Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed / तप और दान के पृथक

अध्याय सत्रह श्रद्धा के विभाग

Aahar, Yagya, Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed
आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक पृथक भेद

Aahar, Yagya, Tap Aur Daan Ke Prithak Prithak Bhed, आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक पृथक भेद- परमेश्वर, ब्राह्मणों , गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है। सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना — यही वाणी की तपस्या है। तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि — ये मन की तपस्याएँ हैं ।

श्लोक 7 से 22

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ।। 7 ।।

आहारः — भोजन ; तु — निश्चय ही ; अपि — भी ; सर्वस्य — हर एक को ; त्रि-विधः — तीन प्रकार का ; भवति — होता है ; प्रियः — प्यारा ; यज्ञः — यज्ञ ; तपः — तपस्या ; तथा — और ; दानम् — दान ; तेषाम् — उनका ; भेदम् — अन्तर ; इमम् — यह ; शृणु — सुनो ।

तात्पर्य — यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन पसन्द करता है, वह भी प्रकृति के गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है। यही बात यज्ञ, तपस्या तथा दान के लिए भी सत्य है। अब उनके भेदों के विषय में सुनो ।

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्त्रिग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ।। 8 ।।

आयुः — जीवन काल ; सत्त्व — अस्तित्व ; बल — बल ; आरोग्य — स्वास्थ्य ; सुख — सुख ; प्रीति — तथा संतोष ; विवर्धनाः — बढ़ाते हुए ; रस्याः — रस से युक्त ; स्त्रिग्धाः — चिकना ; स्थिराः — सहिष्णु ; हृद्याः — हृदय को भाने वाले ; आहारः — भोजन ; सात्त्विक — सतोगुणी ; प्रियाः — अच्छे लगने वाले ।

तात्पर्य — जो भोजन सात्त्विक व्यक्तियों को प्रिय होता है, वह आयु बढ़ने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला तथा बल, स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति प्रदान करने वाला होता है। ऐसा भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा हृदय को भाने वाला होता है ।

कट्वम्ल्लवणात्युष्णतीक्ष्णरुक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ।। 9 ।।

कटु — कडुवे, तीते ; अम्ल — खट्टे ; लवण — नमकीन ; अति-उष्ण — अत्यन्त गरम ; तीक्ष्ण — चटपटे ; रुक्ष — शुष्क ; विदाहिनः — जलाने वाले ; आहाराः — भोजन ; राजसस्य — रजोगुणी के ; इष्टाः — रुचिकर ; दुःख — दुःख ; शोक — शोक ; आमय — रोग ; प्रदाः — उत्पन्न करने वाले ।

तात्पर्य — अत्यधिक तिक्त, खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन दुःख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने वाले हैं ।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ।। 10 ।।

यात-यामम् — भोजन करने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया ; गत-रसम् — स्वादरहित ; पूति — दुर्गंधयुक्त ; पर्युषितम् — बिगड़ा हुआ ; च — भी ; यत् — जो ; उच्छिष्टम् — अन्यों का जूठन ; अपि — भी ; च — तथा ; अमेध्यम् — अस्पृश्य ; भोजनम् — भोजन ; तामस — तमोगुणी को ; प्रियम् — प्रिय ।

तात्पर्य — खाने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया, स्वादहीन, वियोजित एवं सड़ा, जूठा तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन उन लोगों को प्रिय होता है, जो तामसी होते हैं ।

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। 11 ।।  

अफल-आकाङ्क्षिभिः — फल की इच्छा से रहित ; यज्ञः — यज्ञ ; विधि-दिष्टः — शास्त्रों के निर्देशानुसार ; यः — जो ; इज्यते — सम्पन्न किया जाता है ; यष्टव्यम् — सम्पन्न किया जाना चाहिए ; एव — निश्चय ही ; इति — इस प्रकार ; मनः — मन में ; समाधाय — स्थिर करके ; सः — वह ; सात्त्विकः — सतोगुणी ।.

