Vashisht Bharat Samwad / वशिष्ठ भरत संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Vashisht Bharat Samwad Aur Shriramji Ko Lane Ke Liye Chitrkut Jane Ki Taiyari
वशिष्ठ भरत संवाद और श्रीरामजी को लाने के लिये चित्रकूट जाने की तैयारी


नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ।।

गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ।।

अर्थात् :- वेदों में बतायी हुई विधि से राजा की देह को स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा ( अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होने से रोक लिया )। वे रानियाँ भी [ श्रीरामजी के ] दर्शन की अभिलाषा से रह गयीं।

चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ।।
सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ।।

अर्थात् :- चन्दन और अगर के तथा और भी अनेकों प्रकार के अपार [ कपूर, गुग्गुल,केसर आदि ] सुगन्ध-द्रव्यों के बहुत-से बोझ आये। सरयूजी के तट पर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [ जो ऐसी मालूम होती थी ] मानो स्वर्ग की सुन्दर सीढ़ी हो।

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ।।
सोध सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ।।

अर्थात् :- इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजी ने पिता का दशगात्र-विधान ( दस दिनों का कृत्य ) किया।

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ।।
भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ।।

अर्थात् :- मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजी ने सब वैसा ही हजारों प्रकार से किया। शुद्ध हो जाने पर [ विधिपूर्वक ] सब दान किये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकार की सवारियाँ। ,

दो० — सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम ।
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ।। 170 ।।

अर्थात् :- सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन मकान भरतजी ने दिये ; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्ण काम हो गया ( अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरह से पूरी हो गयीं )।

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ।।
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ।।

अर्थात् :- पिताजी के लिये भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनों को बुलवाया।

बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ।।
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ।।

अर्थात् :- सब लोग राजसभा में जाकर बैठ गये। तब मुनि ने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयों को बुलवा भेजा। भरतजी को वसिष्ठजी ने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्म से भरे हुए वचन कहे।

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ।।
भूप धरमुब्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ।।

अर्थात् :- पहले तो कैकेयी जी ने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनि ने वह सारी कथा कही। फिर राजा की धर्मव्रत और सत्य की सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेम को निबाहा।

कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ।।
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते-करते तो मुनिराज के नेत्रों में जल भर आया और वे शरीर से पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजी की प्रेम की बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेह में मग्न हो गये।

दो० — सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ।। 171 ।।

अर्थात् :- मुनिनाथ ने विलखकर कहा ( दुःखी होकर ) कहा – हे भरत ! सुनो, भावी ( होनहार ) बड़ी बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं।

अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ।।
तात बिचारु करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ।।

अर्थात् :- ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय ? और व्यर्थ किस पर क्रोध किया जाय ? हे तात ! मन में विचार करो। राजा दशरथजी सोच करने के योग्य नहीं है।

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ।।
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ।।

अर्थात् :- सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ।।
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ।।

अर्थात् :- उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करने वाला, बहुत बोलने वाला, मान-बड़ाई चाहने वाला और ज्ञान का घमंड रखने वाला है।

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ।।
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ।।

अर्थात् :- पुनः उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।

दो० — सोचिअ गृह जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ।। 172 ।।

अर्थात् :- उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्म मार्ग का परित्याग कर देता है ; उस संन्यासी का सोच करना चाहिये जो दुनिया के प्रपञ्च में फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्य से हीन है।

बैखानस सोइ सोचै जोगू । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ।।
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ।।

अर्थात् :- वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करने वाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओं के साथ विरोध रखने वाला है।

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ।।
सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ।।

अर्थात् :- सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता।

सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ।।
भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ।।

अर्थात् :- कोसलराज दशरथजी सोच करने योग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत ! तुम्हारे पिता- जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होने का ही है।

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथ । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ।।

अर्थात् :- ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजी के गुणों की कथाएँ कहा करते हैं।

दो० — कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु ।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ।। 173 ।।

अर्थात् :- हे तात ! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं ?

सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ।।
यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ।।

अर्थात् :- राजा सब प्रकार से बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ।।
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ।।

अर्थात् :- राजा ने राजपद तुमको दिया है। पिता का वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचन के लिये ही श्रीरामचन्द्रजी को त्याग मिला और रामविरह की अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे दी।

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ।।
करहु सीस धरि भूप रजाई । हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ।।

अर्थात् :- राजा के वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात ! पिता के वचनों को प्रमाण ( सत्य ) करो ! राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है।

परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब साखी ।।
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ।।

अर्थात् :- परशुरामजी ने पिता की आज्ञा रखी और माता को मार डाला ; सब लोक इस बात के साक्षी हैं। राजा ययाति के पुत्र ने पिता को अपनी जवानी दे दी। पिता की आज्ञा पालन करने से उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ।

दो० — अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ।। 174 ।।

अर्थात् :- जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे [ यहाँ ] सुख और सुयश के पात्र होकर अन्त में इन्द्रपुरी ( स्वर्ग ) में निवास करते हैं।

अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ।।
सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू । तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू ।।

अर्थात् :- राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजा का पालन करो। ऐसा करने से स्वर्ग में राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।

बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ।।
करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ।।

अर्थात् :- यह वेद में प्रसिद्ध है और [ स्मृति-पुराणादि ] सभी शास्त्रों के द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानि का त्याग कर दो। मेरे वचन को हित समझकर मानो।

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ।।
कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ।।

अर्थात् :- इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजा के सुख से सुखी होंगी।

परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ।।
सौंपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ।।

अर्थात् :- जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ सम्बन्ध को जान लेगा, वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेह से उनकी सेवा करना।

दो० — कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि ।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ।। 175 ।।

अर्थात् :- मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं – गुरूजी की आज्ञा का अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजी के लौट आने पर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा।

कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ।।
सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ।।

अर्थात् :- कौसल्या भी धीरज धरकर कह रही हैं – हे पुत्र ! गुरूजी की आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। काल की गति को जानकर विषाद का त्याग कर देना चाहिये।

बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ।।
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी वन में हैं, महाराज स्वर्ग का राज्य करने चले गये। और हे तात ! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र ! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओं के – सबके एक तुम ही सहारे हो।

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ।।
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ।।

अर्थात् :- विधाता को प्रतिकूल और काल को कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरु की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसी के अनुसार कार्य करो और प्रजा का पालन कर कुटुम्बियों का दुःख हरो।

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ।।
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ।।

अर्थात् :- भरतजी ने गुरु के वचनों और मन्त्रियों के अभिनन्दन ( अनुमोदन ) को सुना, जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान [ शीतल ] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलता के रस में सनी हुई माता कौसल्याजी की कोमल वाणी सुनी।

छं० — सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए ।
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ।।
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की ।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ।।

अर्थात् :- सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल ( आँसू ) बहाकर हृदय के विरह रूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे। ( नेत्रों के आँसुओं ने उनके वियोग-दुःख को बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया )। उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं – स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजी की सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।

सो० — भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि ।
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ।। 176 ।।

अर्थात् :- धैर्य की धुरी को धारण करने वाले भरतजी धीरज धरकर, कमल के समान हाथों को जोड़कर, वचनों को मानो अमृत में डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे।

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