Sri Sitaji Krit Gauri Vandana /श्री सीताजी कृत गौरी वन्दना

Sri Sitaji Krit Gauri Vandana
श्री सीताजी कृत गौरी वन्दना

Sri Sitaji Krit Gauri Vandana, श्री सीताजी कृत गौरी वन्दना :- हे [ भक्तों मुँहमाँगा ] वर देनेवाली ! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी ! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि ! आपके चरणकमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं। गिरिजाजी सीताजी के विनय और प्रेम के वश में हो गयीं। उन ( के गले ) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी। सीताजी ने आदरपूर्वक उस प्रसाद ( माला ) को सिरपर धारण किया। गौरीजी का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं। 

जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी ।।
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनि दुति गाता ।।

अर्थात् :- हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो ; हे महादेव जी के मुखरूपी चन्द्रमा की [ ओर टकटकी लगाकर देखने वाली ] चकोरी ! आपकी जय हो ; हे हाथी के मुखवाले गणेश जी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकेय जी की माता ! घी जगज्जननी ! हे बिजली की-सी कान्तियुक्त शरीरवाली ! आपकी जय हो !

नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ।।
भव भव बिभव पराभव कारिनि।
बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ।।

अर्थात् :- आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतन्त्र रूप से विहार करने वाली है।

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पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ।।

अर्थात् :- पति को इष्ट देव मानने वाली श्रेष्ठ नारियों में हे माता ! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायनी पुरारि पिआरी ।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ।।

अर्थात् :- हे [ भक्तों मुँहमाँगा ] वर देनेवाली ! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी ! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि ! आपके चरणकमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।

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मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही कें ।।
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं ।।

अर्थात् :- मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति जानती हैं ; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिये।

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