Shri Annapurna Mahatmya / श्री अन्नपूर्णा माहात्म्य

Shri Annapurna Mahatmya

Shri Annapurna Mahatmya, श्री अन्नपूर्णा माहात्म्य :- जब तक देवी अन्नपूर्णा कृपा नहीं करतीं, तभी तक मनुष्य लालची होकर (टुकड़े-टुकड़े के लिये) लालायित होता है और दीन तथा मलिनमुख हो द्वार-द्वार पर बिलबिलाता रहता है, परंतु उसके मन की चिन्ता दूर नहीं होती; श्राद्ध, विवाह अथवा कोई उत्सव तो नहीं, इस बात की टोह में रहता है, चंचल होकर इधर-उधर घूमता है और यदि कहीं ढोल या तुरही का शब्द होता है

Shri Annapurna Stotram / श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम्

Shri Annapurna Stotram

Shri Annapurna Stotram, श्री अन्नपूर्णा स्तोत्रम् :- आप कोटि-कोटि चन्द्र-सूर्य-अग्नि के समान जाज्वल्यमान प्रतीत होती हैं, आप चन्द्रकिरणों के समान [शीतल] तथा बिम्बाफल के समान रक्त-वर्ण के अधरोष्ठवाली हैं, चन्द्र-सूर्य तथा अग्नि के समान प्रकाशमान केश धारण करने वाली हैं, आप चन्द्रमा तथा सूर्य के समान देदीप्यमान वर्णवाली ईश्वरी हैं, आपने [अपने हाथों में] माला, पुस्तक, पाश तथा अंकुश धारण कर रखा है, आप काशीपुरी की अधीश्वरी हैं, अपनी कृपा का आश्रय देनेवाली हैं, आप [समस्त प्राणियों की] माता हैं; आप भगवती अन्नपूर्णा हैं, मुझे भिक्षा प्रदान करें।

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