Vistar Se Dhyan Yog Ka Vishay / विस्तार से ध्यान योग

अध्याय छह ध्यानयोग

Vistar Se Dhyan Yog Ka Vishay
विस्तार से ध्यान योग का विषय

Vistar Se Dhyan Yog Ka Vishay, विस्तार से ध्यान योग का विषय। सिद्धि की अवस्था में, जिसे समाधि कहते हैं, मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतया संयमित हो जाता है। इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आपमें आनन्द उठा सकता है। उस आनन्दमयी स्थिति में वह दिव्य इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्यसुख में स्थित रहता है।

श्लोक 11 से 32

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।। 11 ।।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ।। 12 ।।

शुचौ — पवित्र; देशे — भूमि में; प्रतिष्ठाप्य — स्थापित करके; स्थिरम् — दृढ; आसनम् — आसन; आत्मनः — स्वयं का; न — नहीं; अति — अत्यधिक; उच्छ्रितम् — ऊँचा; न — न तो; अति — अधिक; नीचम् — निम्न, नीचा; चैल-अजिन — मुलायम वस्त्र तथा मृगछाला; कुश — तथा कुशा का; उत्तरम् — आवरण; तत्र — उस पर; एक-अग्रम् — एकाग्र; मनः — मन; कृत्वा — करके; यत-चित्त — मन को वश में करते हुए; इन्द्रिय — इन्द्रियाँ; क्रियः — तथा क्रियाएँ; उपविश्य — बैठकर; आसने — आसन पर; युञ्ज्यात् — अभ्यास करे; योगम् — योग; आत्म — हृदय की; विशुद्धये — शुद्धि के लिए।

तात्पर्य — योगाभ्यास के लिए योगी एकान्त स्थान में जाकर भूमि पर कुशा बिछा दे और फिर उसे मृगछाला से ढके तथा ऊपर से मुलायम वस्त्र बिछा दे। आसन न तो बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा। यह पवित्र स्थान में स्थित हो। योगी को चाहिए कि इस पर दृढ़तापूर्वक बैठ जाय और मन, इन्द्रियों तथा कर्मों को वश में करते हुए तथा मन को एक बिंदु पर स्थिर करके हृदय को शुद्ध करने के लिए योगाभ्यास करे।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ।। 13 ।।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।। 14 ।।

समम् — सीधा; काय — शरीर; शिरः — सिर; ग्रीवम् — तथा गर्दन को; धारयन् — रखते हुए; अचलम् — अचल; स्थिरः — शान्त; सम्प्रेक्ष्य — देखकर; नासिका — नाक के; अग्रम् — अग्रभाग को; स्वम् — अपनी; दिशः — सभी दिशाओं में; च — भी; अनवलोकयन् — न देखते हुए; प्रशान्त — अविचलित; आत्मा — मन; विगत-भीः — भय से रहित; ब्रह्मचारि-व्रते — ब्रह्मचर्य व्रत में; स्थितः — स्थित; मनः — मन को; संयम्य — पूर्णतया दमित करके; मत् — मुझ ( कृष्ण ) में; चित्तः — मन को केन्द्रित करते हुए; युक्तः — वास्तविक योगी; आसीत — बैठे; मत् — मुझमें ; परः — चरम लक्ष्य। 

तात्पर्य — योगाभ्यास करने वाले को चाहिए कि वह अपने शरीर, गर्दन तथा सिर को सीधा रखे और नाक के अगले सिरे पर दृष्टि लगाए। इस प्रकार वह अविचलित तथा दमित मन से, भयरहित, विषयीजीवन से पूर्णतया मुक्त होकर अपने हृदय में मेरा चिन्तन करे और मुझे ही अपना चरमलक्ष्य बनाए।

युञ्जन्नैवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ।। 15 ।।

युञ्जन् — अभ्यास करते हुए; एवम् — इस प्रकार से; सदा — निरन्तर; आत्मानम् — शरीर, मन तथा आत्मा; योगी — योग का साधक; नियत-मानसः — संयमित मन से युक्त; शान्तिम् — शांति को; निर्वाण-परमाम् — भौतिक अस्तित्व का अन्त; मत्-संस्थाम् — चिन्मयव्योम ( भगवद्धाम ) को; अधिगच्छति — प्राप्त करता है।

तात्पर्य — इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्म में निरन्तर संयम का अभ्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है।

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।। 16 ।।

न — कभी नहीं; अति — अधिक; अश्नतः — खाने वाले का; तु — लेकिन; योगः — भगवान् से जुड़ना; अस्ति — है; न — न तो; च — भी; एकान्तम् — बिल्कुल, नितान्त; अनश्नतः — भोजन न करने वाले का; न — न तो; च — भी; अति — अत्यधिक; स्वप्न-शीलस्य — सोने वाले का; जाग्रतः — अथवा रात भर जागते रहने वाले का; न —  नहीं; एव — ही; च — तथा; अर्जुन — हे अर्जुन।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। 17 ।।

युक्त — नियमित; आहार — भोजन; विहारस्य — आमोद-प्रमोद का; युक्त — नियमित; चेष्टस्य — जीवन निर्वाह के लिए कर्म करने वाले का; कर्मसु — कर्म करने में; युक्त — नियमित; स्वप्न-अवबोधस्य — नींद तथा जागरण का; योगः — योगाभ्यास; भवति — होता है; दुःख-हा — कष्टों को नष्ट करने वाला। 

