Utpanna Ekadashi Vrat Katha / उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

Utpanna Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi
उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि


Utpanna Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi, उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष में किया जाता है। इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा का विधि-विधान है।

उत्पन्ना एकादशी पूजा विधि :-

व्रत रहने वाले को दशमी के दिन-रात में भोजन न करना चाहिये। उत्पन्ना एकादशी के दिन ब्रह्म वेला में ही भगवान् की पुष्प, जल, धुप, दीप, अक्षत से पूजन करके नीराजन करना चाहिए। इस व्रत में केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिदेवों का संयुक्त अंश मन जाता है। यह मोक्ष देने वाला व्रत है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा :-

एक बार पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री को अपने-अपने पतिव्रत पर बड़ा घमंड हो गया। नारद इनके गर्व-मर्दन लिए सर्वप्रथम पार्वती के पास गये तथा अत्रि ऋषि – पत्नी अनसूया का बखान करने लगे।

नारद के जाने के अनन्तर पार्वती के मन में सामान्य औरत की तरह ईर्ष्या हुई तथा अनसूया का चरित्र भंग करने के लिए दिगंबर शिव से निवेदन किया।

” नारद के मन कछु न भावा। एक साथ दो कुकुर लड़ावा। ”

— वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए ऋषिराज वीणा-तान में मस्त विष्णुलोक पहुँचे। वहाँ भी लक्ष्मी जी से अनसूया की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

भला लक्ष्मी कब परगुणानुवाद सुनने वाली थीं ? नारद जी के अदृश्य होते ही विष्णु से अनसूया का पतिव्रत नष्ट करने का आग्रह किया।

उधर ब्रह्मलोक में भी जाकर नारद जी ने सावित्री से इसी तरह की अनसूया की प्रशंसा सुनाई। सावित्री भी इन दो देवियों का अनुकरण करती हुई प्रजापति से अत्रि-पत्नी के सतीत्व-मर्यादा भंग करने की प्रार्थना की।

इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देव अनसूया का व्रत भंग करने ले लिए चल दिये। अत्रि ऋषि की कुटिया के निकट ही तीनों का समागम हुआ। तब एक ही समस्या समाधान वाले तीनों देव भिखारी का रूप बना कर भिक्षाटन करते अनसूया के द्वार पर पहुँचे। अनसूया के भिक्षा देने पर सब लोगों ने इनकार कर दिया तथा भोजन करने की इच्छा प्रकट की।

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