Sankashtahara Stotram / श्री संकष्टहर स्तोत्रम्

Sri Sankashtahara Stotram
श्री संकष्टहर स्तोत्रम्


देवा ऊचुः

दीननाथ दयासिन्धो योगिहृत्पद्मसंस्थित ।
अनादिमध्यरहितस्वरूपाय नमो नमः ।। 1 ।।

अर्थात् :- देवता बोले – हे दीनानाथ ! हे दयासिन्धो ! हे योगियों के हृत्कमल पर निवास करने वाले प्रभो ! आदि, मध्य और अन्त से रहित स्वरुप वाले आपको बार-बार नमस्कार है।

जगद्भास चिदाभास ज्ञानगम्य नमो नमः ।
मुनिमानसविष्टाय नमो दैत्यविघातिने ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे जगत्प्रकाशक ! हे चिदाभास ! हे ज्ञानगम्य ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुनियों के मन में प्रविष्ट तथा दैत्यों का विनाश करने वाले आपको नमस्कार है।

त्रिलोकेश गुणातीत गुणक्षोभ नमो नमः ।
त्रैलोक्यपालन विभो विश्वव्यापिन् नमो नमः ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे त्रैलोक्य के स्वामी ! हे गुणातीत ! हे गुणक्षोभक ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे त्रिभुवनपालक ! हे विश्वव्यापिन् विभो ! आपको बार-बार नमस्कार है।

मायातीताय भक्तानां कामपूराय ते नमः ।
सोमसूर्याग्निनेत्राय नमो विश्वम्भराय ते ।। 4 ।।

अर्थात् :- मायातीत और भक्तों की कामना-पूर्ति करने वाले आपको नमस्कार है। चन्द्र, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं और जो विश्व का भरण करने वाले हैं, उन आपको नमस्कार है।

अमेयशक्तये तुभ्यं नमस्ते चन्द्रमौलये ।
चन्द्रगौराय शुद्धाय शुद्धज्ञानकृते नमः ।। 5 ।।

अर्थात् :- अमित-शक्ति सम्पन्न आप चन्द्रमौलि को नमस्कार है। चन्द्रोपाम गौर, शुद्ध स्वरुप एवं शुद्ध ज्ञान प्रदाता आपको नमस्कार है।

।। इस प्रकार श्रीगणेशपुराण में देवकृत श्रीसंकष्टहरस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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