Yogbhrasht Purush Ki Gati Ka Vishay / योगभ्रष्ट पुरुष

अध्याय छह ध्यानयोग

Yogbhrasht Purush Ki Gati Ka Vishay Aur Dhyanyogi Ki Mahima
योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

Yogbhrasht Purush Ki Gati Ka Vishay Aur Dhyanyogi Ki Mahima, योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा। भगवान् ने कहा- हे पृथापुत्र ! कल्याण-कार्यों में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है। हे मित्र ! भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता। असफल योगी पवित्रात्माओं के लोकों में अनेकानेक वर्षों तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषों के परिवार में या कि धनवानों के कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 37 से 47

अर्जुन उवाच -- 
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ।। 37 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; अयतिः — असफल योगी; श्रद्धया — श्रद्धा से; उपेतः — लगा हुआ, संलग्न; योगात् — योग से; चलित — विचलित; मानसः — मन वाला; अप्राप्य — प्राप्त न करके; योग-संसिद्धिम् — योग की सर्वोच्च सिद्धि को; काम् — किस; गतिम् — लक्ष्य को; कृष्ण — हे कृष्ण; गच्छति — प्राप्त करता है। 

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण ! उस असफल योगी की गति क्या है, जो प्रारम्भ में श्रद्धापूर्वक आत्म-साक्षात्कार की विधि ग्रहण करता है, किन्तु बाद में भौतिकता के कारण उससे विचलित हो जाता है और योगसिद्धि को प्राप्त नहीं कर पता ?

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ।। 38 ।।

कच्चित् — क्या; न — नहीं; उभय — दोनों; विभ्रष्टः — विचलित; छिन्न — छिन्न-भिन्न; अभ्रम् — बादल; इव — सदृश; नश्यति — नष्ट हो जाता है; अप्रतिष्ठः — बिना किसी पद के; महा-बाहो — हे बलिष्ठ भुजाओं वाले कृष्ण; विमूढः — मोहग्रस्त; ब्रह्मणः — ब्रह्म-प्राप्ति के; पथि — मार्ग में। 

तात्पर्य — हे महाबाहु कृष्ण ! क्या ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों ही सफलताओं से च्युत नहीं होता और छिन्नभिन्न बादल की भाँति विनष्ट नहीं हो जाता, जिसके फलस्वरूप उसके लिए किसी लोक में कोई स्थान नहीं रहता।

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ।। 39 ।।

एतत् — यह है; मे — मेरा; संशयम् — सन्देह; कृष्ण — हे कृष्ण; छेत्तुम् — दूर करने के लिए; अर्हसि — आपसे प्रार्थना है; अशेषतः — पूर्णतया; त्वत् — आपकी अपेक्षा; अन्यः — दूसरा; संशयस्य — सन्देह का; अस्य — इस; छेत्ता — दूर करने वाला; न — नहीं; हि — निश्चय ही; उपपद्यते — पाया जाना सम्भव है। 

तात्पर्य — हे कृष्ण ! यही मेरा सन्देह है, और मैं आपसे इसे पूर्णतया दूर करने की प्रार्थना कर रहा हूँ। आपसे अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो इस सन्देह को नष्ट कर सके।

श्रीभगवान् उवाच —
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।

न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ।। 40 ।।

श्री-भगवान्- उवाच — भगवान् ने कहा; पार्थ — हे पृथापुत्र; न एव — कभी ऐसा नहीं है; इह — इस संसार में; न — कभी नहीं; अमुत्र — अगले जन्म में; विनाशः — नाश; तस्य — उसका; विद्यते — होता है; न — कभी नहीं; हि — निश्चय ही; कल्याण-कृत् — शुभ कार्यों में लगा हुआ; कश्चित् — कोई भी; दुर्गतिम् — पतन को; तात — हे मेरे मित्र; गच्छति — जाता है। 

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — हे पृथापुत्र ! कल्याण-कार्यों में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है। हे मित्र ! भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता।

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  1. अध्याय छह — ध्यान योग
  2. 1 से 4 — कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
  3. 5 से 10 — आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
  4. 11 से 32 — विस्तार से ध्यानयोग का विषय
  5. 33 से 36 — मन के निग्रह का विषय

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभृष्टोऽभिजायते ।। 41 ।।

प्राप्य — प्राप्त करके; पुण्य-कृताम् — पुण्य कर्म करने वालों को; लोकान् — लोकों में; उषित्वा — निवास करके; शाश्वतीः — अनेक; समाः — वर्ष; शुचीनाम् — पवित्रात्माओं के; श्री-मताम् — सम्पन्न लोगों के; गेहे — घर में; योग-भ्रष्टः — आत्म-साक्षात्कार के पथ से च्युत व्यक्ति; अभिजायते — जन्म लेता है।

तात्पर्य — असफल योगी पवित्रात्माओं के लोकों में अनेकानेक वर्षों तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषों के परिवार में या कि धनवानों के कुल में जन्म लेता है।

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ।। 42 ।।

अथ वा — या; योगिनाम् — विद्वान योगियों के; एव — निश्चय ही; कुले — परिवार में; भवति — जन्म लेता है; धी-मताम् — परम बुद्धिमानों के; एतत् — यह; हि — निश्चय ही; दुर्लभ-तरम् — अत्यन्त दुर्लभ; लोके — इस संसार में; जन्म — जन्म; यत् — जो; ईदृशम् — इस प्रकार का। 

तात्पर्य — अथवा ( यदि दीर्घकाल तक योग करने के बाद असफल रहे तो ) वह ऐसे योगियों के कुल में जन्म लेता है, जो अति बुद्धिमान हैं। निश्चय ही इस संसार में ऐसा जन्म दुर्लभ है।

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