Teenon Gunon Ke Anusar Gyan / तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान

अध्याय अठारह उपसंहार

Teenon Gunon Ke Anusar Gyan, Karma, Karta, Buddhi, Dhriti Aur Sukh Ke Prithak Prithak Bhed
तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक्-पृथक् भेद

Teenon Gunon Ke Anusar Gyan, Karma, Karta, Buddhi, Dhriti Aur Sukh Ke Prithak Prithak Bhed, तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक्-पृथक् भेद- हे पृथापुत्र ! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य यह जानता है कि क्या करणीय है और क्या नहीं है, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, क्या बाँधने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है। हे भरतश्रेष्ठ ! 

श्लोक 19 से 40

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ।। 19 ।।

ज्ञानम् — ज्ञान ; कर्म — कर्म ; च — भी ; कर्ता — कर्ता ; च — भी ; त्रिधा — तीन प्रकार का ; एव — निश्चय ही ; गुण-भेदतः — प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार ; प्रोच्यते — कहे जाते हैं ; गुण-सङ्ख्याने — विभिन्न गुणों के रूप में ; यथा-वत् — जिस रूप में हैं उसी में ; शृणु — सुनो ; तानि — उन सबों को ; अपि — भी।

तात्पर्य — प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ही ज्ञान, कर्म तथा कर्ता के तीन-तीन भेद हैं। अब तुम मुझसे इन्हें सुनो ।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ।। 20 ।।

सर्व-भूतेषु — समस्त जीवों में ; येन — जिससे ; एकम् — एक ; भावम् — स्थिति ; अव्ययम् — अविनाशी ; ईक्षते — देखता है ; अविभक्तम् — अविभाजित ; विभक्तेषु — अनन्त विभागों में बँटे हुए में ; तत् — उस ; ज्ञानम् — ज्ञान को ; विद्धि — जानो ; सात्त्विकम् — सतोगुणी ।

तात्पर्य — जिस ज्ञान से अनन्त रूपों में विभक्त सारे जीवों में एक ही अविभक्त आध्यात्मिक प्रकृति देखी जाती है, उसे ही तुम सात्त्विक जानो ।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ।। 21 ।।

पृथक्त्वेन — विभाजन के कारण ; तु — लेकिन ; यत् — जो ; ज्ञानम् — ज्ञान ; नाना-भावान् — अनेक प्रकार की अवस्थाओं को ; पृथक्-विधान् — विभिन्न ; वेत्ति — जानता है ; सर्वेषु — समस्त ; भूतेषु — जीवों में ; तत् — उस ; ज्ञानम् — ज्ञान को ; विद्धि — जानो ; राजसम् — राजसी ।

तात्पर्य — जिस ज्ञान से कोई मनुष्य विभिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रकार का जीव देखता है, उसे तुम राजसी जानो ।

 यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ।। 22 ।।

यत् — जो ; तु — लेकिन ; कृत्स्न-वत् — पूर्ण रूप से ; एकस्मिन् — एक ; कार्ये — कार्य में ; सक्तम् — आसक्त ; अहैतुकम् — बिना हेतु के ; अतत्त्व-अर्थ- वत् — वास्तविकता के ज्ञान से रहित ; अल्पम् — अति तुच्छ ; च — तथा ; तत् — वह ; तामसम् — तमोगुणी ; उदाहृतम् — कहा जाता है।

तात्पर्य — और वह ज्ञान, जिससे मनुष्य किसी एक प्रकार के कार्य को, जो अति तुच्छ है, सब कुछ मान कर, सत्य को जाने बिना उसमें लिप्त रहता है, तामसी कहा जाता है ।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ।। 23 ।।

नियतम् — नियमित ; सङ्ग-रहितम् — आसक्ति रहित ; अराग-द्वेषतः — राग-द्वेष से रहित ; कृतम् — किया गया ; अफल-प्रेप्सुना — फल की इच्छा से रहित वाले के द्वारा ; कर्म — कर्म ; यत् — जो ; तत् — वह ; सात्त्विकम् — सतोगुणी ; उच्यते — कहा जाता है। 

तात्पर्य — जो कर्म नियमित है जो आसक्ति, राग या द्वेष से रहित कर्मफल की चाह के बिना किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है ।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ।। 24 ।।

यत् — जो ; तु — लेकिन ; काम-इप्सुना — फल की इच्छा रखने वाले के द्वारा ; कर्म — कर्म ; स-अहङ्कारेण — अहंकार सहित ; वा — अथवा ; पुनः — फिर ; क्रियते — किया जाता है ; बहुल-आयासम् — कठिन परिश्रम से ; तत् — वह ; राजसम् — राजसी ; उदाहृतम् — कहा जाता है। 

तात्पर्य — लेकिन जो कार्य अपनी इच्छा पूर्ति के निमित्त प्रयासपूर्वक एवं मिथ्या अहंकार के भाव से किया जाता है, वह रजोगुणी कहा जाता है।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहदारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ।। 25 ।।

