देवी अत्यन्त प्रसन्न हो गईं और अगले गुरुवार से उन्होंने ‘ श्री साईं-व्रत का पालन किया और देखते-ही-देखते उनके पति के स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन आने लगा और उन्होंने फिर से व्यापार करना आरम्भ किया जिसमें दिनों-दिन बढ़ोत्तरी होने लगी। घर में भी साईंबाबा की कृपा से सुख-शान्ति का निवास हो गया।

एक दिन ललिता देवी की बहन और उनके पति उनसे मिलने उनके घर आए। दोनों पति-पत्नी को खुश देखकर बहुत प्रसन्न हुए। ललिता देवी की बहन ने उनसे पूछा कि यह चमत्कार कैसे संभव हुए ? हमारे बच्चे ठीक से पढाई नहीं करते और किसी का कहना नहीं मानते, बहुत उद्दंड होते जा रहे हैं, जिसकी वजह से सब-कुछ होते हुए भी मैं बहुत परेशान हूँ।

तब ललिता देवी ने उन्हें श्री साईंबाबा के गुरुवार को करने वाले व्रत की महिमा बतलाई। इस व्रत की महिमा सुन ललिता देवी की बहन बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने भी पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से 9 गुरुवार तक यह व्रत किया जिसका परिणाम यह हुआ कि उनके बच्चे मन लगाकर पढ़ने लगे एवं हमेशा कक्षा में फर्स्ट आते और साथ-ही-साथ घर के छोटे-मोटे कामों में भी उनका हाथ बँटाते। ललिता देवी की बहन भी दुःखी लोगों को इस महान व्रत का माहात्म्य बताने लगीं और स्वयं भी इस व्रत का पालन करती रहीं। श्री साईंबाबा ने जैसी कृपा उन पर की, वैसा सभी पर करें। जो इस कथा को पढ़े और सुने, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाएँ।

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।

अध्याय – 2 – व्यवसाय में दिन-दूनी रात चौगुनी सफलता

अम्बाला शहर में व्यापारी तेजेन्द्र खन्ना के कपड़े के चार बड़े शोरूम थे, घर में सभी प्रकार की सुख-समृद्धि थी। अचानक एक-एक कर सभी शोरूमों के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। सेठजी का मन बहुत व्यथित हुआ। मामला गंभीर था। यूनियन नेताओं के दबाव में कर्मचारी उनकी बात सुनने को भी राजी न थे। ऐसे समय में सेठजी के एक दूर के रिश्तेदार का उनके घर आना हुआ। बातों-बातों में सेठजी ने उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया। उनकी पूरी बात सुनने के बाद उनके रिश्तेदार ने निश्चिततापूर्वक कहा कि घबराने की कोई बात नहीं सब कुछ ठीक हो जाएगा। सेठजी को गुरुवार को करने वाला ‘ श्री साईंबाबा-व्रत ‘ करने को कहा। उन्होंने यह भी बताया कि आप और सेठानी दोनों एकसाथ इस व्रत को करें, बाबा की कृपा से सब मंगल ही मंगल होगा। सेठ-सेठानी ने विधिपूर्वक गुरुवार से साईं-व्रत करना आरम्भ किया और व्रत आरम्भ करने के दो सप्ताह के भीतर ही उनके सभी कर्मचारी काम पर वापस लौट आये और उनके चारों शोरूम फिर से खुल गए। साईंबाबा की कृपा से एक वर्ष में ही उनको पर्याप्त धन-लाभ हो गया। परिवार में सुख-शांति और खुशहाली फिर से छा गई। इसका सारा श्रेय सेठजी ने ‘ श्री साईंबाबा ‘ को दिया।