तात्पर्य — जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।

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 यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ।। 18 ।।

यदा — जब; विनियतम् — विशेष रूप से अनुशासित; चित्तम् — मन तथा उसके कार्य; आत्मनि — अध्यात्म में; एव — निश्चय ही; अवतिष्ठते — स्थित हो जाता है; निस्पृहः — आकंक्षारहित; सर्व — सभी प्रकार की; कामेभ्यः — भौतिक इन्द्रियतृप्ति से; युक्तः — योग में स्थित; इति — इस प्रकार; उच्यते — कहलाता है; तदा — उस समय।

तात्पर्य — जब योगी योगाभ्यास द्वारा अपने मानसिक कार्यकलापों को वश में कर लेता है और अध्यात्म में स्थित हो जाता है अर्थात् समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित हो जाता है, तब वह योग में सुस्थिर कहा जाता है।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ।। 19 ।।

यथा — जिस तरह; दीपः — दीपक; निवात-स्थः — वायुरहित स्थान में; न — नहीं; इङ्गते — हिलता डुलता; सा — यह; उपमा — तुलना; स्मृता — मानी जाती है; योगिनः — योगी की; यत-चित्तस्य — जिसका मन वश में है; युञ्जतः — निरन्तर संलग्न; योगम् — ध्यान में; आत्मनः — अध्यात्म में।

तात्पर्य — जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक हिलता-डुलता नहीं, उसी तरह जिस योगी का मन वश में होता है, वह आत्मतत्त्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ।। 20 ।।

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यामतीन्द्रियम्
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।। 21 ।।

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ।। 22 ।।

तं विद्यानद्दु:ख़संयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।। 23 ।।

यत्र — जिस अवस्था में; उपरमते — दिव्यसुख के अनुभूति के कारण बंद हो जाती है; चित्तम् — मानसिक गतिविधियाँ; निरुद्धम् — पदार्थ से निवृत्त; योग-सेवया — योग के अभ्यास द्वारा; यत्र — जिसमें; च — भी; एव — निश्चय ही; आत्मना — विशुद्ध मन से; आत्मानम् — आत्मा की; पश्यन् — स्थिति का अनुभव करते हुए; आत्मनि — अपने में; तुष्यति — तुष्ट हो जाता है; सुखम् — सुख; आत्यन्तिकम् — परम; यत् — जो; तत् — वह; बुद्धि — बुद्धि से; ग्राह्यम् — ग्रहणीय; अतीन्द्रियम् — दिव्य; वेत्ति — जानता है; यत्र — जिसमें; न — कभी नहीं; च — भी; एव — निश्चय ही; अयम् — यह; स्थितः — स्थित; चलति — हटता है; तत्त्वतः — सत्य से; यम् — जिसको; लब्ध्वा — प्राप्त करके; च — तथा; अपरम् — अन्य कोई; लाभम् — लाभ; मन्यते — मानता है; न – कभी नहीं; अधिकम् — अधिक; ततः — उससे; यस्मिन् — जिसमें; स्थितः — स्थित होकर; न — कभी नहीं; दुःखेन — दुःखों से; गुरुणा अपि — अत्यन्त कठिन होने पर भी; विचाल्यते — चलायमान होता है; तम् — उसको; विद्यात् — जानो; दुःख-संयोग — भौतिक संसर्ग से उत्पन्न दुःख; वियोगम् — उन्मूलन को; योग-संज्ञितम् — योग में समाधि कहलाने वाला।

तात्पर्य — सिद्धि की अवस्था में, जिसे समाधि कहते हैं, मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक मानसिक क्रियाओं से पूर्णतया संयमित हो जाता है। इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आपमें आनन्द उठा सकता है। उस आनन्दमयी स्थिति में वह दिव्य इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्यसुख में स्थित रहता है। इस प्रकार स्थापित मनुष्य कभी सत्य से विपथ नहीं होता और इस सुख की प्राप्ति हो जाने पर वह इससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता। ऐसी स्थिति को पाकर मनुष्य बड़ी से बड़ी कठिनाई में भी विचलित नहीं होता। यह निस्सन्देह भौतिक संसर्ग से उत्पन्न होने वाले समस्त दुःखों से वास्तविक मुक्ति है।

 स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ।। 24 ।।

सः — उस; निश्चयेन — दृढ विश्वास के साथ; योक्तव्यः — अवश्य अभ्यास करे; योगः — योगपद्धति; अनिर्विण्ण-चेतसा — विचलित हुए बिना; सङ्कल्प — मनोधर्म से; प्रभवान् — उत्पन्न; कामान् — भौतिक इच्छाओं को; त्यक्त्वा — त्यागकर; सर्वान् — समस्त; अशेषतः — पूर्णतया; मनसा — मन से; एव — निश्चय ही; इन्द्रिय-ग्रामम् — इन्द्रियों के समूह को; विनियम्य — वश में करके; समन्ततः — सभी ओर से। 

तात्पर्य — मनुष्य को चाहिए कि संकल्प तथा श्रद्धा के साथ योगाभ्यास में लगे और पथ से विचलित न हो। उसे चाहिए कि मनोधर्म से उत्पन्न समस्त इच्छाओं को निरपवाद रूप से त्याग दे और इस प्रकार मन के द्वारा सभी ओर से इन्द्रियों को वश में करे।

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