Lakshmi Stotram / लक्ष्मी स्तोत्रम्

Lakshmi Stotram

Lakshmi Stotram, लक्ष्मी स्तोत्रम् :- हे अम्बिके ! सदा प्रसन्न रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। सनातनी ! मेरा राज्य शत्रुओं के हाथ में चला गया है, तुम्हारी कृपा से वह मुझे पुनः प्राप्त हो जाय। यह स्तोत्र महान् पवित्र है। इसका त्रिकाल पाठ करने वाला बड़भागी पुरुष कुबेर के समान राजाधिराज हो सकता है। पाँच लाख जप करने पर मनुष्यों के लिये यह स्तोत्र सिद्ध होता है। यदि इस सिद्धस्तोत्र का कोई निरन्तर एक महीने तक पाठ करे तो वह महान् सुखी एवं राजेन्द्र हो जायगा- इसमें कोई संशय नहीं है।

Shri Suktam / श्री सूक्तम्

Shri Suktam

Shri Suktam, श्री सूक्तम् :- हम विष्णुपत्नी महालक्ष्मी को जानते हैं तथा उनका ध्यान करते हैं। वे लक्ष्मीजी [सन्मार्ग पर चलने हेतु] हमें प्रेरणा प्रदान करें। ऋण, रोग, दरिद्रता, पाप, क्षुधा, अपमृत्यु, भय, शोक तथा मानसिक ताप आदि- ये सभी मेरी बाधाएँ सदा के लिये नष्ट हो जायँ। भगवती महालक्ष्मी [ मानव के लिये] ओज, आयुष्य, आरोग्य, धन-धान्य, पशु, अनेक पुत्रों की प्राप्ति तथा सौ वर्ष के दीर्घ जीवन का विधान करें और मानव इनसे मण्डित होकर प्रतिष्ठा प्राप्त करे।

Mahalakshmi Stuti / महालक्ष्मी स्तुति

Mahalakshmi Stuti

Mahalakshmi Stuti, महालक्ष्मी स्तुति :- इस स्तुति से प्रसन्न हो देवी के द्वारा वर माँगने के लिये कहने पर अगस्त्य मुनि बोले- हे देवि!] मेरे द्वारा की गयी इस स्तुति का जो भक्तिपूर्वक पाठ करेंगे, उन्हें कभी संताप न हो और न कभी दरिद्रता हो, अपने इष्ट से कभी उनका वियोग न हो और न कभी धन का नाश ही हो। उन्हें सर्वत्र विजय प्राप्त हो और उनकी संतान का कभी उच्छेद न हो।

Bhawani Stuti / भवानी स्तुति

Bhawani Stuti

Bhawani Stuti, भवानी स्तुति :- हे देवि ! तुम दुःसह दोष और दुःखों का दमन करने वाली हो, मुझ पर दया करो। तुम विश्व-ब्रह्माण्ड की मूल (उत्पत्ति-स्थान) हो, भक्तों पर सदा अनुकूल रहती हो, दुष्टदलन के लिये हाथ में त्रिशूल धारण किये हो और सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली मूल (अव्याकृत) प्रकृति हो। तुम चण्ड दानव के भुजदण्डों का खण्डन करने वाली और महिषासुर को मारने वाली हो, मुण्ड दानव के घमण्ड का नाश कर तुम्हीं ने उसके अंग-प्रत्यंग तोड़े हैं।

Durga Devi Stuti / दुर्गा देवी स्तुति

Durga Devi Stuti

Durga Devi Stuti, दुर्गा देवी स्तुति :- हे शिवे ! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक रूप और नाम हैं। तुम समस्त संसार की स्वामिनी और हिमाचल की कन्या हो। हे शरणागत की रक्षा करने वाली ! मैं तुलसीदास रघुनाथजी के चरणों में परम प्रेम और अचल नेम चाहता हूँ, सो प्रसन्न होकर मुझे दो और मेरी रक्षा करो। तुम पूतना, पिशाच, प्रेत और डाकिनी-शाकिनियों के सहित भूत, ग्रह और बेताल रूपी पक्षी मृगों के समूह को पकड़ने के लिये जाल रूप हो।

