Vigyan Sahit Gyan Vishay / विज्ञान सहित ज्ञान विषय

अध्याय सात भगवद्ज्ञान

Vigyan Sahit Gyan Vishay
विज्ञान सहित ज्ञान विषय

Vigyan Sahit Gyan Vishay, विज्ञान सहित ज्ञान विषय। श्रीभगवान् ने कहा — हे पृथापुत्र ! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो। कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार — यह आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना ( अपरा ) प्रकृतियाँ हैं।

श्लोक 1 से 7

श्रीभगवानुवाच —
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। 1 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा; मयि — मुझमें; आसक्त-मनाः — आसक्त मन वाला; पार्थ — हे पृथापुत्र; योगम् — आत्म-साक्षात्कार; युञ्जन् — अभ्यास करते हुए; मत्-आश्रयः — मेरी चेतना ( कृष्णचेतना ) में; असंशयम् — निस्संदेह; समग्रम् — पूर्णतया; माम् — मुझको; यथा — जिस तरह; ज्ञास्यसि — जान सकते हो; तत् — वह; शृणु — सुनो।

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — हे पृथापुत्र ! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो।

 ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।। 2 ।।

ज्ञानम् — प्रत्यक्ष ज्ञान; ते — तुमसे; अहम् — मैं; स — सहित; विज्ञानम् — दिव्यज्ञान; इदम् — यह; वक्ष्यामि — कहूँगा; अशेषतः — पूर्णरूप से; यत् — जिसे; ज्ञात्वा — जानकर; न — नहीं; इह — इस संसार में; भूयः — आगे; अन्यत् — अन्य कुछ; ज्ञातव्यम् — जानने योग्य; अवशिष्यते — शेष रहता है। 

तात्पर्य — अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यावहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा। इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा।

 मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ।। 3 ।।

मनुष्याणाम् — मनुष्यों में से; सहस्रेषु — हजारों; कश्चित् — कोई एक; यतति — प्रयत्न करता है; सिद्धये — सिद्धि के लिए; यतताम् — इस प्रकार प्रयत्न करने वाले; अपि — निस्सन्देह; सिद्धानाम् — सिद्ध लोगों में से; कश्चित् — कोई एक; माम् — मुझको; वेत्ति — जानता है; तत्त्वतः — वास्तव में। 

तात्पर्य — कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पता है।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।। 4 ।।

भूमिः — पृथ्वी; आपः — जल; अनलः — अग्नि; वायुः — वायु; खम् — आकाश; मनः — मन; बुद्धिः — बुद्धि; एव — निश्चय ही; च — तथा; अहङ्कार — अहंकार; इति — इस प्रकार; इयम् — ये सब; मे — मेरी; भिन्ना — पृथक्; प्रकृतिः — शक्तियाँ; अष्टधा — आठ प्रकार की। 

तात्पर्य — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार — यह आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना ( अपरा ) प्रकृतियाँ हैं।

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय चार — दिव्य ज्ञान
  3. अध्याय छह —  ध्यानयोग
  4. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति

 अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि से पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ।। 5 ।।

अपरा — निकृष्ट, जड़; इयम् — यह; इतः — इसके अतिरिक्त; तु — लेकिन; अन्याम् — अन्य; प्रकृतिम् — प्रकृति को; विद्धि — जानने का प्रयत्न करो; मे — मेरी; पराम् — उत्कृष्ट, चेतन; जीव-भूताम् — जीवों वाली; महा-बाहो — हे बलिष्ट भुजाओं वाले; यया — जिसके द्वारा; इदम् —  यह; धार्यते — प्रयुक्त किया जाता है, दोहन होता है; जगत् — संसार।

तात्पर्य — हे महाबाहु अर्जुन ! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है, जो उन जीवों से युक्त है, जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ।। 6 ।।

एतत् — ये दोनों शक्तियाँ; योनीनि — जिनके जन्म के स्रोत, योनियाँ; भूतानि — प्रत्येक सृष्ट पदार्थ; सर्वाणि — सारे; इति — इस प्रकार; उपधारय — जानो; अहम् — मैं; कृत्स्नस्य — सम्पूर्ण; जगतः — जगत का; प्रभवः — उत्पत्ति का कारण; प्रलयः — प्रलय, संहार; तथा — और। 

तात्पर्य — सारे प्राणियों का उद्गम इन दोनों शक्तियों में है। इस जगत् में जो कुछ भी भौतिक तथा आध्यात्मिक है, उसकी उत्पत्ति तथा प्रलय मुझे ही जानो।

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सुत्रे मणिगणा इव ।। 7 ।।

मत्तः — मुझसे परे; पर-तरम् — श्रेष्ठ; न — नहीं; अन्यत् किञ्चित् — अन्य कुछ भी; अस्ति — है; धनञ्जय — हे धन के विजेता; मयि — मुझमें; सर्वम् — सब कुछ; इदम् — यह जो हम देखते हैं; प्रोतम् — गुँथा हुआ; सुत्रे — धागे में; मणि-गणाः — मोतियों के दाने; इव — सदृश।

तात्पर्य — हे धनञ्जय ! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है। जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है।

आगे के श्लोक :–

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