Dwadash Jyotirling Smaranam / द्वादश ज्योतिर्लिंग स्मरणम्

Dwadash Jyotirling Smaranam

Dwadash Jyotirling Smaranam, द्वादश ज्योतिर्लिंग स्मरणम् :- सौराष्ट्रे प्रदेश (काठियावाड़)- में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन)- में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर, सेतुबन्ध में श्रीरामेश्वर, दारूकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी)- में श्रीविश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी)- के तट पर श्रीत्रयम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखण्ड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुमेश्वर को स्मरण करना चाहिये। 

Ved Saar Shiv Stavah / वेद सार शिव स्तवः

Ved saar shiv stavah

Ved saar shiv stavah, वेद सार शिव स्तवः :- जो परमात्मा हैं, एक हैं, जगत् के आदिकारण हैं, इच्छा रहित हैं, निराकार हैं और प्रणव द्वारा जानने योग्य हैं तथा जिनसे सम्पूर्ण विश्व की उत्त्पति होती है और पालन होता है और फिर जिनमें उसका लय हो जाता है, उन प्रभु को मैं भजता हूँ। हे शम्भो ! हे महेश्वर ! हे करुणामय ! हे त्रिशूलिन् ! हे गौरीपते ! हे पशुपते ! हे पशुबन्धमोचन ! हे काशीश्वर ! एक तुम्हीं करुणावश इस जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो; प्रभो ! तुम ही इसके एकमात्र स्वामी हो।

Shiv Panchakshar Stotram / शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्

Sri Shiv Panchakshar Stotram

Sri Shiv Panchakshar Stotram, श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् :- जो कल्याणस्वरूप हैं, पार्वतीजी के मुखकमल को विकसित (प्रसन्न) करने के लिये जो सूर्य स्वरुप हैं, जो दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं जिनकी ध्वजा में बैल का चिन्ह है, उन शोभाशाली नीलकण्ठ ‘शि’ कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, उन दिगम्बर देव ‘य’ कारस्वरूप शिव को नमस्कार है।

Shiv Apradh Kshamapan Stotra / शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र

Shri Shiv Apradh Kshamapan Stotram

Shri Shiv Apradh Kshamapan Stotram, श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् :- जिस सूक्ष्ममार्ग प्राप्य सहस्रदल कमल में पहुँचकर प्राण समूह प्रणवनाद में लीन हो जाते हैं और जहाँ जाकर वेद के वाक्यार्थ तथा तात्पर्यभूत पूर्णतया आविर्भूत ज्योति रूप शान्त परमतत्त्व में लीन हो जाता है, उस कमल में स्थित होकर मैं सर्वान्तर्यामी कल्याणकारी आपका स्मरण नहीं करता हूँ। अतः हे शिव ! हे शिव ! हे शिव ! हे महादेव ! हे शम्भो ! अब मेरे अपराधों को क्षमा करो ! क्षमा करो !

Shiv Manas Puja / शिव मानस पूजा

Shiv Manas Puja

Shiv Manas Puja, शिव मानस पूजा :- मैंने नवीन रत्नखण्डों से खचित सुवर्णपात्र में घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित पाँच प्रकार का व्यंजन, कदलीफल, शर्बत, अनेकों शाक, कपूर से सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल तथा ताम्बूल- ये सब मन के द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं; प्रभो ! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये। हाथों से, पैरों से, वाणी से, शरीर से, कर्म से, कर्णों से, नेत्रों से अथवा मन से भी अपराध किये हों, वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको हे करुणासागर महादेव शम्भो ! आप क्षमा कीजिये। आपकी जय हो, जय हो।

Shiv Mahimna Stotram / शिव महिम्न स्तोत्रम

Shiv Mahimna Stotram

Shiv Mahimna Stotram, शिव महिम्न स्तोत्रम :- बालचन्द्र को सिर पर धारण करने वाले देवाधिदेव महादेव का पुष्पदन्त नामक एक दास, जो सभी गन्धर्वों का राजा था, इन शिवजी के कोप से अपने ऐश्वर्य से च्युत हो गया था। (उसके बाद) उसने इस परम दिव्य शिवमहिम्नः स्तोत्र की रचना की’ (जिससे पुनः उसने उनकी कृपा प्राप्त की।) ‘जो मनुष्य शिवमहिम्नः स्तोत्र का पाठ एक समय, दोनों समय या तीनों समय करेगा, वह समस्त पापों से छुटकारा पाकर शिवलोक में पूजित होगा।’

