Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap / श्री सीता हरण

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap
श्री सीता हरण और श्री सीता विलाप

Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap, श्री सीता हरण और श्री सीता विलाप :- श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी। मेरी दशा तो भृङ्गी के कीड़े की-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को ही देखता हूँ। हे तात ! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा न पड़ेगा ( सफलता नहीं मिलेगी )।  


सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला ।।

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा ।।

अर्थात् :- हे प्रिये ! हे सुन्दर पातिव्रत-धर्म का पालन करने वाली सुशीले ! सुनो ! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य-लीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तब तक तुम अग्नि में निवास करो। 

जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ।।
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी। 

लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु रचित रचा भगवाना ।।
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ।।

अर्थात् :- भगवान् ने जो भी लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मणजी ने भी नहीं जाना। स्वार्थ परायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया।

नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ।।
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी ।।

अर्थात् :- नीच का झुकना ( नम्रता ) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अङ्कुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना। हे भवानी ! दुष्ट की मीठी वाणी भी [ उसी प्रकार ] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतु के फूल !

दो० — करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात ।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात ।। 24 ।।

अर्थात् :- तब मारीच ने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी – हे तात ! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं ?

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें ।।
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी ।।

अर्थात् :- भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान सहित उसके सामने कही [ और फिर कहा – ] तुम छल करने वाले कपट-मृग बनो, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊँ। 

तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा ।।
तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै ।।

अर्थात् :- तब उसने ( मारीच ) ने कहा – हे दशशीश ! सुनिये। वे मनुष्य रूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात ! उनसे वैर न कीजिये। उन्हीं के मारने से मरना और उनके जिलाने से जीना होता है ( सबका जीवन-मरण उन्हीं के अधीन है )। 

मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ।।
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ।।

अर्थात् :- यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजी ने बिना फल का बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभर में सौ योजना पर आ गिरा। उनसे वैर करने में भलाई नहीं है। 

भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई ।।
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ।।

अर्थात् :- मेरी दशा तो भृङ्गी के कीड़े की-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयों को ही देखता हूँ। हे तात ! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा न पड़ेगा ( सफलता नहीं मिलेगी )।   

दो० — जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड ।
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ।। 25 ।।

अर्थात् :- जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है ?

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ।।
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा ।।

अर्थात् :- अतः अपने कुल की कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गलतियाँ दीं ( दुर्वचन कहे )। [ कहा – ] अरे मूर्ख ! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है ? बता तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है ? 

तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना ।।
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी ।।

अर्थात् :- तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि शस्त्री ( शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जानने वाला ), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया – इन नौ व्यक्तियों से विरोध ( वैर ) करने में कल्याण ( कुशल ) नहीं होता। 

उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना ।।
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें ।।

अर्थात् :- जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी ( अर्थात् उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा )। [ सोचा कि ] उत्तर देते ही ( नाहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजी के बाण लगने से ही क्यों न मरूँ ? 

अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा ।।
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही ।।

अर्थात् :- हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। श्रीरामजी के चरणों में उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजी को देखूँगा ; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया। 

छं० — निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं ।
श्रीसहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ।।
निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी ।
निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ।।

अर्थात् :- [ वह मन-ही-मन सोचने लगा ] अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजी सहित और छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत कृपानिधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसी के वश में होनेवाले स्वतन्त्र भगवान् ) को भी वश में करने वाली है, अहा ! वे ही आनन्द के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण सन्धाकर मेरा वध करेंगे 

दो० — मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान ।
फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन ।। 26 ।।

अर्थात् :- धनुष-बाण धारण किये मेरे पीछे-पीछे पृथ्वी पर ( पकड़ने के लिये ) दौड़ते हुए प्रभु को मैं फिर-फिरकर देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।

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