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।

अध्याय – 3 – कन्या का विवाह हो गया

नीलू देवी की शालिनी नामक सुशील एवं बड़ी गुणवान एक बेटी थी, लेकिन साँवले रंग की थी। ऊपर से नीलू देवी एवं उनके पति की आमदनी भी ऐसी नहीं थी कि ज्यादा दहेज देकर अपनी बेटी के हाथ पीले कर सकें। शालिनी की उम्र विवाह योग्य होने पर भी उसकी शादी हो नहीं पा रही थी। धीरे-धीरे उसकी आयु के साथ माता-पिता की चिन्ता भी बढ़ने लगी। शालिनी खाना पकाने, सिलाई-कढ़ाई और सभी कार्यों में बहुत कुशल थी, बी० ए० तक पढ़ी भी थी। स्वभाव से वह समझदार और हँसमुख थी, फिर भी उसे योग्य वर नहीं मिल पा रहा था। एक दिन शालिनी अपने पड़ोस में रहने वाली सहेली कोयल के यहाँ गई और देखी कोयल एक पुस्तक बड़े ध्यान से पढ़ रही है। शालिनी ने पूछा, ” क्या पढ़ रही हो ? ” तब कोयल ने कहा, ” यह ‘ श्री साईंबाबा-व्रत ‘ की पुस्तक है। हमारी बुआजी के यहाँ आज इस व्रत का उद्यापन था, जहाँ बुआजी ने वहाँ उपस्थित सभी जनों एक-एक पुस्तक बाँटी थी। ” जब शालिनी ने वह पुस्तक हाथ में ली और उसके कुछ पृष्ठ पढ़ें तो साईंबाबा की कृपा से उसके मन में भी यह व्रत करने की इच्छा जागृत हुई, वह उस पुस्तक को अपनी सहेली से लेकर घर गई। गुरुवार की सुबह उसने 21 गुरुवार तक व्रत करने का संकल्प लिया और विधिपूर्वक व्रत शुरू किया और आश्चर्य ! उसी रात उसके मामाजी उसके लिए एक अच्छा रिश्ता लेकर आ गए। शालिनी की मामी और लड़के की माँ बचपन की सहेली थी तथा शालिनी के मामा ने लड़के से सीधे बात भी कर ली थी। शालिनी के बारे में सुनकर लड़का बहुत उत्साहित हुआ था। उसे शालिनी जैसी लड़की की ही तलाश थी, जो पढ़ी-लिखी एवं गुणवान हो और उसके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल सके। शालिनी यह सब जानकर बहुत प्रसन्न हुई। फिर एक ही माह बाद शालिनी का विवाह उस लड़के के साथ सम्पन्न हो गया।   

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।

अध्याय – 4 – डूबा रुपया वसूल हो गया

रोनित के परिवार में पति-पत्नी और एक पुत्र था। उनका हौजरी का व्यापार बहुत बड़ा तो नहीं था, पर परिवार की सुख-सुविधा के लिहाज से पर्याप्त था, लेकिन मुसीबत कहकर नहीं आती। उनके व्यापार में उधार देना जरुरी था, नहीं तो बाजार की प्रतिस्पर्द्धा में वे टिक नहीं पाते। ऐसे ही एक व्यापारी की तरफ उनका बढ़ते-बढ़ते चार लाख रुपये उधार हो गया। अब उस व्यापारी की नीयत में खोट आ गयी और वह उधार चुकाने के लिए रोज नए बहाने करने लगा। रोनित के तो पैरों तले जमीन खिसक गई। उस पर कंपनियों की तरफ से तकादे पर तकादे आने लगे। कंपनियों के एजेंट कहते कि अगर उन्होंने कंपनी का पैसा समय पर जमा नहीं करवाया तो कंपनी उन्हें माल देना बन्द कर देगी। रोनित की तो रातों की नींद उड़ गई, दिन का चैन हराम हो गया।

रोनित इसी सोच-विचार में निमग्न अपनी दुकान पर बैठा था कि तभी उनका एक मित्र शर्माजी आ गए। शर्माजी के पूछने पर रोनित ने उन्हें अपनी चिंता का कारण बताया। शर्माजी ने कहा — ‘ बस, इतनी-सी बात ! आज से तुम सारी चिन्ताएँ छोड़ दो और श्री साईंबाबा की शरण ले लो। फिर शर्माजी ने अपने बैग में से श्री साईं व्रत-कथा की एक पुस्तक निकाल कर रोनित को दी और बताया कि कलियुग में शीघ्र फल देने वाला यह चमत्कारी व्रत है। आप आगामी गुरुवार को 5, 7, 9, 11 अथवा 21 गुरुवार को व्रत की मन्नत मान कर श्री साईं व्रत करना आरम्भ करें, फिर देखें इस व्रत का अद्भुत चमत्कार !

