Varaha Chaturdashi Vrat Katha / वाराह चतुर्दशी व्रत कथा

वाराह चतुर्दशी व्रत कथा और पूजा विधि
Varaha Chaturdashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi


Varaha Chaturdashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi, वाराह चतुर्दशी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को किया जाता है। इस तिथि को वाराह की पूजा का विधि-विधान है।

वाराह चतुर्दशी पूजा विधि :-

इस दिन भगवान् वाराह की पूजा का विधि विधान है। इसी दिन वाराह अवतार माना जाता है। प्रातःकाल स्नान आदि के उपरान्त व्रत का संकल्प लें। भगवान् वाराह को स्नान करावें और भोग लगावें। पूजा अर्चना के साथ हिरण्याक्ष वध की कथा सुनें तथा आरती उतारें। ब्राह्मण को भोजन करावें और दान दें।

 इस व्रत को करने से भूत-प्रेतादि बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं।

वाराह चतुर्दशी व्रत कथा :-

प्राचीन कथा के अनुसार भगवान् विष्णु के तीसरे अवतार वराह यानी शूकर। इस अवतार के माध्यम से मानव शरीर के साथ परमात्मा का पहला कदम धरती पर पड़ा। मुख शुकर का था लेकिन शरीर इंसान का। उस समय हिरणायक्ष नामक दैत्य ने अपनी शक्ति से स्वर्ग पर कब्ज़ा कर पूरी पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया। हिरण्याक्ष अर्थात् हिरण्य का मतलब है स्वर्ण और अक्ष का मतलब आँखे। जिसकी आँखें दूसरे के धन पर लगी रहती हों, वह हिरणायक्ष है।

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