Sugriv Ka Dukh Sunna Balivadh Ki Pratigya /सुग्रीव का दुःख

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Sugriv Ka Dukh Sunna, Balivadh Ki Pratigya, Shri Ramji Ka Mitr Lakshan Varnan
सुग्रीव का दुःख सुनना, बालिवध की प्रतिज्ञा, श्री रामजी का मित्र लक्षण वर्णन

Sugriv Ka Dukh Sunna, Balivadh Ki Pratigya, Shriramji Ka Mitr Lakshan Varnan, सुग्रीव का दुःख सुनना, बालिवध की प्रतिज्ञा, श्रीरामजी का मित्र लक्षण वर्णन :- हे खरारि ! मैं वहाँ महीने भर तक रहा। वहाँ ( उस गुफा में ) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। तब [ मैंने समझा कि ] उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ ( गुफा के द्वारपर ) एक शिला लगाकर भाग आया। वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। सेवक का दुःख सुनकर दीनों पर दया करने वाले श्रीरघुनाथजी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठी।    


नाथ बालि अरु मैं दोउ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई ।।
मयसुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ ।।

अर्थात् :- [ सुग्रीव ने कहा – ] हे नाथ ! बालि और मैं दो भाई है। हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकती। हे प्रभो ! मय दानव का एक पुत्र था, उसका नामा मायावी था। एक बार वह हमारे गाँव में आया। 

अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा ।।
धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा ।।

अर्थात् :- उसने आधी रात को नगर के फाटकपर आकर पुकारा ( ललकारा )। बालि शत्रु के बल ( ललकार ) को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाई के सङ्ग लगा चला गया।  

गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई ।।
परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा ।।

अर्थात् :- वह मायावी एक पर्वत की गुफा में जा घुसा। तब बालि ने मुझे समझाकर कहा – तुम एक पखवाड़े ( पंद्रह दिन ) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं उतने दिनों में न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया।   

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी ।।
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई ।।

अर्थात् :- हे खरारि ! मैं वहाँ महीने भर तक रहा। वहाँ ( उस गुफा में ) रक्त की बड़ी भारी धारा निकली। तब [ मैंने समझा कि ] उसने बालि को मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ ( गुफा के द्वारपर ) एक शिला लगाकर भाग आया। 

मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआईं ।।
बाली ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा ।।

अर्थात् :- मन्त्रियों ने नगर को बिना स्वामी ( राजा ) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे [ राजसिंहासन पर ] देखकर उसने जी में भेद बढ़ाया ( बहुत ही विरोध माना )। [ उसने समझा कि यह राज्य के लोभ से ही गुफा के द्वार पर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा ]।

रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी ।।
ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला ।।

अर्थात् :- उसने मुझे शत्रु के समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्री को भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर ! मैं उसके भय से समस्त लोकों में बेहाल होकर फिरता रहा। 

इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं ।।
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला ।।

अर्थात् :- वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। सेवक का दुःख सुनकर दीनों पर दया करने वाले श्रीरघुनाथजी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठी।  

दो० — सुनु सुग्रीव मरिहउँ बालिहि एकहिं बान ।
ब्रह्म रूद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ।। 6 ।।

अर्थात् :- [ उन्होंने कहा – ] हे सुग्रीव ! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रूद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे। 

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