Anand Lahari Stotram / आनन्द लहरी स्तोत्रम्

Anand Lahari Stotram

Anand lahari Stotram, आनन्द लहरी स्तोत्रम् :- हे त्रिभुवन महाराज शिव की गृहिणी शिवे ! जहाँ नाना प्रकार के रत्न और स्फटिक मणि की भीत पर तुम्हारा आकार प्रतिबिम्बित हो रहा है, जिसकी अट्टालिका के शिखर पर प्रतिबिम्बित होकर चन्द्रमा की कला सुशोभित हो रही है, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता जिसे घेरकर खड़े रहते हैं, वह तुम्हारा रमणीय भवन विजयी हो रहा है। घी, दूध, दाख और मधु की मधुरता को किसी भी शब्द से विशेष रूप से नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवल रसना (जिह्वा) ही जानती है।

Katyayani Stuti / कात्यायनी स्तुति

Shri Katyayani Stuti

katyayani stuti, श्री कात्यायनी स्तुति :- रक्तवर्ण के नेत्रवाली, रक्तरंजित दन्तपंक्तिवाली तथा रक्त से लिप्त शरीर वाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करने वाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है। निशुम्भ तथा शुम्भ का संहार करने वाली तथा जगत् की सृष्टि करने वाली सुरेश्वरि ! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है। जगन्माता ! प्रसन्न होइये, मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

Devi Stuti / देवी स्तुति

Devi Stuti

Devi Stuti, देवी स्तुति :- जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। पूर्वकाल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्र ने बहुत दिनों तक जिनका सेवन किया, वह कल्याण की साधनाभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले।

Shri Kameshwari Stuti / श्री कामेश्वरी स्तुति

Shri Kameshwari Stuti

Shri Kameshwari Stuti, श्री कामेश्वरी स्तुति :- शरणागतों की पीड़ा का नाश करने वाली, कमल के समान सुन्दर और प्रसन्न मुखवाली माता ! आप मुझ पर प्रसन्न हों। परमे ! पूर्णे ! कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। जो भक्तिपूर्वक आपके शरणागत हैं, वे संसार को शरण देने योग्य हो जाते हैं। तीनों लोकों का पालन करने वाली देवी कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। आप शुद्धज्ञानमयी, सृष्टि को उत्पन्न करने वाली पूर्ण प्रकृति हैं। आप ही विश्व की माता हैं, कामेश्वरी ! आपको नमस्कार है। 

Durga Stuti / दुर्गा स्तुति

Durga Stuti

Durga Stuti. दुर्गा स्तुति :- देहधारियों के शरीर में स्थित षट्चक्रों में* ब्रह्मादि जो छः विभूतियाँ सुशोभित होती हैं, वे प्रलयान्त में आपके आश्रय से ही परमेशपद को प्राप्त होती हैं। इसलिये शिवे ! शिवादि देवों में स्वयं की ईश्वरता नहीं है, अपितु वह तो आप में ही है। देवि ! एकमात्र आपके चरणकमल ही देवताओं के द्वारा वन्दित हैं। दुर्गे ! आप हम पर प्रसन्न हों।

Jaya Stuti / जया स्तुति

Jaya Stuti

Jaya Stuti, जया स्तुति :- देवि ! जिससे समस्त शास्त्रों के सार का ज्ञान होता है, वह मेधाशक्ति आप ही हैं। दुर्गम भवसागर से पार उतारने वाली नौका रूप दुर्गादेवी भी आप ही हैं। आपकी कहीं भी आसक्ति नहीं है। कैटभ के शत्रु भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में एकमात्र निवास करने वाली भगवती लक्ष्मी तथा भगवान् चन्द्रशेखर द्वारा सम्मानित गौरी देवी भी आप ही हैं।

Bhuvneshwari Katyayani Stuti / भुवनेश्वरी कात्यायनी स्तुति

Bhuvneshwari Katyayani Stuti

Bhuvneshwari Katyayani Stuti, भुवनेश्वरी कात्यायनी स्तुति :- देवि ! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे पिता अपने पुत्रों की बुरे कर्मों से रक्षा करता है। विश्वेश्वरि ! तुम विश्व का पालन करती हो। विश्वरूपा हो, इसलिये सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान् विश्वनाथ की भी वन्दनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देनेवाले होते हैं।

Sri Durgapad Uddhar Stotram / दुर्गापद उद्धार स्तोत्र

Sri Durgapad Uddhar Stotram » Sri Durgapad Uddhar Stotram / दुर्गापद उद्धार स्तोत्र

Sri Durgapad Uddhar Stotram, श्री दुर्गापद उद्धार स्तोत्रम् :- विपदाओं से उद्धार का हेतु स्वरूप यह स्तोत्र मैंने कहा। पृथ्वीलोक में, सुवर्गलोक में अथवा पाताल में- कहीं भी तीनों सन्ध्याकालों अथवा एक सन्ध्या काल में इस स्तोत्र का पाठ करने से प्राणी घोर संकट से छूट जाता है; इसमें कोई संदेह नहीं है। जो मनुष्य भक्ति-परायण होकर सम्पूर्ण स्तोत्र को अथवा इसके एक श्लोक को ही पढ़ता है, वह समस्त पापों से छूटकर परम पद प्राप्त करता है।

Shri Devyah Pratah Smaran / श्री देव्याः प्रातः स्मरणम्

Shri Devyah Pratah Smaran

Shri Devyah Pratah Smaranam, श्री देव्याः प्रातः स्मरणम् :- जो भजन करने वाले भक्तों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाली, समस्त जगत् का धारण-पोषण करने वाली, पापों को नष्ट करने वाली, संसार-बन्धन के विमोचन की हेतुभूता तथा परमात्मा विष्णु की परा माया हैं, उनका ध्यान करके मैं प्रातःकाल भजन करता हूँ।

Devi Stotra Ratnakar / देवी स्तोत्र रत्नाकर

Devi Stotra Ratnakar

Devi Stotra Ratnakar, देवी स्तोत्र रत्नाकर :- स्तुति-साहित्य अत्यन्त विशाल है। वेदों के उपासनाकाण्ड में स्तुति का ही प्राधान्य है। तन्त्रागमों तथा पुराणों का तो अधिकांश भाग स्तुतियों से ही भरा पड़ा है। यही बात भक्तों, संतों तथा आचार्यों की वाणियों में भी निहित है। अद्वैतनिष्ठा के सर्वोपरि आचार्य श्रीशंकराचार्य जी ने सभी देवी-देवताओं की स्तुतियाँ निरूपित कर भक्त और भगवान् के यथार्थ-सम्बन्ध का बोध कराया है।

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