Vishwaroop Ke Darshan Ki Mahima / विश्वरूप के दर्शन

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Bhagwan Dwara Apne Vishwaroop Ke Darshan Ki Mahima Ka Kathan
भगवान् द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन

Bhagwan Dwara Apne Vishwaroop Ke Darshan Ki Mahima Ka Kathan Tatha Chaturbhuj Aur Saumyarup Ka Dikhaya Jana, भगवान् द्वारा अपने विश्वरूप के दर्शन की महिमा का कथन तथा चतुर्भुज और सौम्यरूप का दिखाया जाना- भगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर तुम्हें इस संसार में अपने इस परम विश्वरूप का दर्शन कराया है। इसके पूर्व अन्य किसी ने इस असीम तथा तेजोमय आदि-रूप को कभी नहीं देखा था। हे कुरुश्रेष्ठ ! 

श्लोक 47 से 50

श्रीभगवानुवाच — 
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ।। 47 ।।

श्री-भगवान् उवाच — श्रीभगवान् ने कहा; मया — मेरे द्वारा; प्रसन्नेन — प्रसन्न; तव — तुमको; अर्जुन — हे अर्जुन; इदम् — इस; रूपम् — रूप को; परम् — दिव्य; दर्शितम् — दिखाया गया; आत्म-योगात् — अपनी अन्तरंगाशक्ति से; तेजः -मयम् — तेज से पूर्ण; विश्वम् — समग्र ब्रह्माण्ड को; अनन्तम् — असीम; आद्यम् — आदि; यत् — जो; मे — मेरा; त्वत् अन्येन — तुम्हारे अतिरिक्त अन्य के द्वारा; न दृष्ट-पूर्वम् — किसी ने पहले नहीं देखा।

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर तुम्हें इस संसार में अपने इस परम विश्वरूप का दर्शन कराया है। इसके पूर्व अन्य किसी ने इस असीम तथा तेजोमय आदि-रूप को कभी नहीं देखा था।

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ।। 48 ।।

न — कभी नहीं ; वेद-यज्ञ — यज्ञ द्वारा; अध्ययनैः — या वेदों के अध्ययन से; न — कभी नहीं ; दानैः — दान के द्वारा; न — कभी नहीं ; च — भी; क्रियाभिः — पुण्य कर्मों से; न — कभी नहीं ; तपोभिः — तपस्या के द्वारा; उग्रैः — कठोर; एवम्-रूपः — इस रूप में ; शक्यः — समर्थ; अहम् — मैं ; नृ-लोके — इस भौतिक जगत में ; द्रष्टुम् — देखे जाने में ; त्वत् — तुम्हारे अतिरिक्त; अन्येन — अन्य के द्वारा; कुरु-प्रवीर — कुरु योद्धाओं में श्रेष्ठ।

तात्पर्य — हे कुरुश्रेष्ठ ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्वरूप को किसी ने नहीं देखा, क्योंकि मैं न तो वेदाध्ययन के द्वारा, न यज्ञ, दान, पुण्य या कठिन तपस्या के द्वारा इस रूप में, इस संसार में देखा जा सकता हूँ।

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  2. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
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मा ते व्यथा मा च विमूढ़भावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्कममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ।। 49 ।।

मा — न हो; ते — तुम्हें ; व्यथा — पीड़ा, कष्ट ; मा — न हो; च — भी; विमूढ़-भावः — मोह; दृष्ट्वा — देखकर; रूपम् — रूप को; घोरम् — भयानक; इदृक् — इस प्रकार का; मम — मेरे; इदम् — इस; व्यपेत-भीः — सभी प्रकार के भय से मुक्त; प्रीत-मनाः — प्रसन्न चित्त; पुनः — फिर; त्वम् — तुम; तत् — उस; एव — इस प्रकार; मे — मेरे; रुपम् — रुप को; इदम् — इस; प्रपश्य — देखो।

तात्पर्य — तुम मेरे इस भयानक रूप को देखकर अत्यन्त विचलित एवं मोहित हो गये हो। अब इसे समाप्त करता हूँ। हे मेरे भक्त ! तुम समस्त चिन्ताओं से पुनः मुक्त हो जाओ। तुम शान्त चित्त से अब अपना इच्छित रूप देख सकते हो।

सञ्जय उवाच —
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथाेक्त्वा

स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ।। 50 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा; इति — इस प्रकार; अर्जुनम् — अर्जुन को; वासुदेवः — कृष्ण ने; तथा — उस प्रकार से; उक्त्वा — कहकर; स्वकम् — अपना, स्वीय; रूपम् — रूप को; दर्शयाम् आस — दिखलाया; भूयः — फिर; आश्वासयाम् आस — धीरज धराया; च — भी; भीतम् — भयभीत; एनम् — उसको; भूत्वा — होकर; पुनः — फिर; सौम्य-वपुः — सुन्दर रूप; महा-आत्मा — महापुरुष।

तात्पर्य — संजय ने धृतराष्ट्र से कहा — अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद भगवान् कृष्ण ने अपना असली चतुर्भुज रूप प्रकट किया और अन्त में दो भुजाओं वाला अपना रूप प्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया।

आगे के श्लोक :–

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