Sita Stuti / सीता स्तुति

Sita Stuti

Sita Stuti, सीता स्तुति :- हे जानकी माता ! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ. उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरूपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है। उनकी आदत भूल जाने की है, जिसका कहीं मान नहीं होता, उसको वह मान दिया करते हैं; पर वह भी भूल जाते हैं। हे माता ! तुम उनसे कहना कि तुलसीदास को न भूलिये; क्योंकि उसे मन, वचन और कर्म से स्वप्न में भी किसी दूसरे का आश्रय नहीं है।

Shri Sita Stuti / श्री सीता स्तुति

Shri Sita Stuti

Shri Sita Stuti, श्री सीता स्तुति :- इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचन्द्रजी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जायगी। हे जगज्जननी जानकीजी ! यदि इस दास की आपने इस प्रकार वचनों से ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामी की गुणावली गाकर भव-सागर से तर जायगा।

Shri Janki Stuti / श्री जानकी स्तुति

Shri Janki Stuti

Shri Janki Stuti, श्री जानकी स्तुति :- आपका कमल में निवास है, आप ही हाथ में कमल धारण करने वाली तथा भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करने वाली लक्ष्मी हैं, चन्द्रमण्डल में भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीतादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ। आप श्रीरघुनन्दन की आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और भगवान् शिव की अर्धाङ्गिनी कल्याणकारिणी सती हैं। श्रीरामचन्द्रजी की परम प्रियतमा जगदम्बा जानकी को मैं प्रणाम करता हूँ। सर्वांगसुन्दरी सीताजी का मैं अपने हृदय में निरन्तर चिन्तन करता हूँ।

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