अनुबन्धम् — भावी बन्धन का ; क्षयम् — विनाश ; हिंसाम् — तथा अन्यों को कष्ट ; अनपेक्ष्य — परिणाम पर विचार किये बिना ; च — भी ; पौरुषम् — सामर्थ्य को ; मोहात् — मोह से ; आरभ्यते — प्रारम्भ किया जाता है ; कर्म — कर्म ; यत् — जो ; तत् — वह ; तामसम् — तामसी ; उच्यते — कहा जाता है। 

तात्पर्य — जो कर्म मोहवश शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना करके तथा भावी बन्धन की परवाह किये बिना या हिंसा अथवा अन्यों को दुःख पहुँचाने के लिए किया जाता है, वह तामसी कहलाता है ।

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मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निविकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ।। 26 ।।

मुक्त-सङ्ग — सारे भौतिक संसर्ग से मुक्त ; अनहम्-वादी — मिथ्या अहंकार से रहित ; धृति — संकल्प ; उत्साह — तथा उत्साह सहित ; समन्वितः — योग्य ; सिद्धि — सिद्धि ; असिद्ध्योः — तथा विफलता में ; निर्विकारः — बिना परिवर्तन के ; कर्ता — कर्ता ; सात्त्विकः — सतोगुणी ; उच्यते — कहा जाता है। 

तात्पर्य — जो व्यक्ति भौतिक गुणों के संसर्ग के बिना अहंकाररहित, संकल्प तथा उत्साहपूर्वक अपना कर्म करता है और सफलता अथवा असफलता में अविचलित रहता है, वह सात्त्विक करता कहलाता है।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽश्रूचिः
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ।। 27 ।।

रागी — अत्यधिक आसक्त ; कर्म-फल — कर्म के फल की ; प्रेप्सुः — इच्छा करते हुए ; लुब्धः — लालची ; हिंसा-आत्मकः — सदैव ईर्ष्यालु ; अश्रूचिः — अपवित्र ; हर्ष-शोक-अन्वितः — हर्ष तथा शोक से युक्त ; कर्ता — ऐसा कर्ता ; राजसः — रजोगुणी ; परिकीर्तितः — घोषित किया जाता है। 

तात्पर्य — जो कर्ता कर्म तथा कर्म-फल के प्रति आसक्त होकर फलों का भोग करना चाहता है तथा जो लोभी, सदैव ईर्ष्यालु, अपवित्र और सुख-दुःख से विचलित होने वाला है, वह राजसी कहा जाता है।

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ।। 28 ।।

आयुक्तः — शास्त्रों के आदेशों को न मानने वाला ; प्राकृतः — भौतिकवादी ; स्तब्धः — हठी ; शठः –– कपटी ; नैष्कृतिकः — अन्यों का अपमान करने में पटु ; अलसः — आलसी ; विषादी — खिन्न ; दीर्घ-सूत्री — ऊँघ-ऊँघ कर काम करने वाला, देर लगाने वाला ; च — भी ; कर्ता — कर्ता ; तामसः — तमोगुणी ; उच्यते — कहलाता है।

तात्पर्य — जो कर्ता सदा शास्त्रों के आदेशों के विरुद्ध कार्य करता रहता है, जो भौतिकवादी, हठी, कपटी तथा अन्यों का अपमान करने में पटु है तथा जो आलसी, सदैव खिन्न तथा काम करने में दीर्घसूत्री है, वह तमोगुणी कहलाता है।

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ।। 29 ।।

बुद्धेः — बुद्धि का ; भेदम् — अन्तर ; धृतेः — धैर्य का ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; गुणतः — गुणों के द्वारा ; त्रि-विधम् — तीन प्रकार के ; शृणु — सुनो ; प्रोच्यमानम् — जैसा मेरे द्वारा कहा गया ; अशेषेण — विस्तार से ; पृथक्त्वेन — भिन्न प्रकार से ; धनञ्जय — हे सम्पति के विजेता ।

तात्पर्य — हे धनञ्जय ! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा धृति के विषय में विस्तार से बताऊँगा। तुम इसे सुनो।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ।। 30 ।।

प्रवृत्तिम् —  कर्म को ; च — भी ; निवृत्तिम् — अकर्म को ; च — तथा ; कार्य — करणीय ; अकार्ये — तथा अकरणीय में ; भय — भय ; अभये — तथा निडरता में ; बन्धम् — बन्धन ; मोक्षम् — मोक्ष ; च — तथा ; या — जो ; वेत्ति — जानता है ; बुद्धिः — बुद्धि ; सा — वह ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; सात्त्विकी — सतोगुणी ।

तात्पर्य — हे पृथापुत्र ! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य यह जानता है कि क्या करणीय है और क्या नहीं है, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं, क्या बाँधने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ।। 31 ।।

यया — जिसके द्वारा ; धर्मम् — धर्म को ; अधर्मम् — अधर्म को ; च — तथा ; कार्यम् — करणीय ; च — भी ; अकार्यम् — अकरणीय को ; एव — निश्चय ही ; च — भी ; अयथा-वत् — अधूरे ढंग से ; प्रजानाति — जानती है ; बुद्धिः — बुद्धि ; सा — वह ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; राजसी — रजोगुणी ।

तात्पर्य — हे पृथापुत्र ! जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म, करणीय तथा अकरणीय कर्म में भेद नहीं कर पाती, वह राजसी है।

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