Sumantra Ka Ayodhya Ko Lautna / सुमन्त्र का अयोध्या को लौट

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Sumantra Ka Ayodhya Ko Lautna
सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना

Sumantra Ka Ayodhya Ko Lautna, सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना :- कोमल वाणी से भाँति-भाँति की कथाएँ कहकर निषाद ने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्र को रथ पर बैठाया। परन्तु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हाँक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है। मन्त्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया है। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथी के साथ कर दिये। व्याकुल और दुःख से दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीरजी के बिना जीने का धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है या नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश [ क्यों ] नहीं ले लिया।


धरि धीरजु कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू ।।

तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता ।।

अर्थात् :- तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा – हे सुमन्त्रजी ! अब विषाद को छोड़िये। आप पण्डित और परमार्थ जानने वाले हैं। विधाता को प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये।

बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी ।।
सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी ।।

अर्थात् :- कोमल वाणी से भाँति-भाँति की कथाएँ कहकर निषाद ने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्र को रथ पर बैठाया। परन्तु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हाँक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है।

चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ।।
अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें ।।

अर्थात् :- घोड़े तड़फड़ाते हैं और [ ठीक ] रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में जोत दिये गये हों। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगी घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दुःख से व्याकुल हैं।

जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही ।।
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती ।।

अर्थात् :- जो कोई रामजी, लक्ष्मणजी और जानकीजी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर-हिकर कर उसके ओर प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरहदशा कैसे कही जा सकती है ? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि के बिना साँप व्याकुल होता है।

दो० — भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग ।
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग ।। 143 ।।

अर्थात् :- मन्त्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया है। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथी के साथ कर दिये।

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई ।।
चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा ।।

अर्थात् :- निषादराज गुह सारथी ( सुमन्त्रजी ) को पहुँचाकर ( विदा करके ) लौटा। उसके विरह और दुःख का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवध को चले। [ सुमन्त्रजी और घोड़ों को देख-देखकर ] वे भी क्षण-क्षणभर विषाद में डूबे जाते थे।

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना ।।
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ।।

अर्थात् :- व्याकुल और दुःख से दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीरजी के बिना जीने का धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है या नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश [ क्यों ] नहीं ले लिया।

भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना ।।
अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ।।

अर्थात् :- ये प्राण अपयश और पाप के भाँडे हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं )? हाय ! नीच मन [ बड़ा अच्छा ] मौका चूक गया। अब भी तो हृदय के दो टुकड़े नहीं हो जाते।

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई ।।
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई ।।

अर्थात् :- सुमन्त्रजी हाथ मल-मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धन का खजाना खो बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीर का बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्ध से भाग चला हो।

दो० — बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति ।
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति ।। 144 ।।

अर्थात् :- जैसे कोई विवेकशील, वेद का ज्ञाता, साधु सम्मत आचरणों वाला और उत्तम जाति का ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी ले और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मन्त्री सुमन्त्रजी सोच रहे ( पछता रहे ) हैं।

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी ।।
रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू ।।

अर्थात् :- जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वभाव की, समझदार और मन, वचन, कर्म से पति को ही देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर ( पति से अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जैसे भयानक सन्ताप होता है, वैसे ही मन्त्री के हृदय में हो रहा है।

लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी ।।
सुखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी ।।

अर्थात् :- नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानों से सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सुख रहे हैं, मुँह में लाटी लग गयी है। किन्तु [ ये सब मृत्यु के लक्षण हो जाने पर भी ] प्राण नहीं निकलते ; क्योंकि हृदय में अवधि रूपी किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रूकावट डाल रही है )।

बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी ।।
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी ।।

अर्थात् :- सुमन्त्रजी के मुख का रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो इन्होने माता-पिता को मार डाला हो। उनके मन में रामवियोग रूपी हानि की महान् ग्लानि ( पीड़ा ) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरक को जाता हुआ रास्ते में सोच कर रहा हो।

बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई ।।
राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ।।

अर्थात् :- मुँह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूँगा ? श्रीरामचन्द्रजी ने शून्य रथ को जो भी देखेगा, वही मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा )।

दो० — धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि ।
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि ।। 145 ।।

अर्थात् :- नगर के सब व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदय पर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा।

पूछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता ।।
पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी ।।

अर्थात् :- जब दीन-दुःखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता ! मैं उन्हें क्या कहूँगा ? जब लक्ष्मणजी की माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा ?

राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ।।
पूँछत उतरू देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी की माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़े को याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछने पर मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी वन को चले गये !

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा ।।
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना ।।

अर्थात् :- जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा ! हाय ! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है ! जब दुःख से दीन महाराज दशरथजी, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजी के [ दर्शन के ] ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे।

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई ।।
सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू ।।

अर्थात् :- तब मैं कौन सा मुँह लेकर उनको उत्तर दूँगा कि मैं राजकुमारों को कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ ! लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामजी समाचार सुनते ही महाराज तिनके की तरह शरीर को त्याग देंगे।

दो० — हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ।
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ।। 146 ।।

अर्थात् :- प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाता ने मुझे यह ‘ यातनाशरीर ‘ ही दिया है [ जो पापी जीवों को नरक भोगने के लिये मिलता है ] ।

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