Yamuna Ko Pranam, Vanvasiyon Ka Prem / यमुना को प्रणाम

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Yamuna Ko Pranam, Vanvasiyon Ka Prem
यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम

Yamuna ko Pranam, Vanvasiyon ka prem, यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम — फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले। रास्ते में जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गों में राजचिन्ह देखकर हमारे हृदय में बड़ा सोच होता है। जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्र की पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्ते के समीप बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं – स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं।


पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ।।

चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई ।।

अर्थात् :- फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले।

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ।।
राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें ।।

अर्थात् :- रास्ते में जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गों में राजचिन्ह देखकर हमारे हृदय में बड़ा सोच होता है।

मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ।।
अगमु पंथु गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी ।।

अर्थात् :- [ ऐसे राजचिन्हों के होते हुए भी ] तुमलोग रास्ते में पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझ में आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े-बड़े पहाड़ों का दुर्गम रास्ता है। तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है।

करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहिं जो आयसु होई ।।
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ।।

अर्थात् :- हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँ तक जायँगे वहाँ तक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे।

दो० — एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन ।
कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ।। 112 ।।

अर्थात् :- इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकित शरीर हो और नेत्रों में [ प्रेमाश्रुओं का ] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ।।
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए ।।

अर्थात् :- जो गाँव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभ घड़ी में इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हैं।

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं ।।
पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ।।

अर्थात् :- जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्र की पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्ते के समीप बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं – स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं।

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि ।।
जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ।।

अर्थात् :- जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजी सहित घनश्याम श्रीरामजी के दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियों में श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियों में बड़ाई करती हैं।

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ।।
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा ।।

अर्थात् :- जिस वृक्ष के नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है।

दो० — छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं ।
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ।। 113 ।।

अर्थात् :- रास्ते में बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु-पक्षियों को देखते हुए श्रीरामजी रास्ते में चले जा रहे हैं।

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई ।।
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी ।।

अर्थात् :- सीताजी और लक्ष्मणजी सहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँव के पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सब अपने घर और काम-काज को भूलकर तुरंत उन्हें देखने के लिये चल देते हैं।

राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ।।
सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी का रूप देखकर, नेत्रों का [ परम ] फल पाकर वे सुखी होते हैं। दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानन्द में मग्न हो गये। उनके नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये।

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ।।
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं ।।

अर्थात् :- उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानों दरिद्रों ने चिन्तामणि की ढेरी पा ली हो। वे एक-एक को पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लो।

रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे ।।
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी ।।

अर्थात् :- कोई श्रीरामचन्द्रजी को देखकर ऐसे अनुराग में भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्ग से उनकी छवि को हृदय में लेकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणी से शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणी का व्यवहार बंद हो जाता है )।

दो० — एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात ।
कहहिं गवाँइअ छिनुक श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ।। 114 ।।

अर्थात् :- कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे।

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ।।
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी ।।

अर्थात् :- कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं – नाथ ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने। —

जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ।।
मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा ।।

अर्थात् :- मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्र और मनों को लुभा लिया।

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा ।।
तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा ।।

अर्थात् :- सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को चकोर की तरह ( तन्मय होकर ) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी का नवीन तमाल वृक्ष के रंग का ( श्याम ) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवों के मन मोहित हो जाते हैं।

दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के ।।
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा ।।

अर्थात् :- बिजली के-से रंग के लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिखातक सुन्दर हैं, और मन को बहुत भाते हैं। दोनों मुनियों के ( वल्कल आदि ) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कैसे हुए हैं। कमल के समान हाथों में धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं।

दो० — जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल ।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ।। 115 ।।

अर्थात् :- उनके शरीर पर सुन्दर जटाओं के मुकुट हैं ; वक्षःस्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों पर पसीने की बूँदों का समूह शोभित हो रहा है।

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी ।।
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई ।।

अर्थात् :- उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता ; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी की सुन्दरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं।

थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से ।।
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं ।।

अर्थात् :- प्रेम के प्यासे [ वे गाँवों के ] स्त्री-पुरुष [ इनके सौन्दर्य-माधुर्य की छटा देखकर ] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरनी और हिरन [ निस्तब्ध रह जाते हैं ] ! गाँवों की स्त्रियाँ सीताजी के पास जाती हैं ; परन्तु अत्यन्त स्नेह के कारण पूछते हुए सकुचाती हैं।

बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ।।
राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं ।।

अर्थात् :- बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं – हे राजकुमारी ! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती ) हैं, परन्तु स्त्री-स्वाभाव के कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं।

स्वामिनी अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी ।।
राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ।।

अर्थात् :- हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय ( परम सुन्दर ) हैं। मरकतमणि ( पन्ने ) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी हैं ( अर्थात् मरकतमणि में और स्वर्ण में जो हरित और स्वर्ण वर्ण की आभा है वह इनकी हरितभनील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है। )

दो० — स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन ।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ।। 116 ।।

अर्थात् :- श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है ; दोनों ही परम सुन्दर और शोभा के धाम हैं। शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इनके मुख और शरद्-ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।

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