Sadashiv Ke Vibhinn Swaroop / सदाशिव के विभिन्न स्वरूप

Sadashiv Ke Vibhinn Swaroopon Ka Dhyan

Sadashiv Ke Vibhinn Swaroopon Ka Dhyan, सदाशिव के विभिन्न स्वरूपों का ध्यान :- पशुपति – जिनकी प्रभा मध्याह्न कालीन सूर्य के समान दिव्य रूप में भासित हो रही है, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा विराजित है, जिनका मुखमण्डल प्रचण्ड अट्टहास से उद्भासित हो रहा है, सर्प ही जिनके आभूषण हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि – ये तीन जिनके तीन नेत्रों के रूप में अवस्थित हैं, जिनकी दाढ़ी और सिर की जटाएँ चित्र-विचित्र रंग के मोर पंख के समान स्फुरित हो रही हैं, जिन्होंने अपने करकमलों में त्रिशूल, मुद्गर, तलवार तथा शक्ति को धारण कर रखा है और जिनके चार मुख तथा दाढ़ें भयावह हैं, ऐसे सर्वसमर्थ, दिव्य रूप एवं अस्त्रों को धारण करने वाले पशुपतिनाथ का ध्यान करना चाहिये।

Shiv Mahima Aur Stuti / शिव महिमा और स्तुति

Shiv Mahima Aur Stuti

Shiv Mahima Aur Stuti, शिव महिमा और स्तुति :- वह भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावला है। समस्त प्राणियों के ह्रदय रूप गुफा में निवास करता है ( और ) सर्वव्यापी है, इसलिये वह कल्याण स्वरुप परमेश्वर सब जगह पहुँचा हुआ है। वह परमात्मा हाथ-पैरों से रहित होकर भी समस्त वस्तुओं को ग्रहण करने वाला ( तथा ) वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करने वाला है, आँखों के बिना ही वह सब कुछ देखता है ( और ) कानों के बिना ही सब कुछ सुनता है, वह जो कुछ भी जानने में आने वाली वस्तुएँ हैं उन सबको जानता है परंतु उसको जानने वाला ( कोई ) नहीं है, ( ज्ञानी पुरुष ) उसे महान् आदि पुरुष कहते हैं।

Shiv Pratah Smaran Stotram / शिव प्रातः स्मरण स्तोत्रम्

Shri Shiv Pratah Smaran Stotram

Shri Shiv Pratah Smaran Stotram, श्री शिव प्रातः स्मरण स्तोत्रम् :- जो सांसारिक भय को हरने वाले और देवताओं के स्वामी हैं, जो गंगाजी को धारण करते हैं, जिनका वृषभ वाहन है, जो अम्बिका ईश हैं तथा जिनके हाथ में खट्वांग, त्रिशूल और वरद तथा अभयमुद्रा है, उन संसार-रोग को हरने के निमित्त अद्वितीय औषध रूप ‘ ईश ‘ ( महादेवजी )- का मैं प्रातःसमय में स्मरण करता हूँ। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शिव का ध्यान कर प्रतिदिन इन तीनों श्लोकों का पाठ करते हैं, वे लोग अनेक जन्मों के संचित दुःखसमूह से मुक्त होकर शिवजी के उसी कल्याणमय पद को पाते हैं।

Bhagwan Shiv Ko Namaskar / भगवान् शिव को नमस्कार

Bhagwan Shiv Ko Namaskar

Bhagwan Shiv Ko Namskar, भगवान् शिव को नमस्कार :- जो सम्पूर्ण विद्याओं के ईश्वर, समस्त भूतों के अधीश्वर, ब्रह्म-वेद के अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्य के प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय शिव मेरे लिये नित्य कल्याण स्वरुप बने रहें। परमेश्वर रूप अन्तर्यामी पुरुष को हम जानें, उन महादेव का चिन्तन करें, वे भगवान् रुद्र हमें सद्धर्म के लिये प्रेरित करते रहें। जो अघोर हैं, घोर हैं, घोर से भी घोर तर हैं और जो सर्वसंहारी रूद्र रूप हैं, आपके उन सभी स्वरूपों को मेरा नमस्कार हो।

Shiv Stotra Ratnakar / शिव स्तोत्र रत्नाकर

Shiv Stotra Ratnakar

Shiv Stotra Ratnakar, शिव स्तोत्र रत्नाकर :- भगवान् शंकर के चरित्र बड़े ही उदात्त एवं अनुकम्पापूर्ण हैं। ये ज्ञान, वैराग्य तथा साधुता के परम आदर्श हैं। चन्द्र-सूर्य इनके नेत्र हैं, स्वर्ग सिर है, आकाश नाभि है, दिशाएँ कान हैं। इनके समान न कोई दाता है, न तपस्वी है, न ज्ञानी है, न त्यागी है, न वक्त है, न उपदेष्टा और न कोई ऐश्वर्यशाली ही है। ये सदा सब वस्तुओं से  परिपूर्ण हैं। भगवान् शिव के विविध नाम हैं। उनके अनेक रूपों में उमामहेश्वर, अर्धनारीश्वर, हरिहर, मृत्युंजय, पंचवक्त्र, एकवक्त्र, पशुपति, कृत्तिवास, दक्षिणामूर्ति, योगीश्वर तथा नटराज आदि रूप बहुत प्रसिद्ध हैं।

error: Content is protected !!