Bharatji Ki Mandali Ka Satkar / भरतजी की मण्डली का सत्कार

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Vanvasiyon Dwara Bharatji Ki Mandali Ka Satkar, Kaikeyi Ka Paschatap
वनवासियों द्वारा भरतजी की मण्डली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप

Vanvasiyon Dwara Bharatji Ki Mandali Ka Satkar, Kaikeyi Ka Paschatap, वनवासियों द्वारा भरतजी की मण्डली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप :- अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्री सभी प्रेम में अत्यन्त मग्न हो रहे हैं। उनके दिन पल के समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष ( रूप ) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं। भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख लगती है। वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीच ( तल ) के कीचड़ में डूबी हुई मछली को जल की कमी से व्याकुलता होती है। 


कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी ।।

भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी ।।

अर्थात् :- कोल, किरात और भील आदि वन के रहने वाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृत के समान स्वादिष्ट मधु ( शहद ) को सुन्दर दोने बनाकर उनमे भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदि की जूड़ियों ( अँटियों ) को। 

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ।।
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं ।।

अर्थात् :- सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजों के अलग-अलग स्वाद, भेद ( प्रकार ), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे उन्हें नहीं लेते और लौटा देने में श्रीरामजी की दुहाई देते हैं।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी ।।
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा ।।

अर्थात् :- प्रेम में मग्न हुए वे कोमल वाणी से कहते हैं कि साधु लोग प्रेम को पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेम को देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये )। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीचे निषाद हैं। श्रीरामजी की कृपा से हमने आपलोगों के दर्शन पाये हैं।

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा ।।
राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ।।

अर्थात् :- हमलोगों को आपके दर्शन बड़े दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गङ्गाजी की धारा दुर्लभ है ! [ देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा भी होने चाहिये। 

दो० — यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु ।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु ।। 250 ।।

अर्थात् :- हृदय में ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करने के लिये फल, तृण और अंकुर लीजिये। 

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे ।।
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईंधनु पात किरात मिताई ।।

अर्थात् :- आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं है। हे स्वामी ! हम आपको क्या देंगे ? भीलों की मित्रता तो बस, ईंधन ( लकड़ी ) और पत्तों ही तक है। 

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई ।।
हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ।।

अर्थात् :- हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवों की हिंसा करने वाले हैं ; कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं। 

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं ।।
सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ।।

अर्थात् :- हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारे कमर में कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्न में भी कभी धर्मबुद्धि कैसी ? यह सब तो श्रीरघुनाथजी के दर्शन का प्रभाव है। 

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे ।।
बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे ।।

अर्थात् :- जबसे प्रभु के चरणकमल देखे, तब से हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियों के वचन सुनकर अयोध्या के लोग प्रेम में भर गये और उनके भाग्य की सराहना करने लगे। 

छं० — लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं ।
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ।।
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा ।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ।।

अर्थात् :- सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उन लोगों के बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलों की वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया। 

सो० — बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब ।
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ।। 251 ।।

अर्थात् :- सब लोग दिनों दिन परम आनन्दित होते हुए वन में चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षा के जल से मेढ़क और मोर मोटे हो जाते हैं ( प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं )। 

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती ।।
सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई ।।

अर्थात् :- अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्री सभी प्रेम में अत्यन्त मग्न हो रहे हैं। उनके दिन पल के समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष ( रूप ) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं।  

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ ।।
सीयँ सासु सेवा बस किन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी के सिवा इस भेद को और किसी ने नहीं जाना। सब मायाएँ [ पराशक्ति महामाया ] श्रीसीताजी की माया में ही हैं। सीताजी ने सासुओं को सेवा से वश में कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई ।।
अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई ।।

अर्थात् :- सीताजी समेत दोनों भाइयों ( श्रीराम-लक्ष्मण ) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती हैं, किन्तु धरती बीच ( फटकर समा जाने के लिये रास्ता ) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता।

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ।।
यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध की नाहीं ।।

अर्थात् :- लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि ( ज्ञानी ) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से विमुख हैं उन्हें नरक में ठौर नहीं मिलती। सबके मन में यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता ! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं। 

दो० — निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच ।
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ।। 252 ।।

अर्थात् :- भरतजी को न तो रात को नींद आती है, न दिन में भूख लगती है। वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीच ( तल ) के कीचड़ में डूबी हुई मछली को जल की कमी से व्याकुलता होती है।

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