Tyag Ka Vishay / त्याग का विषय

अध्याय अठारह उपसंहार

Tyag Ka Vishay
त्याग का विषय

Tyag Ka Vishay, त्याग का विषय- अर्जुन ने कहा — हे महाबाहु ! मैं त्याग का उद्देश्य जानने का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हृषिकेश ! मैं त्यागमय जीवन ( संन्यास आश्रम ) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ। भगवान् ने कहा – भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं। 

श्लोक 1 से 12

अर्जुन उवाच —
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ।। 1 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा ; सन्न्यासस्य — संन्यास ( त्याग ) का ; महा-बाहो — हे बलशाली भुजाओं वाले ; तत्त्वम् — सत्य को ; इच्छामि — चाहता हूँ ; वेदितुम् — जानना ; त्यागस्य — त्याग ( संन्यास ) का ; च — भी ; हृषिकेश — हे इन्द्रियों के स्वामी ; पृथक् — भिन्न रूप से ; केशी-निषूदन — हे केशी असुर के संहर्ता ।

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे महाबाहु ! मैं त्याग का उद्देश्य जानने का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हृषिकेश ! मैं त्यागमय जीवन ( संन्यास आश्रम ) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ ।

श्रीभगवानुवाच —
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ।। 2 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा ; काम्यानाम् — काम्यकर्मों का ; कर्मणाम् — कर्मों का ; न्यासम् — त्याग ; सन्न्यासम् — संन्यास ; कवयः — विद्वान जन ; विदुः — जानते हैं ; सर्व – समस्त ; कर्म — कर्मों का ; फल — फल ; त्यागम् — त्याग को ; प्राहुः — कहते हैं ; त्यागम् — त्याग ; विचक्षणाः — अनुभवी ।  

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं ।

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ।। 3 ।।

त्याज्यम् — त्याजनीय ; दोष-वत् — दोष के समान ; इति — इस प्रकार ; एके — एक समूह के ; कर्म — कर्म ; प्राहुः — कहते हैं ; मनीषिणः — महान चिन्तक ; यज्ञ — यज्ञ ; दान — दान ; तपः — तथा तपस्या का ; कर्म — कर्म ; न — कभी नहीं ; त्याज्यम् — त्यागने चाहिए ; इति — इस प्रकार ; च — तथा ; अपरे — अन्य ।

तात्पर्य — कुछ विद्वान घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के सकाम कर्मों को दोषपूर्ण समझ कर त्याग देना चाहिए। किन्तु अन्य विद्वान् मानते हैं कि यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों को कभी नहीं त्यागना चाहिए ।

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ।। 4 ।।

निश्चयम् — निश्चय को ; शृणु — सुनो ; मे — मेरे ; तत्र — वहाँ ; त्यागे — त्याग के विषय में ; भरत-सत्-तम — हे भरतश्रेष्ठ ; त्यागः — त्याग ; हि — निश्चय ही ; पुरुष-व्याघ्र — हे मनुष्यों में बाघ ; त्रि-विधः — तीन प्रकार का ; सम्प्रकीर्तितः — घोषित किया जाता है ।

तात्पर्य —  भरतश्रेष्ठ ! अब त्याग के विषय में मेरा निर्णय सुनो। हे नरशार्दूल ! शास्त्रों में त्याग तीन तरह का बताया गया है ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  2. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग
  3. अध्याय सत्रह — श्रद्धा के विभाग

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।। 5 ।।

यज्ञ — यज्ञ ; दान — दान ; तपः — तथा तप का ; कर्म — कर्म ; न — कभी नहीं ; त्याज्यम् — त्यागने के योग्य ; कार्यम् — करना चाहिए ; एव — निश्चय ही ; तत् — उसे ; यज्ञः — यज्ञ ; दानम् — दान ; तपः — तप ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; पावनानि — शुद्ध करने वाले ; मनीषिणाम् — महात्माओं के लिए भी ।

तात्पर्य — यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए, उन्हें अवश्य सम्पन्न करना चाहिए। निस्सन्देह यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध बनाते हैं ।

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ।। 6 ।।  

एतानि — ये सब ; अपि — निश्चय ही ; तु — लेकिन ; कर्माणि — कार्य ; सङ्गम् — संगति को ; त्यक्त्वा — त्यागकर ; फलानि — फलों को ; च — भी ; कर्तव्यानि — कर्तव्य समझ कर करने चाहिए ; इति — इस प्रकार ; मे — मेरा ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; निश्चितम् — निश्चित ; मतम् — मत ; उत्तमम् — श्रेष्ठ ।

तात्पर्य — इन सारे कार्यों को किसी प्रकार की आसक्ति या फल की आशा के बिना सम्पन्न करना चाहिए। हे पृथापुत्र ! इन्हें कर्तव्य मानकर सम्पन्न किया जाना चाहिए। यही मेरा अन्तिम मत है ।

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ।। 7 ।।

नियतस्य — नियत, निर्दिष्ट ( कार्य ) का ; तु — लेकिन ; सन्न्यासः — संन्यास, त्याग ; कर्मणः — कर्मों का ; न — कभी नहीं ; उपपद्यते — योग्य होता है ; मोहात् — मोहवश ; तस्य — उसका ; परित्यागः — त्याग देना ; तामसः — तमोगुणी ; परिकीर्तितः — घोषित किया जाता है ।

तात्पर्य — निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए। यदि कोई मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देता है, तो ऐसे त्याग को तामसी कहते हैं ।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ।। 8 ।।

दुःखम् — दुःखी ; इति — इस प्रकार ; एव — निश्चय ही ; यत् — जो ; कर्म — कार्य ; काय — शरीर के लिए ; क्लेश — कष्ट के ; भयात् — भय से ; त्यजेत् — त्याग देता है ; सः — वह ; कृत्वा — करके ; राजसम् — रजोगुण में ; त्यागम् — त्याग ; न — नहीं ; एव — निश्चय ही ; त्याग — त्याग ; फलम् — फल को ; लभेत् — प्राप्त करता है ।

तात्पर्य — जो व्यक्ति नियत कर्मों को कष्टप्रद समझ कर या शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, उसके लिए कहा जाता है कि उसने यह त्याग रजोगुण में किया है। ऐसा करने से कभी त्याग का उच्चफल प्राप्त नहीं होता ।

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