Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana / वानरों का समुद्र तट

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana, Sampati Se Bhent Aur Batchit
वानरों का समुद्र तट पर आना, सम्पाती से भेंट और बातचीत

Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana, Sampati Se Bhent Aur Batchit, वानरों का समुद्र तट पर आना, सम्पाती से भेंट और बातचीत :- अंगद ने मन में विचारकर कहा – अहा ! जटायु के समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजी के कार्य के लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान् के परमधाम को चला गया। वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकार से मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित ( देहसम्बन्धी ) अभिमान को छुड़ा दिया। भाई जटायु की करनी सुनकर सम्पाती ने बहुत प्रकार से श्रीरघुनाथजी की माहिमा वर्णन की। 

एहि बिधि कथा कहहिं बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती ।।
बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा ।।

अर्थात् :- इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकार से कथा कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वत की कन्दरा में सम्पाती ने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [ तब वह बोला – ] जगदीश्वर ने मुझको घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया।  

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ ।।
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं मारा ।।

अर्थात् :- आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजन के बिना मर रहा था। पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाता ने एक ही बार में बहुत-सा भोजन दे दिया। 

डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना ।।
कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी ।।

अर्थात् :- गीध के वचन कानों से सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध ( सम्पाती ) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान् के मन में विशेष सोच हुआ। 

कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं ।।
राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी ।।

अर्थात् :- अंगद ने मन में विचारकर कहा – अहा ! जटायु के समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजी के कार्य के लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान् के परमधाम को चला गया। 

सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी ।।
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ।।

अर्थात् :- हर्ष और शोक से युक्त वाणी ( समाचार ) सुनकर वह पक्षी ( सम्पाती ) वानरों के पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके ( अभय-वचन देकर ) उसने पास जाकर जटायु का वृतान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी। 

सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी ।।

अर्थात् :- भाई जटायु की करनी सुनकर सम्पाती ने बहुत प्रकार से श्रीरघुनाथजी की माहिमा वर्णन की। 

दो० — मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।
बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।। 27 ।।

अर्थात् :- [ उसने कहा – ] मुझे समुद्र किनारे ले चलो, मैं जटायु को तिलाञ्जलि दे दूँ। इस सेवा के बदले मैं तुम्हारी वचन से सहायता करूँगा ( अर्थात् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा ) जिसे तुम खोज रहे  हो उसे पा आओगे। 

अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ।।
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई ।।

अर्थात् :- समुद्र के तीर पर छोटे भाई जटायु की क्रिया ( श्राद्ध आदि ) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा – हे वीर वानरों ! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानी में एक बार आकाश में उड़कर सूर्य के निकट चले गये। 

तेज न सहि सोक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा ।।
जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।

अर्थात् :- वह ( जटायु ) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। ( किन्तु ) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्य के पास चला गया। अत्यन्त अपार तेज से मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोर से चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ा।  

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही ।।
बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा। देहजनित अभिमान छड़ावा ।।

अर्थात् :- वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकार से मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित ( देहसम्बन्धी ) अभिमान को छुड़ा दिया।  

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही ।।
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ।।

अर्थात् :- [ उन्होंने कहा – ] त्रेतायुग में साक्षात् परब्रह्म मनुष्य शरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर ले जायगा। उसकी खोज में प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलने पर तू पवित्र हो जायगा। 

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ।।
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ।।

अर्थात् :- और तेरे पंख उग आयेंगे ; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजी  को दिखा देना। मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभु का कार्य करो। 

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका ।।
तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई ।।

अर्थात् :- त्रिकूट पर्वत पर लङ्का बसी हुई है। वहाँ स्वभाव ही से निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उपवन ( बगीचा ) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [ इस समय भी ] वे सोच में मग्न बैठी हैं। 

दो० — मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार ।
बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय सहाय तुम्हार ।। 28 ।।

अर्थात् :- मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते ; क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है ( बहुत दूर तक जाती है )। क्या करूँ ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता।  

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