Srimad Bhagwad Gita In Hindi / श्रीमद् भगवद् गीता हिंदी

Srimad Bhagwad Gita In Hindi
श्रीमद् भगवद् गीता हिंदी में


Srimad Bhagwad Gita Yatharup,
श्रीमद् भगवद् गीता यथारूप हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थों में से एक हैं। यह संस्कृत महाकाव्य महाभारत की एक उपकथा के रूप में प्राप्त है। महाभारत में वर्तमान कलियुग तक की घटनाओं का विवरण मिलता है। इसी युग के प्रारम्भ में आज से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने मित्र तथा अपने भक्त्त अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया था।

श्रीमद् भगवद् गीता में भौतिक प्रकृति के तीन गुण – सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण को विस्तार रूप से बताया गया है। भगवद्गीता में एकेश्वरवाद, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग को बहुत सुंदर रूप से व्याख्या हुई है।

अर्जुन युद्ध भूमि में अपने विपक्षी सेनाओं में अपने सम्बन्धियों, शिक्षकों तथा मित्रों को युद्ध में अपने सामने देख कर व्याकुल उठे और युद्ध नहीं करना चाहते हैं। जब अर्जुन को कुछ समझ नहीं आया तो वह शिष्य रूप में श्रीकृष्ण के पास गए। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को देहांतरण की प्रक्रिया, परमेश्वर की निष्काम सेवा तथा स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के गुणों से अवगत करते हैं।

आत्मा, ईश्वर तथा इन दोनों से सम्बन्धित ज्ञान शुद्ध करने, तथा मोक्ष प्रदान करने वाला है। ऐसा ज्ञान कर्मयोग का फल है।

भगवान् गीता के प्राचीन इतिहास, इस भौतिक जगत में बारम्बार अपने अवतरण की महत्ता तथा गुरु के पास जाने की आवश्यकता का उपदेश देते हैं।

श्रीमद् भगवद् गीता वर्त्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को लेकर सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सभी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। और इस भगवद्गीता में कही गयी बातें पूर्णता सत्य है क्यूँकि इसे स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने अपने शिष्य को सुनाया है।

जैसा की कहा गया है — 

भारतामृतसर्वस्वं विष्णुवक्त्राद्विनिः सृतम् ।
गीता-गङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

” जो गंगाजल पीता है, वह मुक्ति प्राप्त करता है। अतएव उसके लिए क्या कहा जाय जो भगवद् गीता का अमृत पान करता हो ? भगवद् गीता महाभारत का अमृत है और इसे भगवान् कृष्ण ( मूल विष्णु ) ने स्वयं सुनाया है। ” ( गीता माहात्म्य 5  ) । भगवद् गीता भगवान् के मुख से निकली है और गंगा भगवान् के चरणकमलों से निकली है। निस्संदेह भगवान् के मुख तथा चरणों में कोई अन्तर नहीं है, लेकिन निष्पक्ष अध्ययन से हम पाएँगे कि भगवद् गीता गंगा-जल की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।।

” यह गीतोपनिषद्, श्रीमद् भगवद् गीता, जो समस्त उपनिषदों का सार है, गाय के तुल्य है और ग्वालबाल के रुप में विख्यात भगवान् कृष्ण इस गाय को दुह रहे हैं। अर्जुन बछड़े के समान है, और सारे विद्वान तथा शुद्ध भक्त भगवद् गीता के अमृतस्य दूध का पान करने वाले हैं। ” ( गीता माहात्म्य 6 )

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श्रीमद् भगवद् गीता में कुल अठारह अध्याय हैं :-

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