Varsha Ritu Varnan / वर्षा ऋतु वर्णन

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Varsha Ritu Varnan
वर्षा ऋतु वर्णन

Varsha Ritu Varnan, वर्षा ऋतु वर्णन :- बादल पृथ्वी के समीप आकर ( नीचे उतरकर ) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं। जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण [ एक-एककर ] सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरि को पाकर अचल ( आवागमन से मुक्त ) हो जाता है। पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड-मत के प्रचार से सद् ग्रन्थ गुप्त ( लुप्त ) हो जाते हैं।    

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा ।।
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा स्थिर नाहीं ।।

अर्थात् :- आकाश में बादल घुमड़-घुमड़ कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया ( सीताजी ) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती। 

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ।।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत यह जैसें ।।

अर्थात् :- बादल पृथ्वी के समीप आकर ( नीचे उतरकर ) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं। 

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई ।।
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी ।।

अर्थात् :- छोटी नदियाँ भरकर [ किनारों को ] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं ( मर्यादा का त्याग कर देते हैं )। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गयी हो।  

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा ।।
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई ।।

अर्थात् :- जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण [ एक-एककर ] सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरि को पाकर अचल ( आवागमन से मुक्त ) हो जाता है। 

दो० — हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ।। 14 ।।

अर्थात् :- पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखण्ड-मत के प्रचार से सद् ग्रन्थ गुप्त ( लुप्त ) हो जाते हैं। 

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई ।।
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका ।।

अर्थात् :- चारों दिशाओं में मेढ़क की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधक का मन विवेक ( ज्ञान ) प्राप्त होने पर हो जाता है। 

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ ।।
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ।।

अर्थात् :- मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गये ( उनके पत्ते झड़ गये )। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा ( उनकी एक भी नहीं चलती )। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है ( अर्थात् क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रहता )।  

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी ।।
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा ।।

अर्थात् :- अन्न से युक्त ( लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी ) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। रात के घने अन्धकार में जुगनू शोभा पा रही है, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो। 

महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भए बिगरहिं नारीं ।।
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ।।

अर्थात् :- भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं ( उनमें घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं )। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मन का त्याग कर देते हैं।  

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ।।
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ।।

अर्थात् :- चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं ; जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती। जैसे हरिभक्त के हृदय में काम नहीं उत्पन्न होता। 

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ।।
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना ।।

अर्थात् :- पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इन्द्रियाँ [ शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं ]। 

दो० — कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ।। 15 ( क ) ।।

अर्थात् :- कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म ( श्रेष्ठ आचरण ) नष्ट हो जाते हैं।  

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग ।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ।। 15 ( ख ) ।।

अर्थात् :- कभी [ बादलों के कारण ] दिन में घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है। 

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