Sri Vasishthji Ka Bhashan / श्री वसिष्ठजी का भाषण

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Sri Vasishthji Ka Bhashan
श्री वसिष्ठजी का भाषण

Sri Vasishthji Ka Bhashan, श्री वसिष्ठजी का भाषण :- श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले – हे सभासदो ! हे सुजान भरत ! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्रजी धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं। वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्रीरामजी का अवतार ही जगत् के कल्याण के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करनेवाले और देवताओं के हितकारी हैं। निति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ ( तत्त्व से ) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल।  


कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली ।।

केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू ।।

अर्थात् :- [ भरतजी सोचते हैं कि ] माता के मिससे काल ने कुचाल की है। जैसे धान पकते समय ईतिका भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता।

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रूचि जानी ।।
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ ।।

अर्थात् :- गुरूजी की आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्या को लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजी की रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे ( अर्थात् वे श्रीरामजी की रूचि देखे बिना जाने को नहीं कहेंगे )। माता कौसल्याजी के कहने से भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं ; पर भला, श्रीरामजी को जन्म देनेवाली माता क्या हठ करेगी ?

मोहि अनुचर कर कैतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ।।
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ।।

अर्थात् :- मुझ सेवक की तो बात ही कितनी है ? उसमें भी समय ख़राब है ( मेरे दिन अच्छे नहीं हैं ) और विधाता प्रतिकूल हैं। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म ( अधर्म ) होगा, क्योंकि सेवक का धर्म शिवजी के पर्वत कैलास से भी भारी ( निभाने में कठिन ) है। 

एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी ।।
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई ।।

अर्थात् :- एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा।

दो० — गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ।। 253 ।।

अर्थात् :- भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये। 

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना ।।
धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू ।।

अर्थात् :- श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले – हे सभासदो ! हे सुजान भरत ! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्रजी धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं। 

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू ।।
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी ।।

अर्थात् :- वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्रीरामजी का अवतार ही जगत् के कल्याण के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करनेवाले और देवताओं के हितकारी हैं। 

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु ।।
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला ।।

अर्थात् :- निति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ ( तत्त्व से ) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल। 

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई ।।
करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सब ही कें ।।

अर्थात् :- शेषजी और [ पृथ्वी एवं पाताल के अन्यान्य ] राजा आदि जहाँ तक प्रभुता है, और योग की सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रों में गायी गयी हैं, हृदय में अच्छी तरह विचार कर देखो, [ तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि ] श्रीरामजी की आज्ञा इन सभी के सिर पर है ( अर्थात् श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान् महेश्वर हैं )। 

दो० — राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ।। 254 ।।

अर्थात् :- अतएव श्रीरामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सबका हित होगा। [ इस तत्त्व और रहस्य को समझकर ] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो।

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू ।।
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी का राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मङ्गल और आनन्द का मूल यही एक मार्ग है। [ अब ] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें ? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाय।  

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी ।।
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ।।

अर्थात् :- मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठिजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ ( लौकिक हित ) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले ( विचारशक्ति से रहित ) हो गये। तब भरत ने सिर नवाकर हाथ जोड़े। 

भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे ।।
जनम हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता ।।

अर्थात् :- [ और कहा – ] सूर्यवंश में एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभी के जन्म के कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों को ( कर्मों का फल ) विधाता देते हैं।

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना ।।
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी ।।

अर्थात् :- आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखों का दमन करके, समस्त कल्याणों को सज देती है ; यह जगत् जानता है। हे स्वामी ! आप वही हैं जिन्होंने विधाता की गति ( विधान ) को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी ( जो निश्चय कर दिया ) उसे कौन टाल सकता है ?

दो० — बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु ।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ।। 255 ।।

अर्थात् :- अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के प्रेममय वचनों को सुनकर गुरूजी के हृदय में प्रेम उमड़ आया।

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ।।
सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता ।।

अर्थात् :- [ वे बोले – ] हे तात ! बात सत्य है, पर है श्रीरामजी की कृपा से ही। रामविमुख को तो स्वपन में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात ! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [ आधे की रक्षा के लिये ] आधा छोड़ दिया करते हैं।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ।।
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता ।।

अर्थात् :- अतः तुम दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्न ) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्र को लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्द से परिपूर्ण हो गये।

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा ।।
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सैम दुख सुख सब रोवहिं रानी ।।

अर्थात् :- उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीर में तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों। अन्य लोगों को तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। 

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ।।
कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू ।।

अर्थात् ;- भरतजी कहने लगे – मुनि ने जो कहा, वह करने से जगत्भर के जीवों को उनकी इच्छित वस्तु देने का फल होगा। [ चौदह वर्ष की कोई अवधि नहीं, ] मैं जन्मभर वन में वास करूँगा। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है।

दो० — अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान ।
जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ।। 256 ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी का हृदय जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ ! अपने वचनों को प्रणाम कीजिये ( उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये )। 

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू ।।
भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ।।

अर्थात् :- भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये ( किसी को अपने देह की सुधि न रही )। भरतजी की महान् महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्री के समान खड़ी है। 

गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा ।।
औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि की सिंधु समाई ।।

अर्थात् :- वह [ उस समुद्र के ] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदय में भी उपाय ढूँढे ! पर [ उसे पार करने का साधन ]  नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा ? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है ?

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए ।।
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ।।

अर्थात् :- मुनि वसिष्ठजी के अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजी के पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने प्रणामकर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनि की आज्ञा सुनकर बैठ गये।

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी ।।
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना ।।

अर्थात् :- श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले – हे सर्वज्ञ ! हे सुजान ! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञान भण्डार राम ! सुनिये। —

दो० — सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ।। 257 ।।

अर्थात् :- आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भाव को जानते हैं। जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइये।

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