Sugriv Ram Samwad Aur Sitaji Ki Khoj / सुग्रीव राम संवाद

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Sugriv Ram Samwad Aur Sitaji Ki Khoj Ke Liye Bandaron Ka Prasthan
सुग्रीव राम संवाद और सीताजी की खोज के लिये बंदरों का प्रस्थान

Sugriv Ram Samvad Aur Sitaji Ki Khoj Ke Liye Bandaron Ka Prasthan, सुग्रीव राम संवाद और सीताजी की खोज बंदरों का प्रस्थान :- हे उमा ! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजी के चरणों में सिर नवाते हैं और [ सौन्दर्य-माधुर्यनिधि ] श्रीमुख के दर्शन करके कृतार्थ होते हैं। सद्गुणों को पहचानने वाले ( गुणवान् ) बड़ा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजी के चरणों का प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणों में फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले। 

नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी ।।
अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटइ राम करहु जौं दाया ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा – हे नाथ ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव ! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम ! तभी यह छूटती है। 

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी ।।
नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा ।।

अर्थात् :- हे स्वामी ! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में है। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्री का नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयङ्कर क्रोधरूपी अँधेरी रात में भी जागता रहता है ( क्रोधान्ध नहीं होता )। 

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया ।।
यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ।।

अर्थात् :- और लोभ की फाँसी से जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी ! वह मनुष्य आपही के समान है। ये गुण साधन से नहीं प्राप्त होते। आपकी कृपा से कोई-कोई इन्हें पाते हैं।  

तब रघुपति बोले मुसुकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ।।
अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई ।।

अर्थात् :- तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले – हे भाई ! तुम मुझे भरत के समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपाय से सीता की खबर मिले। 

दो० — एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ ।
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरूथ ।। 21 ।।

अर्थात् :- इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरों के यूथ ( झुंड ) आ गये। अनेक रंगों के वानरों के दल सब दिशाओं में दिखायी देने लगे। 

बानर कटक उमा मैं देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा ।।
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा ।।

अर्थात् :- [ शिवजी कहते हैं – ] हे उमा ! वानरों की वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजी के चरणों में सिर नवाते हैं और [ सौन्दर्य-माधुर्यनिधि ] श्रीमुख के दर्शन करके कृतार्थ होते हैं। 

अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं ।।
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई ।।

अर्थात् :- सेना में एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजी ने कुशल न पूछी हो। प्रभु के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है ; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं ( सारे रूपों और सब स्थानों में हैं )। 

ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई ।।
राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा ।।

अर्थात् :- आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गये। तब सुग्रीव ने सबको समझाकर कहा कि हे वानरों के समूहो ! यह श्रीरामचन्द्रजी का कार्य है और मेरा निहोरा ( अनुरोध ) है ; तुम चारों ओर जाओ। 

जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई ।।
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ ।।

अर्थात् :- और जाकर जानकीजी को खोजो। हे भाई ! महीने भर में वापस आ जाना। जो [ महीने भर की ] अवधि बिताकर बिना पता लगाये ही लौट आवेगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा ( अर्थात् मुझे उसका वध करवाना ही पड़ेगा )। 

दो० — बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।
तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत ।। 22 ।।

अर्थात् :- सुग्रीव के वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ ( भिन्न-भिन्न दिशाओं में ) चल दिये। तब सुग्रीवजी ने अंगद, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओं को बुलाया [ और कहा – ]। 

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना ।।
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेहु सब काहू ।।

अर्थात् :- हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान् ! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशा को जाओ और सब किसी से माता सीताजी का पता पूछना। 

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु ।।
भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ।।

अर्थात् :- मन, वचन तथा कर्म से उसी का ( सीताजी का पता लगाने का ) उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सम्पन्न ( सफल ) करना। सूर्य को पीठ से और अग्नि को हृदय से ( सामने से ) सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सर्वभाव से ( मन, वचन, कर्म से ) करनी चाहिये। 

तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भवसंभव सोका ।।
देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई ।।

अर्थात् :- माया ( विपत्तियों की ममता-आसक्ति ) को छोड़कर परलोक का सेवन ( भगवान् के दिव्य धाम की प्राप्ति के लिये भगवत् सेवारूप साधन ) करना चाहिये, जिससे भव ( जन्म-मरण ) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ। हे भाई ! देह धारण करने का यही फल है कि सब कामों ( कामनाओं ) को छोड़कर श्रीरामजी का भजन ही किया जाय। 

सोइ गुनग्य सोई बड़भागी। जो रघुबीर चरन अनुरागी ।।
आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई ।।

अर्थात् :- सद्गुणों को पहचानने वाले ( गुणवान् ) बड़ा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजी के चरणों का प्रेमी है। आज्ञा माँगकर और चरणों में फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले।  

पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा ।।
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ।।

अर्थात् :- सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमान् जी ने सिर नवाया। कार्य का विचार करके प्रभु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर-कमल से उनके सिर का स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी उतारकर दी।  

बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ।।
हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ।।

अर्थात् :- [ और कहा – ] बहुत प्रकार से सीता को समझाना और मेरा बल तथा विरह ( प्रेम ) कहकर तुम शीघ्र लौट आना। हनुमान् जी ने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभु को हृदय में धारण करके वे चले। 

जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता ।।

अर्थात् :- यद्यपि देवताओं की रक्षा करने वाले प्रभु सब जानते हैं, तो भी वे राजनीति की रक्षा कर रहे हैं। ( निति की मर्यादा रखने के लिये सीताजी का पता लगाने को जहाँ-तहाँ वानरों को भेज रहे हैं )। 

दो० — चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह ।
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह ।। 23 ।।

अर्थात् :- सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतों की कन्दराओं में खोजते हुए चले जा रहे हैं। मन श्रीरामजी के कार्य में लवलीन है। शरीर तक का प्रेम ( ममत्व ) भूल गया है।

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