Vishwaroop Ke Darshan / विश्वरूप के दर्शन

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Vishwaroop Ke Darshan Hetu Arjun Ki Prarthna
विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना

Vishwaroop Ke Darshan Hetu Arjun Ki Prarthna, विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना- अर्जुन ने कहा — आपने जिन अत्यन्त गुह्य आध्यात्मिक विषयों का मुझे उपदेश दिया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है। हे कमलनयन ! मैंने आपसे प्रत्येक जीव की उत्पत्ति तथा लय के विषय में विस्तार से सुना है और आपकी अक्षय महिमा का अनुभव किया है। हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्वर !

श्लोक 1 से 4

अर्जुन उवाच —
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं  विगतो मम ।। 1 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; मत्-अनुग्रहाय — मुझपर कृपा करने के लिए; परमम् — परम; गुह्यम् — गोपनीय; अध्यात्म — आध्यात्मिक; संज्ञितम् — नाम से जाना जाने वाला, विषयक; यत् — जो; त्वया — आपके द्वारा; उक्तम् — कहे गये; वचः — शब्द; तेन — उससे; मोहः — अयम् — यह; विगतः — हट गया; मम — मेरा। 

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — आपने जिन अत्यन्त गुह्य आध्यात्मिक विषयों का मुझे उपदेश दिया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ।। 2 ।।

भव — उत्पत्ति; अप्ययौ — लय ( प्रलय ) ; हि — निश्चय ही; भूतानाम् — समस्त जीवों का; श्रुतौ — सुना गया है; विस्तरशः — विस्तारपूर्वक; मया — मेरे द्वारा; त्वत्तः — आपसे; कमल-पत्र-अक्ष — हे कमल नयन; माहात्म्यम् — महिमा; अपि — भी; च — तथा; अव्ययम् — अक्षय, अविनाशी। 

तात्पर्य — हे कमलनयन ! मैंने आपसे प्रत्येक जीव की उत्पत्ति तथा लय के विषय में विस्तार से सुना है और आपकी अक्षय महिमा का अनुभव किया है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  2. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
  3. अध्याय बारह — भक्तियोग

 एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ।। 3 ।।

एवम् — इस प्रकार; एतत् — यह; यथा — जिस प्रकार; आत्थ — कहा है; त्वम् — आपने; आत्मानम् — अपने आपको; परम-ईश्वर — हे परमेश्वर; द्रष्टुम् — देखने के लिए; इच्छामि — इच्छा करता हूँ ; ते — आपका; रूपम् — रूप; ऐश्वरम् — दैवी; पुरुष-उत्तम — हे पुरुषों में उत्तम। 

तात्पर्य — हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्वर ! यद्यपि आपको मैं अपने समक्ष आपके द्वारा वर्णित आपके वास्तविक रूप में देख रहा हूँ, किन्तु मैं यह देखने का इच्छुक हूँ कि आप इस दृश्य जगत में किस प्रकार प्रविष्ट हुए हैं। मैं आपके उसी रूप का दर्शन करना चाहता हूँ।

 मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ।। 4 ।।

मन्यसे — तुम सोचते हो; यदि — यदि; तत् — वह; शक्यम् — समर्थ; मया — मेरे द्वारा; द्रष्टुम् — देखे जाने के लिए; इति — इस प्रकार; प्रभो — हे स्वामी; योग-ईश्वर — हे योगेश्वर; ततः — तब; मे — मुझे; त्वम् — आप; दर्शय — दिखलाइये; आत्मानम् — अपने स्वरुप को; अव्ययम् — शाश्वत। 

तात्पर्य — हे प्रभु ! हे योगेश्वर ! यदि आप सोचते हैं कि मैं आपके विश्वरूप को देखने में समर्थ हो सकता हूँ, तो कृपा करके मुझे अपना असीम विश्वरूप दिखलाइये।

आगे के श्लोक :–

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