Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh / तारा का

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh Aur Sugriv Ka Rahyabhishek Tatha Angad Ko Yuvrajpad
तारा का विलाप, तारा को श्री रामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अङ्गद को युवराजपद

Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh Aur Sugriv Ka Rahyabhishek Tatha Angad Ko Yuvrajpad, तारा का विलाप, तारा को श्री रामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अंगद को युवराजपद :- हे उमा ! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक-कर्म किया। हे पार्वती ! जगत् में श्रीरामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं।      

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा ।।
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है। 

तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ।।
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा ।।

अर्थात् :-  तारा को व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया ( अज्ञान ) हर ली। [ उन्होंने कहा – ] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु – इन पाँच तत्त्वों से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है। 

प्रगट सो तनु तव आगें सेवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ।।
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी ।।

अर्थात् :- वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही है ? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया। 

उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं ।।
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा ।।

अर्थात् :- [ शिवजी कहते हैं – ] हे उमा ! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक-कर्म किया। 

राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई ।।
रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा ।।

अर्थात् :- तब श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजी की प्रेरणा ( आज्ञा ) से सब लोग श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले। 

दो० — लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज ।
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज ।। 11 ।।

अर्थात् :- लक्ष्मणजी ने तुरंत ही सब नगर निवासियों को और ब्राह्मणों के समाज को बुला लिया और [ उनके सामने ] सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया। 

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ।।
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ।।

अर्थात् :- हे पार्वती ! जगत् में श्रीरामजी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थ के लिये ही सब प्रीति करते हैं। 

बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती ।।
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ ।।

अर्थात् :– जो सुग्रीव दिन-रात बालि के भय से व्याकुल रहता था, जिसके शरीर में बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिंता के मारे जला करती थी, उसी सुग्रीव को उन्होंने वानरों का राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है। 

जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं ।।
पुनि सुग्रीवहिं लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई ।।

अर्थात् :- जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभु को त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्ति के जाल में फँसें ? फिर श्रीरामजी ने सुग्रीव को बुला लिया और बहुत प्रकार से उन्हें राजनितिक की शिक्षा दी। 

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा ।।
गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई ।।

अर्थात् :- फिर प्रभु ने कहा – हे वनरपति सुग्रीव ! सुनो, मैं चौदह वर्ष तक गाँव ( बस्ती ) में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म-ऋतु आ गयी। अतः मैं यहाँ पास ही पर्वत पर टिक रहूँगा। 

अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयँ धरेहु मम काजू ।।
जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए ।।

अर्थात् :- तुम अंगद सहित राज्य करो। मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वत पर जा टिके। 

दो० — प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ ।
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ ।। 12 ।।

अर्थात् :- देवताओं ने पहले से ही उस पर्वत की एक गुफा को सुन्दर बना ( सजा ) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपा की खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे। 

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा ।।
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।

अर्थात् :- सुन्दर वन फुला हुआ अत्यन्त सुशोभित है। मधु के लोभ से भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं। जब से प्रभु आये, तब से वन में सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्तों की बहुतायत हो गयी। 

देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा ।।
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा ।।

अर्थात् :- मनोहर और अनुपम पर्वत को देखकर देवताओं के सम्राट् श्रीरामजी छोटे भाई सहित वहाँ रह गये। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरों, पक्षियों और पशुओं के शरीर धारण करके प्रभु की सेवा करने लगे। 

मंगलरूप भयउ बन तब ते। कीन्ह निवास रमापति जब ते ।।
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई ।।

अर्थात् :- जब से रमापति श्रीरामजी ने वहाँ निवास किया तबसे वन मङ्गल स्वरुप हो गया। सुन्दर स्फटिकमणि की एक अत्यन्त उज्ज्वल शिला है, उस पर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं। 

कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका ।।
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजी से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञान की अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकाल में आकाश में छाये हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं। 

दो० — लछिमन देखु मोर गन नाचत बारद पेखि ।
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि ।। 13 ।।

अर्थात् :- [  श्रीरामजी कहने लगे – ] हे लक्ष्मण ! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं। जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं। 

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