Sita Stuti / सीता स्तुति

Sita Stuti

Sita Stuti, सीता स्तुति :- हे जानकी माता ! कभी मौका पाकर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी याद दिला देना। मैं उन्हीं का दास कहाता हूँ. उन्हीं का नाम लेता हूँ, उन्हीं के लिये पपीहे की तरह प्रण किये बैठा हूँ, मुझे उनके स्वाती-जलरूपी प्रेमरस की बड़ी प्यास लग रही है। उनकी आदत भूल जाने की है, जिसका कहीं मान नहीं होता, उसको वह मान दिया करते हैं; पर वह भी भूल जाते हैं। हे माता ! तुम उनसे कहना कि तुलसीदास को न भूलिये; क्योंकि उसे मन, वचन और कर्म से स्वप्न में भी किसी दूसरे का आश्रय नहीं है।

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