Vaishakh Purnima Vrat Katha / वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा

Vaishakh Purnima Vrat Katha Aur Puja Vidhi
वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा और पूजा विधि


Vaishakh Purnima Vrat Katha Aur Puja Vidhi, वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा और पूजा विधि :- साल के प्रत्येक महीने में कुल 12 पूर्णिमा होती हैं। हर पूर्णिमा की अपनी विशेष महत्त्व है। हमारे हिन्दु पंचांग का एक महत्त्वपूर्ण दिन होता है। इसी प्रकार वैशाख पूर्णिमा का अपना अलग महत्त्व है। वैशाखी पूर्णिमा के दिन पूजा-अर्चना और दान देना बहुत महत्वपूर्ण और शुभ माना जाता है। इस दिन पितरों को तर्पण करना बहुत ही शुभ माना गया है।

वैशाख पूर्णिमा पूजा विधि महत्त्व :-

वैशाख पूर्णिमा के दिन गंगा जैसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। स्नान आदि नित्यक्रिया के उपरान्त व्रत का रहकर विधि-विधान से पूजा करें। दान के लिए मिष्ठान, सत्तू, वस्त्र आदि दान का विशेष महत्त्व है। श्रीकृष्ण के बचपन के सहपाठी दरिद्र ब्राह्मण सुदामा जब द्वारका उनसे मिलने गये तो उन्होंने सत्य विनायक व्रत के प्रभाव से सुदामा की सब दरिद्रता जाती रही तथा वह अत्यन्त ऐश्वर्यशाली हो गये।

वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा :-

प्राचीन कथा के अनुसार द्वापर योग में एक समय की बात है मां यशोदा ने भगवान् कृष्ण जी से कहा कि हे कृष्ण तुम सारे संसार के उत्पन्नकर्ता, पोषक हो आज तुम मुझे ऐसे व्रत कहों जिससे स्त्रियों को मृत्युलोक में विधवा होने का भय नहीं रहे तथा इस व्रत से सम्पूर्ण सृष्टि का उद्धार हो। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने कहा हे मां आपने मुझसे बहुत ही सुन्दर सवाल किया है। मैं आपको विस्तारपूर्वक बताता हूँ। 

सौभाग्य की प्राप्ति के लिए स्त्रियों को 32 पूर्णमासियों का व्रत करना चाहिए। इस व्रत को करने से स्त्रियों को सौभाग्य संपत्ति आदि की प्राप्ति होती है और संतान की रक्षा होती है। यह व्रत अचल सौभाग्य को देने वाला एवं भगवान् शिव के प्रति मनुष्य मात्र की भक्ति को बढ़ाने वाला व्रत है। तब यशोदा जी कहती है कि हे कृष्ण सर्वप्रथम इस व्रत को मृत्युलोक में किसने किया था। इसके विषय में विस्तार पूर्वक मुझे बताओ।

भगवान् श्री कृष्ण माँ यशोदा से कहते हैं कि इस भू-मंडल पर एक अत्यन्त प्रसिद्ध राजा चन्द्रहास्य से पालित अनेक प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण कातिका नाम की एक सुन्दर नगरी थी। वहाँ पर धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण निवास करता था। घर में धन-धान्य आदि की कोई कमी नहीं थी। उनको एक बड़ा दुःख था। उनके यहाँ कोई संतान नहीं थी, इस दुख से वे अत्यन्त दुखी रहा करते थे। एक समय एक योगी नगर में आये।

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