Mahalakshmi Ashtakam / महालक्ष्म्यष्टकम्

Mahalakshmi Ashtakam

Mahalakshmi Ashtakam, महालक्ष्म्यष्टकम्, महालक्ष्मी अष्टकम् :- हे देवि ! तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देनेवाली हो। हे महालक्ष्मि ! तुम्हें मेरा प्रणाम है। जो प्रतिदिन तीनों कालों में पाठ करता है, उसके महान् शत्रुओं का नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती हैं।

Shri Lakshmi Stotram / श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् 

Shri Lakshmi Stotram

Shri Lakshmi Stotram, श्री लक्ष्मी स्तोत्रम् :- श्रीलक्ष्मीजी बोलीं- हे देवेश्वर इन्द्र ! मैं तुम्हारे इस स्तोत्र से अति प्रसन्न हूँ, तुमको जो अभीष्ट हो, वही वर माँग लो। मैं तुम्हें वर देने के लिये ही यहाँ आयी हूँ। हे समुद्र सम्भवे ! दूसरा वर मुझे यह दीजिये कि जो कोई आपकी इस स्तोत्र से स्तुति करे, उसे आप कभी न त्यागें। जो कोई मनुष्य प्रातःकाल और सायंकाल के समय इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेगा, उससे भी मैं कभी विमुख न होऊँगी।

Kalyan Vrishti Stotram / कल्याण वृष्टि स्तोत्रम्

Kalyan Vrishti Stotram

Kalyan Vrishti Stotram, कल्याण वृष्टि स्तोत्रम् :- त्रिपुरसुन्दरि ! यद्यपि आपके नेत्रों के लिये देखने के बहुत-से लक्ष्य वर्तमान हैं, तथापि किसी प्रकार आप मेरी ओर दृष्टि डाल दें; क्योंकि निश्चय ही मेरे समान करुणा का पात्र न कोई पैदा हुआ है, न हो रहा है और न पैदा होगा। मातः ! आपका यह अर्धांग जो परम तेजोमय, अत्यधिक कुंकुमपंक से युक्त होने के कारण अरुण, चमकदार किरीट से सुशोभित, चन्द्रकला से विभूषित, अमृत से परमार्द्र और त्रिकोण के मध्य में प्रकट है, सदा शिवजी संलग्न रहे। 

Shri Siddh Saraswati Stotram / श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम

Shri Siddh Saraswati Stotram

Shri Siddh Saraswati Stotram, श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम् :- हे देवि ! मैं आपकी स्तुति तथा आपकी वन्दना करता हूँ, आप कभी भी मेरी वाणी का त्याग न करें, मेरी बुद्धि [धर्म के] विरुद्ध न हो, मेरा मन पापकर्मों की ओर प्रवृत्त न हो, मुझे कभी भी कहीं भी दुःख न हो, विषयों में मेरी  थोड़ी भी आसक्ति न हो; शास्त्र में, तत्त्व निरूपण में और कवित्व में मेरी बुद्धि सदा विकसित होती रहे और उसमें कभी भी कुण्ठा न आने पाये।

Shri Kalika Ashtakam / श्री कालिका अष्टकम्

Shri Kalika Ashtakam

Shri Kalika Ashtakam, श्री कालिका अष्टकम् :- ये स्वर्ग को देनेवाली हैं और कल्पलता के समान हैं। ये भक्तों के मन में उत्पन्न होने वाली कामनाओं को यथार्थ रूप में पूर्ण करती हैं। और वे सदा के लिये कृतार्थ हो जाते हैं; आपके इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते। आपके ध्यान से पवित्र होकर चंचलतावश इस अत्यन्त गुप्तभाव को जो मैंने संसार में प्रकट कर दिया है, मेरे इस अपराध को आप क्षमा करें; आपके इस स्वरूप को देवता भी नहीं जानते।

Bhadrakali Stuti / भद्रकाली स्तुति

Bhadrakali Stuti

Bhadrakali Stuti, भद्रकाली स्तुति :- देवता आपकी वाणी हैं, यह पृथ्वी आपका नितम्ब प्रदेश तथा पाताल आदि नीचे के भाग आपके जङ्घा, जानु, गुल्फ और चरण हैं। धर्म आपकी प्रसन्नता और अधर्म कार्य आपके कोप के लिये है। आपका जागरण ही इस संसार की सृष्टि है और आपकी निद्रा ही इसका प्रलय है। ब्रह्मविज्ञान से ही आपकी प्राप्ति सम्भव है। सर्वसाररूपा, अनन्त स्वरूपिणी माता दुर्गे ! आप हम पर प्रसन्न हों। 

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