तब रोनित से सपत्नीक श्रद्धा और विश्वास के साथ इस व्रत को करना आरम्भ किया। व्रत करने के चौथे ही दिन यह व्यापारी उनकी दुकान पर आया और कहने लगा कि उनका माल बेचकर उसे बहुत लाभ हुआ है। उसे इस माल की भी जरुरत है। साथ ही, उसने पुराना बकाया पैसा तो चुकाया ही, साथ-ही अगले  माल  के भी रूपये एडवांस दे गया और रूपये चुकाने में हुई देरी के लिए क्षमा माँगी।

रोनित श्री साईंबाबा की ऐसी कृपा देख भाव-विभोर हो गया। जिस रकम को वह डूब चुकी मान रहा था, वह तो वापस आई ही, उसके व्यापार में भी वृद्धि हो गई। इस अद्भुत व्रत का लोगों को अधिक-से-अधिक लाभ हो, इसलिए उन्होंने इस व्रत की एक सौ एक प्रतियाँ श्रद्धालुओं में मुफ्त वितरित की।

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।

अध्याय – 5 – संतान-सुख की प्राप्ति

नीरज और दीपिका के विवाह को कई साल हो गए थे, परन्तु उन्हें अभी तक संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ था। जिसकी वजह से घर में सब कुछ होने पर भी खालीपन-सा महसूस होता था। वृद्ध सास-ससुर भी घर में नन्हीं किलकारियाँ सुनने को व्यग्र थे। कई डॉक्टरों, नीम-हकीमों को भी दीपिका व नीरज को दिखाया गया। दोनों को ही उन्होंने शारीरिक रूप से स्वस्थ बताया था।

एक दिन नीरज के ऑफिस में अलीगढ से ट्रांसफर होकर आए देवेश ने सभी को लड्डू खिलाए। नीरज को पूछने पर उसने बताया कि ‘ श्री साईंबाबा व्रत ‘ की महिमा से शादी के 5 साल बाद उन्हें एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई है। नीरज द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने उसे पूरी व्रत-विधि समझाई और अगले ही दिन ‘ श्री साईं व्रत-कथा ‘ की एक पुस्तक लाकर दे दी। दोनों पति-पत्नी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ 11 गुरूवार व्रत करने की मन्नत मानी और श्री साईंबाबा की कृपा से शीघ्र ही दीपिका गर्भवती हुई और उसने एक सुन्दर स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। अपने कुलदीपक को देख उसके सास-ससुर की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था।

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।

अध्याय – 6 – पढ़ाई में सफलता मिली

डॉ० अर्चना रोहतगी पुणे में एक प्रतिष्ठित डॉक्टर थीं। उनके पति का स्वर्गवास हो गया था। उनका इकलौता पुत्र ही अब सहारा था। उनका सपना था कि उनका बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बने। उसकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। 10 वीं कक्षा तक वह अपने स्कुल में प्रथम आया था, लेकिन अनायास बुरे मित्रों के संगत में पड़कर उसका ध्यान पढाई से हट गया और 11 वीं कक्षा में वह फेल हो गया। डॉ० अर्चना को अपना सपना बिखरता-सा लगने लगा। हमेशा प्रसन्नचित्त रहनेवाली डॉ० अर्चना की उदास मुख देखकर उनकी एक मित्र डॉ० देविका ने इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने साफ-साफ अपनी चिंता का कारण बता दिया।

डॉ० देविका ने दिलासा देते हुए कहा कि तुम दिल छोटा न करो, श्री साईंबाबा की कृपा से तुम्हारा सपना अवश्य पूरा होगा। तुम बस, विश्वासपूर्वक श्रीसाईंबाबा का गुरुवार को करने वाला व्रत आरम्भ करो।

डॉ० देविका से व्रत की विधि समझकर डॉ० अर्चना ने उसी सप्ताह से ‘ श्री साईंबाबा व्रत ‘ रखना शुरू किया और ग्यारह गुरुवार व्रत करके आखिरी गुरुवार को उद्यापन कर गरीबों को भोजन कराया और श्रद्धालुओं में ‘ श्री साईंबाबा व्रत-कथा ‘ की 101 पुस्तकें वितरित कीं। श्री साईंबाबा की ऐसी कृपा हुई कि उनके बेटे को सुमति आई और उसने बुरे मित्रों की संगत छोड़ दी और जी-जान से पढाई में जुट गया और 11 वीं एवं 12 वीं कक्षा में फर्स्ट डिवीजन पास होते हुए भी पी. एम. टी. प्रतियोगिता परीक्षा में पुरे प्रदेश में प्रथम स्थान लाकर चयनित हुआ और सबसे अच्छे मेडिकल कॉलेज में उसे प्रवेश मिल गया। डॉ० अर्चना आज भी श्री साईं की कृपा नहीं भूली है और श्री साईं व्रत का नियमपूर्वक पालन करती हैं।

।। बोलो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक राजाधिराज योगिराज परमब्रह्म श्री सच्चिदानन्द सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय ।।  

श्री साईं बाबा व्रत कथा के उपरान्त चालीसा और आरती अवश्य करें। 

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!