तात्पर्य — यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जो फल की इच्छा नहीं करते ।

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अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।। 12 ।।

अभिसन्धाय — इच्छा कर के ; तु — लेकिन ; फलम् — फल को ; दम्भ — घमंड ; अर्थम् — के लिए ; अपि — भी ; च — तथा ; एव — निश्चय ही ; यत् — जो ; इज्यते — किया जाता है ; भरत-श्रेष्ठ — हे भरतवंशियों में प्रमुख ; तम् — उस ; यज्ञम् — यज्ञ को ; विद्धि — जानो ; राजसम् — रजोगुणी ।

तात्पर्य — लेकिन हे भरतश्रेष्ठ ! जो यज्ञ किसी भौतिक लाभ के लिए या गर्ववश किया जाता है, उसे तुम राजसी मानो ।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।। 13 ।।

विधि-हीनम् — शास्त्रीय निर्देश के बिना ; असृष्ट-अन्नम् — प्रसाद वितरण किये बिना ; मन्त्र-हीनम् — वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना ; अदक्षिणम् — पुरोहितों को दक्षणा दिये बिना ; श्रद्धा — श्रद्धा ; विरहितम् — विहीन ; यज्ञम् — यज्ञ को ; तामसम् — तामसी ; परिचक्षते — माना जाता है ।

तात्पर्य — जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता है, वह तामसी मन जाता है।

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।। 14 ।।

देव — परमेश्वर ; द्विज — ब्राह्मण ; गुरु — गुरु ; प्राज्ञ — तथा पूज्य व्यक्तियों की ; पूजनम् — पूजा ; शौचम् — पवित्रता ; आर्जवम् — सरलता ; ब्रह्मचर्यम् — ब्रह्मचर्य ; अहिंसा — अहिंसा ; च — भी ; शरीरम् — शरीर सम्बन्धी ; तपः — तपस्या ; उच्यते — कहा जाता है ।

तात्पर्य — परमेश्वर, ब्राह्मणों , गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वांड्मयं तप उच्यते ।। 15 ।।

अनुद्वेग-करम् — क्षुब्ध न करने वाले ; वाक्यम् — शब्द ; सत्यम् — सच्चे ; प्रिय — प्रिय ; हितम् — लाभप्रद ; च — भी ; यत् — जो ; स्वाध्याय — वैदिक अध्ययन का ; अभ्यसनम् — अभ्यास ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; वाक्-मयम् — वाणी की ; तपः — तपस्या ; उच्यते — कही जाती है ।

तात्पर्य — सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पारायण करना — यही वाणी की तपस्या है ।

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंश्रुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।। 16 ।।

मनः-प्रसादः — मन की तुष्टि ; सौम्यत्वम् — अन्यों के प्रति कपट भाव से रहित ; मौनम् — गम्भीरता ; आत्म — अपना ; विनिग्रहः — नियन्त्रण, संयम ; भाव — स्वभाव का ; संश्रुद्धि — शुद्धीकरण ; इति — इस प्रकार ; एतत् — यह ; तपः — तपस्या ; मानसम् — मन की ; उच्यते — कही जाती है ।

तात्पर्य — तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि — ये मन की तपस्याएँ हैं ।

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।। 17 ।।

श्रद्धया — श्रद्धा समेत ; परया — दिव्य ; तप्तम् — किया गया ; तपः — तप ; तत् — वह ; त्रि-विधम् — तीन प्रकार के ; नरैः — मनुष्यों द्वारा ; अफल-आकाङक्षिभिः — फल की इच्छा न करने वाला ; युक्तैः — प्रवृत्त ; सात्त्विकम् — सतोगुण में ; परिचक्षते — कहा जाता है ।

तात्पर्य — भौतिक लाभ की इच्छा न करने वाले तथा केवल परमेश्वर में प्रवृत्त मनुष्यों द्वारा दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न यह तीन प्रकार की तपस्या सात्त्विक तपस्या कहलाती है ।

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